Saturday, 13 February 2016

हेमचन्द्र विक्रमादित्य - एक विस्मृत हिंदु सम्राट



हेमू का पूरा नाम सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य है। हेमू इतिहास के भुला दिए गए उन चुनिन्दा महानायकों में शामिल है जिन्होंने इतिहास का रुख पलट कर रख दिया और हेमू ने बिलकुल अनजान से घर में जन्म लेकर, हिंदुस्तान के तख़्त पर राज़ किया। हेमू अपार पराक्रम एवं लगातार अपराजित रहने की वजह से उसे विक्रमादित्य की उपाधि दी गयी। नि:संदेह हेमू अथवा सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य दिल्ली के सिंहासन पर बैठे अंतिम हिन्दू सम्राट थे। उन्होंने अति साधारण परिवार में जन्म लेकर भारत की स्वतंत्रता के लिए शानदार कार्य किया था। उन्होंने भारत को एक शक्तिशाली हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए अत्यंत साहसी तथा पराक्रमपूर्ण विजय प्राप्त की थीं। सम्राट हेमचन्द्र वह महान न्यायवादी थे जिन्होंने भारत का भविष्य बदलने के लिए मृत्युपर्यंत भरसक प्रयत्न किए।वे एक प्रतिभाशाली शासक, एक सफल सेनानायक, एक चतुर राजनीतिज्ञ तथा दूर-द्रष्टा कूटनीतिज्ञ थे। समस्त पठानों तथा तत्कालीन मुगल शासकों -बाबर तथा हुंमायूं के काल तक एक भी हिन्दू इतने ऊंचे पद पर नहीं पहुंचा था। हेमचन्द्र भारतीय इतिहास में सर्वश्रेष्ठ स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने विदेशी शासन के विरुद्ध देश के लिए अपना बलिदान दिया।

 A Forgotten Hindu Emperor Maharaja Hemchandra Vikramaditya

हेमू का जन्म सन 1501 में राजस्थान के अलवर जिले के मछेरी नामक एक गांव में रायपूर्णदास के यहां हुआ था। इनके पिता पुरोहिताई का कार्य करते थे किन्तु बाद में मुगलों के द्वारा पुरोहितो को परेशान करने की वजह से रेवारी (हरियाणा) में आ कर नमक का व्यवसाय करने लगे। 'हेमू' (हेम चन्द्र) की शिक्षा रिवाडी में आरम्भ हुई। उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, फारसी, अरबी तथा गणित के अतिरिक्त घुडसवारी में भी महारत हासिल की। समय के साथ साथ हेमू ने पिता के नये व्यवसाय में अपना योगदान देना शुरु किया। काफी कम उम्र से ही हेमू, शेर शाह सूरी के लश्कर को अनाज एवं पोटेशियम नाइट्रेट (गन पावडर हेतु) उपलब्ध करने के व्यवसाय में पिताजी के साथ हो लिए थे। सन 1940 में शेर शाह सूरी ने हुमायु को हरा कर काबुल लौट जाने को विवश कर दिया था। हेमू ने उसी वक़्त रेवारी में धातु से विभिन्न तरह के हथियार बनाने के काम की नीव राखी, जो आज भी रेवारी में ब्रास, कोंपर, स्टील के बर्तन के आदि बनाने के काम के रूप में जारी है।| जब 22 मई, 1545 में शेरशाह सूरी की मृत्यु हुई, तब तक हेमू ने अपने प्रभाव का अच्छा खासा विस्तार कर लिया था। यही कारण है कि शेरशाह सूरी की मृत्यु के बाद जब उसका पुत्र इस्लामशाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा तो उसने हेमू की योग्यता को पहचान कर उन्हें शंगाही बाजार अर्थात दिल्ली में 'बाजार अधीक्षक' नियुक्त किया। कुछ समय बाद बाजार अधीक्षक के साथ-साथ हेमू को आंतरिक सुरक्षा का मुख्य अधिकारी भी नियुक्त कर दिया और उनके पद को वजीर के पद के समान मान्यता दी।

हेमचन्द्र विक्रमादित्य - एक विस्मृत हिंदु सम्राट

1545 में इस्लाम शाह की मृत्यु के बाद उसके 12 साल के पुत्र फ़िरोज़ शाह को उसी के चाचा के पुत्र आदिल शाह सूरी ने मार कर गद्दी हथिया ली। आदिल ने हेमू को अपना वजीर नियुक्त किया। आदिल अय्याश और शराबी था।।। कुल मिला कर पूरी तरह अफगानी सेना का नेतृत्व हेमू के हाथ में आ गया था। हेमू का सेना के भीतर जम के विरोध भी हुआ, पर हेमू अपने सारे प्रतिद्वंदियो को एक एक कर हराता चला गया। उस समय तक हेमू की अफगान सैनिक जिनमे से अधिकतर का जन्म भारत में ही हुआ था। अपने आप को भारत का रहवासी मानने लग गए थे और वे मुग़ल शासको को विदेशी मानते थे, इसी वजह से हेमू हिन्दू एवं अफगान दोनों में काफी लोकप्रिय हो गया था। हुमायु ने जब वापस हमला कर शेर शाह सूरी के भाई को परस्त किया तब हेमू बंगाल में था। हेमू ने तब दिल्ली की तरफ रुख किया और रास्ते में बंगाल, बिहार उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश की कई रियासतों को फ़तेह किया। आगरा में मुगलों के सेना नायक इस्कंदर खान उज्बेग को जब पता चला की हेमू उनकी तरफ आ रहा है तो वह बिना युद्ध किये ही मैदान छोड़ कर भाग गया ,इसके बाद हेमू ने 22 युद्ध जीते और दिल्ली सल्तनत का सम्राट बना। हेमू ने अपने जीवन काल में एक भी युद्ध नहीं हारा, पानीपत की लडाई में उसकी मृत्यु हुई जो उसका आखरी युद्ध था। अक्टूबर 6, 1556 में हेमू ने तरदी बेग खान (मुग़ल) को हारा कर दिल्ली पर विजय हासिल की।
Purana killa were hemu crowned as emperor of India
हेमू का किला
सन 1553 में हेमू के जीवन में एक बड़ा उत्कर्षकारी मोड़ आया। इस्लाम शाह की मृत्यु के बाद आदिलशाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा। आदिलशाह एक घोर विलासी शराबी और लम्पट शासक था। उसे अपने विरुद्ध बढ़ते विद्रोही को दबाने और राजस्व वसूली के लिए हेमू जैसे विश्वस्त परामर्शदाता और कुशल प्रशासक की आवश्यकता थी। उसने हेमू को ग्वालियर के किले में न केवल अपना प्रधानमंत्री बनाया वरन अफगान फौज का मुखिया भी नियुक्त कर दिया। अब तो राज्य प्रशासन का समस्त कार्य हेमू के हाथ में आ गया और व्यवहारिक रूप में वह ही राज्य का सर्वेसर्वा बन गए। शासन की बागडोर हाथों में आते ही हेमू ने टैक्स न चुकाने वाले विद्रोही अफगान सामंतों को बुरी तरह से कुचल डाला। इब्राहिम खान, सुल्तान मुहम्मद खान, ताज कर्रानी, रख खान नूरानी जैसे अनेक प्रबल विद्रोहियों को युद्ध में परास्त किया और एक-एक कर उन सभी को मौत के घाट उतार दिया। हेमू ने छप्परघटा के युद्ध में बंगाल के सूबेदार मुहम्मद शाह को मौत के घाट उतारा व बंगाल के विशाल राज्य पर कब्जा कर अपने गवर्नर शाहबाज खां को नियुक्त किया। इस बीच आदिल शाह का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और हेमू व्यवहारिक रूप से बादशाह माने जाने लगे। उन्हे हिंदू तथा अफगान सभी सेनापतियों का भारी समर्थन प्राप्त था। हेमू जिन दिनों बंगाल में विद्रोह को कुचलने में लगे थे। उनकी अनुपस्थिति का लाभ उठाकर जुलाई 1555 में हुमायुं ने पंजाब, दिल्ली और आगरा पर पुन: अपना अधिकार कर लिया।
इसके 6 माह बाद ही हुमायुं का देहांत हो गया और उसका नाबालिग पुत्र अकबर उसका उत्तराधिकारी बना। हेमू ने इसे अनुकूल अवसर जानकार मुगलों को परास्त करके और दिल्ली पर अपना एकछत्र शासन करने के स्वर्णिम अवसर के रूप में देखा। वह एक विशाल सेना को लेकर बंगाल से वर्तमान बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश को रौंदते हुए दिल्ली की ओर चल पड़े। उनके रण कौशल के आगे मुगल फौजदारों में भगदड़ मच गई। आगरा सूबे का मुगल कमांडर इस्कंदर खान उजबेक तो बिना लड़े ही आगरा छोड़कर भाग गया। हेमू ने इटावा, काल्पी, बयाना आदि सूबों पर बड़ी सरलता से कब्जा कर वर्तमान उत्तरप्रदेश के मध्य एवं पश्चिमी भागो पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। अब दिल्ली की बारी थी। 6 अक्टूबर 1956 को तुगलकाबाद के पास मात्र एक दिन की लड़ाई में हेमू ने अकबर की फौजों को हराकर दिल्ली को फतेह कर लिया। पुराने किले में जो प्रगति मैदान के सामने है अफगान तथा राजपूत सेनानायकों के सान्निध्य में पूर्ण धार्मिक विधि विधान में राज्याभिषेक कराया। 7 अक्तूबर, 1556 को भारतीय इतिहास का वह विजय दिवस आया जब दिल्ली के सिंहासन पर सैकड़ों वर्षों की गुलामी तथा अधीनता के बाद हिन्दू साम्राज्य की स्थापना हुई। विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार डा. आर.सी. मजूमदार ने इसे भारत के इतिहास के मुस्लिम शासन की अद्वितीय घटना बताया। वस्तुत: यह महान घटना, समूचे एशिया में दिल दहलाने वाली थी। आश्चर्य तो यह है कि मुस्लिम चाटुकार दरबारी इतिहासकारों तथा लेखकों से न्यायोचित प्रशंसा की अपेक्षा तो नहीं थी, बल्कि विश्व में निष्पक्षता तथा नैतिकता का ढोल पीटने वाले, किसी भी ब्रिटिश इतिहासकार ने हेमचन्द्र की वीरता एवं शौर्य के बारे में एक भी शब्द नहीं लिखा। संभवत: इससे उनका भारत पर राज करने का भावी स्वप्न पूरा न होता। वस्तुत: यह किसी भी भारतीय के लिए, जो भारतभूमि को पुण्यभूमि मातृभूमि मानता हो, अत्यंत गौरव का दिवस था।
हेमचन्द्र का राज्याभिषेक भी भारतीय इतिहास की अद्वितीय घटना थी। भारत के प्राचीन गौरवमय इतिहास से परिपूर्ण पुराने किले (पांडवों के किले) में हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुसार राज्याभिषेक था। अफगान तथा राजपूत सेना को सुसज्जित किया गया। सिंहासन पर एक सुन्दर छतरी लगाई गई। हेमचन्द्र ने भारत के शत्रुओं पर विजय के रूप में 'शकारि' विजेता की भांति 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की। नए सिक्के गढ़े गए। राज्याभिषेक की सर्वोच्च विशेषता सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य की घोषणाएं थीं जो आज भी किसी भी प्रबुद्ध शासक के लिए मार्गदर्शक हो सकती हैं। सम्राट ने पहली घोषणा की, कि भविष्य में गोहत्या पर प्रतिबंध होगा तथा आज्ञा न मानने वाले का सिर काट लिया जाएगा। उन्होंने शताब्दियों से विदेशी शासन की गुलामी में जकड़े भारत को मुक्त कराकर हेमचंद्र विक्रमादित्य की उपाधि धारण की व उत्तर भारत में दक्षिण भारत में स्थापित विजय नगर साम्राज्य की तर्ज पर हिंदू राज की स्थापना की। इस अवसर पर हेमू ने अपने चित्रों वाले सिक्के ढलवाए सेना का प्रभावी पुनर्गठन किया और बिना किसी अफगान सेना नायक को हटाए हिंदू अधिकारियों को नियुक्त किया। अपने कौशल, साहस और पराक्रम के बल पर अब हेमू हेमचंद विक्रमादित्य के नाम से देश की शासन सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर आसीन थे। अब्बुल फजल के अनुसार दिल्ली विजय के बाद हेमू काबुल पर आक्रमण करने की योजना बना रहे थे।
उधर अकबर अपने सेनापतियों की सलाह पर हेमू की बढ़ती शक्ति से डर कर काबुल लौट जाने की तैयारी में था कि उसके संरक्षक बैरमखां ने एक और मौका लेने की जिद की। दोनों ओर युद्ध की तैयारियां जोरों पर थी। हेमू एक विशाल सेना लेकर दिल्ली से पानीपत के लिए निकले। 5 नवम्बर 1556 को पानीपत के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने आ डटी। भय और सुरक्षा के विचार से अकबर और बैरमयां ने स्वयं इस युद्ध में भाग नहीं लिया और वे दोनों युद्ध क्षेत्र से 8-10 मील की दूरी पर, सौंधापुर गांव के कैंप में रहे किंतु हेमू ने स्वयं अपनी सेना का नेतृत्व किया। भयंकर युद्ध मे प्रारंभिक सफलताओं से ऐसा लगा कि मुगल सेना शीघ्र ही मैदान से भाग जाएगी लेकिन दुर्भाग्यवश एक तीर अचानक हाथी पर बैठे हेमू की आंख में लग गया। तीर निकाल कर हेमू ने लड़ाई जारी रखा। तीर लगने के कारण हेमू बेहोश हो गए। हेमचन्द्र का सर अकबर ने खुद काटा और अकबर को गाजी की ऊपदी मिली । हेमू का कटा सिर अफगानिस्तान स्थित काबुल भेजा गया जहां उसे एक किले के बाहर लटका दिया गया। जबकि उनका धड़ दिल्ली के पुराने किले के सामने जहां उनका राज्यभिषेक हुआ था, लटका दिया गया। इस प्रकार एक असाधारण व्यक्तित्व के धनी, भारत सम्राट की गौरवपूर्ण जीवन यात्रा पूरी हुई।
बैरमखाँ ने सैनिकों के सशस्त्र दल को हेमचन्द्र के अस्सी वर्षीय पिता के पास भेजा। उन को मुस्लमान होने अथवा कत्ल होने का विकल्प दिया गया। वृद्ध पिता ने गर्व से उत्तर दिया कि 'जिन देवों की अस्सी वर्ष तक पूजा अर्चना की है उन्हें कुछ वर्ष और जीने के लोभ में नहीं त्यागूंगा'। उत्तर के साथ ही उन्हे कत्ल कर दिया गया था। दिल्ली पहुँच कर अकबर ने 'कत्ले-आम' करवाया ताकि लोगों में भय का संचार हो और वह दोबारा विद्रोह का साहस ना कर सकें। कटे हुये सिरों के मीनार खडे किये गये। पानीपत के युद्ध संग्रहालय में इस संदर्भ का ऐक चित्र आज भी हिन्दूओं की दुर्दशा के समारक के रूप मे सुरक्षित है किन्तु हिन्दू समाज के लिय़े शर्म का विषय तो यह है कि हिन्दू सम्राट हेम चन्द्र विक्रमादूतीय का समृति चिन्ह भारत की राजधानी दिल्ली या हरियाणा में कहीं नहीं है।

Friday, 5 February 2016

अयोध्या में राममंदिर के ऊपर बनाई गई थी मस्जिद – डॉ. के.के. मोहम्म

डॉ.के.के. मोहम्मद

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रसिध्द पुरातत्ववेत्ता डॉ. के.के. मोहम्मद ने, वर्षों बाद भी अयोध्या प्रकरण का समाधान नहीं निकलने के लिए वामपंथी इतिहासकारों को उत्तरदायी ठहराया है । उनके अनुसार वामपंथियों ने इस मुद्दों का समाधान नहीं होने दिया ।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण उत्तर क्षेत्र के पूर्व निदेशक डॉ. मोहम्मद ने मलयालम में लिखी आत्मकथा ‘जानएन्ना भारतीयन’ (मैं एक भारतीय) में यह दावा करते हुए कहा है कि, ‘वामपंथी इतिहासकारों ने इस मुद्दे को लेकर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेताओं के साथ मिलकर देश के मुसलमानों को पथभ्रष्ट किया ।’ उनके अनुसार, इन लोगों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय तक को भी पथभ्रष्ट करने का प्रयास किया था ।
अपनी आत्मकथा में डॉ.के.के. मोहम्मद ने बताया है कि, १९७६-७७ के कालावधि में एएसआइ के तत्कालीन महानिदेशक प्रो. बीबी लाल के नेतृत्व में पुरातत्ववेत्ताओं के दल द्वारा अयोध्या में किए गए उत्खनन के कालावधि में मंदिरों के ऊपर बने कलश के नीचे लगाया जाने वाला गोल पत्थर मिला । यह पत्थर केवल मंदिर में ही लगाया जाता है । इसी प्रकार जलाभिषेक के पश्‍चात, मगरमच्छ के आकार की जल प्रवाहित करनेवाली प्रणाली भी मिली है ।

देश के एक प्रमुख पोर्टल समाचार से बात करते हुए डॉ. मोहम्मद ने बताया कि, इस मुद्दे को लेकर इरफान हबीब (भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष) के नेतृत्व में कार्रवाई समिति की कई बैठकें हुईं थीं ।
उन्होंने कहा कि, ‘रोमिला थापर, बिपिन चंद्रा और एस गोपाल सहित इतिहासकारोने कट्टरपंथी मुसलमान समूहों के साथ मिलकर तर्क दिया था कि, १९ वीं शताब्दी से पहले मंदिर की तोडफोड और अयोध्या में बौद्ध जैन केंद्र होने का कोई संदर्भ नहीं है । इसका इतिहासकार इरफान हबीब, आरएस शर्मा, डीएन झा, सूरज बेन और अख्तर अली ने भी समर्थन किया था ।’ इनमें से कइयों ने सरकारी बैठकों में हिस्सा लिया और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का खुला समर्थन किया ।’
पुस्तक के एक अध्याय में डॉ. मोहम्मद ने लिखा है, ‘जो कुछ भी मैंने जाना और कहा है, वह ऐतिहासिक सच है । हमे विवादित स्थल पर एक नहीं, बल्कि १४ स्तंभ मिले थे । सभी स्तंभों पर कलश खुदे थे । ये ११ वीं व १२ वीं शताब्दी के मंदिरों में पाए जानेवाले कलश के समान थे । कलश ऐसे नौ प्रतीकों में एक हैं, जो मंदिर में होते हैं । इस से कुछ मात्रा में यह भी स्पष्ट हो गया था कि, मस्जिद एक मंदिर के अवशेष पर खडी है । उन दिनों मैंने इस बारे में अंग्रेजी के कई समाचार पत्रों को लिखा था ।
उन्होंने यह भी बताया है कि, मेरे विचार को केवल एक समाचार पत्र ने प्रकाशित किया और वह भी ‘लेटर टू एडिटर कॉलम’ में ।’
हिन्दुओ, ध्यान रखें कि कोई कितने भी प्रमाण दे; परंतु हिंदुद्रोही और अल्पसंख्यक कभी भी हिन्दुआें को अयोध्या में राममंदिर नहीं बनाने देंगे । इसलिए राममंदिर का निर्माण करने हेतु संगठित हो जाएं  

Wednesday, 27 January 2016

‘બાપા સીતારામ’ બગદાણા ગામમાં બજરંગદાસબાપાનો ગુરૂ આશ્રમ તરીકે જગવિખ્યાત આશ્રમ




બગદાણા નામ સાંભળાતા જ આપણા મુખમાં એક જ નામ આવે ‘બાપા સીતારામ’. ગુજરાત સહિત દેશ-દુનિયામાં બાપા સીતારામ નામ ગુંજતુ કરનાર પૂં. બજરંગદાસ બાપાની આવતીકાલે 39મી પૂણ્યતિથિ છે. ત્યારે ભારતભરમાંથી ભક્તો બગદાણા આવીને ગુરૂ મહારાજના ચરણોમાં શીશ નમાવશે. ભાવનગરથી 85 કિ.મી.ના અંતરે આવેલા સુપ્રસિદ્ધ તીર્થસ્થાન બગદાણા ખાતે પૂ. બજરંગદાસ બાપાનું મંદિર યાત્રાધામ બન્યું છે. અહીં વર્ષભર શ્રધ્ધાળુઓનો જમેલો રહે છે. ગુરુપૂર્ણિમા ઉત્સવ પ્રસંગે અહીં લાખોની મેદની ઉમટે છે. પ્રાત:કાળે ગુરુપૂજન અને દિવસભર શ્રધ્ધાળુઓની ભીડ રહે છે. અહીં યાત્રિકો માટે ચોવીસ કલાક ભોજન વ્યવસ્થા છે. બજરંગદાસ બાપાની ચાંદીની પ્રતિમા અને આશ્રમ પરિસરમાં શિવાલય દર્શનીય છે.

બગદાણા ઘણા લોકો માટે શ્રદ્ધા અને વિશ્વાસની જગ્યા છે. મોટું નગર હોય કે નાનુ ગામ પણ બાપા સીતારામની મઢુલી તો બધે અચૂક જોવા મળે છે. લગભગ 100 વર્ષ પહેલા બાપા બજરંગ દાસનો જન્મ ઝાંઝરીયા હનુમાનની જગ્યામાં થયો હતો. આ ગામ બજરંગદાસબાપાનું બગદાણા પણ કહેવાય છે. આ ગામ પાસે બગડાલવ ઋષિનો બગડાલવ નામનો કુંડ છે. અહીં બગડ નદી વહે છે. જ્યાં ત્રિવેણી સંગમ થાય છે. તેની પાસે બગડેશ્વર મહાદેવ નામે સુંદર શિવાલય પણ આવેલું છે.
કુદરતી સૌંદર્યથી ભરપુર બગદાણા ગામમાં બજરંગદાસબાપાનો સુંદર આશ્રમ આવેલ છે. પહેલાં આ સ્થળે બજરંગદાસબાપાની ઝુંપડી આવેલી હતી. અત્યારે એ જ સ્થળે મોટો આશ્રમ આવેલો છે. જે ગુરૂ આશ્રમ તરીકે જગવિખ્યાત છે. બાપાએ ભુખ્યાને ભોજન મળી રહે તે માટે અન્નક્ષેત્ર ચાલુ કર્યું હતું જે આજે પણ ચાલુ જ છે. આ આશ્રમમાં વર્ષમાં બે મોટા ઉત્સવો ઉજવવામાં આવે છે. જેમાં એક બજરંગદાસબાપાની પુણ્યતિથિ, જે પોષ વદ ૪નાં દિવસે અને બીજો ઉત્સવ અષાઢ સુદ ૧૫ એટલે કે ગુરુ પૂર્ણિમાનાં દિવસે ધામધુમથી ઉજવાય છે. આમ તો ગમે ત્યારે દર્શનાર્થીઓ અહીં આવે છે. પરંતુ આ બે દિવસે અહીં દૂર દૂરથી ભાવિક ભક્તો અહીં ઉમટી પડે છે. આ દિવસે મોટા મેળાઓનું આયોજન થાય છે અને લાખો ભક્તો આવે છે. અહીં આશ્રમનો વહીવટ ટ્રસ્ટ દ્વારા થાય છે.
ભાવનગર જિલ્લાના મહુવા તાલુકાના બગદાણા ગામમાં ઘણાં વર્ષો પહેલાં એક સંત થઈ ગયા હતા. એમનું નામ બજરંગદાસ બાપા હતું. બગદ નદીને કાંઠે આ બગદાણા ગામ આવેલું છે. ગામમાં ઓછી વસ્તી છે છતાં પણ ગામ ઘણું રૂડું છે. બગદાણા ગામનું નામ સાંભળે એટલે ભક્તો રાજીના રેડ થઈ જાય. બજરંગદાસ બાપાએ આ બગદાણા ગામમાં સમાધિ લીધી હતી. સંતભૂમિ સૌરાષ્ટ્રની અને એમાં બગદાણા ગામ બાપા બજરંગદાસ બિરાજતા અને ‘સીતારામ સીતારામ’ રટતા.

માન્યતા અનુસાર કહેવામાં આવે છે કે, જે દિવસે બાપાએ સમાધિ લીધી હતી એ દિવસે બગદ નદીના નીર પણ થંભી ગયા હતા. પવન પણ થંભી ગયો હતો અને બાપાના બગીચામાં રહેનારા પશુ-પંખી એ દિવસે બોલ્યાં પણ ન હતા. બગદાણા ધામમાં ઘણાં એવાં મંદિરો પણ જોવા જેવાં છે જેમ કે બજરંગદાસ બાપાનું મંદિર, બગદેશ્વર મહાદેવ મંદિર, બાપાનું સમાધિ મંદિર, ગાડી મંદિર, બગદ નદી. ખરેખર ત્યાંનું વાતાવરણ જોઇ એવું લાગે છે કે અહીંયા જ રોકાઇ જવાનું મન થયા કરે છે.  અહીં એવી પણ માન્યતા છે કે બાપા ભક્તોની માનતા પૂરી કરે છે અને અહીં આવવાથી તમારા ભવનો ફેરો પલટાઈ જશે.

બગદાણા જવા માટે  એસ.ટી. બસ મળે છે ભાવનગર અને તળાજા વગેરે સ્થળેથી પણ બસની સગવડ છે. બગદાણા ધામમાં દર પૂનમે મેળો પણ ભરાય છે.

Friday, 15 January 2016

સબરીમાલા: મન, આત્મા અને દેહ શુદ્ધિની ‘મકરજ્યોત’


કેરળના સુપ્રસિદ્ધ સબરીમાલા મંદિરમાં મકરસંક્રાંતિ પર્વ નિમિત્તે દિવ્ય જ્યોતિ અથવા મકરજ્યોતિનાં દર્શન માટે ભાવિકોની જનમેદની ઉમટી હતી. કુદરતનો આ ચમત્કાર નિહાળવા માટે દક્ષિણ ભારતના વિવિધ ભાગોમાંથી શ્રદ્ધાળુઓ આ મંદિરમાં આવે છે. પર્વતોની વચ્ચે આવેલું આ મંદિર એક પર્વતની ટોચ પર આવેલું છે. એવી માન્યતા છે કે અહીં દર્શન માટે આવનારાઓની માનતા પૂરી થાય છે.
કેરળમાં સમૃદ્ધ જંગળોની વચ્ચે આવેલ પ્રસિદ્ધ તીર્થ એટલે સબરીમાલા. પશ્ચિમી ઘાટ પર્વત શ્રેણીમાં આવેલા આ સ્થળનો પ્રાકૃતિક સૌંદર્ય આજે પણ પોતાનામાં પ્રાચીન માટે જાણીતું છે. ત્યારે જોઈએ એનું પૌરાણિક મહાત્મ્ય.
પૌરાણિક કથાઓ મુજબ સબરીમાલામાં હિન્દુ ભગવાન અયપ્પાએ ખતરનાક રાક્ષસ મહિષીને માર્યા બાદ તપસ્યા કરી હતી. સબરીમાલાનું મંદિર અનેક લોકો માટે એકતા, સમાનતા અને દુનિયાની તમામ સારાઇઓનું એક પ્રતીક છે. આ મંદિરનો સંદેશ છે કે સારાઈનો નરસાઈ ઉપર હંમેશા વિજય થાય છે અને અહીં પ્રત્યેક વ્યક્તિને ન્યાય મળે છે. આ એવા કેટલાંક મંદિરોમાંનું એક છે કે જે ભક્તોને વંશ, જાતિ અને ધર્મથી ઉપર જઈ સ્વીકારે છે. કહેવાય છે કે ભગવાન વિષ્ણુનાં એક અવતાર પરશુરામે પોતાનો પરશુ (કુહાડો)) ફેંકી સબરીમાલામાં અયપ્પાની મૂર્તિનું નિર્માણ કર્યુ હતું. સબરીમાલા સરકારના એક જાહેર સાહસ ત્રાણવકોર દેવાસ્મો બોર્ડ (ટીડીબી) હેઠળ આવે છે.
મકરવિલાક્કૂ અને મંડળપૂજા
સબરીમાલામાં મુખ્યત્વે બે વાર્ષિક ઉત્સવ ઉજવાય છે. તેમાં મકરસંક્રાંતિએ ઉજવાતો મકરવિલાક્કૂ ખૂબ જ પ્રસિદ્ધ છે અને તેમાં પાંચ લાખથી વધુ તીર્થયાત્રીઓ આવે છે. આ ઉત્સવ 14મી જાન્યુઆરીએ ઉજવાય છે. આ શુભ દિવસે ભગવાન અયપ્પાની મૂર્તિ મંદિરમાં પ્રતિસ્થાપિત કરાય છે અને તેને રાજવી આભૂષણોથી શણગારવામાં આવે છે. આ તહેવારનો આરંભ થિરુવાભરમણ જુલૂસ (દાગીનાઓની યાત્રા)થી થાય છે અને દાગીનાઓને પંડલમ મહેલથી લાવવામાં આવે છે. દર વર્ષે હજારો શ્રદ્ધાળુઓ આ જુલૂસ જોવા મંદિરમાં ઊભા રહે છે. આ ભવ્ય શોભાયાત્રા ધામધૂમથી અને આનંદ સાથે મુખ્ય મંદિર સુધી પહોંચે છે. આ પર્વ સાત દિવસ ચાલે છે અને સાતમા દિવસે ગુરુથી નામની એક વિધિ સાથે સંપન્ન થાય છે. આ વિધિ જંગલનાં દેવી-દેવતાઓને પ્રસન્ન કરવા માટે કરાયે છે. આ દિવસે મકર નામનાં એક શુભ ધ્રુવીય તારાનો આકાશમાં ઉદય થાય છે. મકરવિલાક્કૂ પોતાની ઇન્દ્રિઓની આધ્યાત્મિક સંતુષ્ટિ નક્કી કરે છે અને એ પણ નક્કી કરે છે કે આપ પોતાના મન, આત્મા અને શરીરને વાસ્તવમાં શુદ્ધ કરીને જ ઘરે જાઓ. સબરીમાલામાં એક પવિત્ર સ્થળ મુસ્લિમ સંત વાવરૂ સ્વામીને સમર્પિત છે. એટલે જ આ સ્થળ ધાર્મિક સહિષ્ણુતા અને સદ્ભાવનો પણ પ્રતીક ગણાય છે.
યાત્રા મુશ્કેલ, પણ આહ્લાદક
સબરીમાલાનો શાબ્દિક અર્થ છે રામાયણ કાળનાં પૌરાણિક ચરિત્ર સબરીની પર્વત શ્રેણી. સબરીમાલા પર્વતો પથનામથિટ્ટા જિલ્લાની પૂર્વે છે અને આ વિસ્તાર પેરિયાર ટાઇગર હિલ રિઝર્વ હેઠળ આવે છે કે જે કેરળના સૌંદર્યની ખાસિયતને આદર્શ રીતે ગ્રહણ કરે છે. સબરીમલાના મુખ્ય મંદિરના ઇષ્ટદેવ ભગવાન અયપ્પા અથવા સ્વામી અયપ્પા છે. જે શ્રદ્ધાળુ સબરીમાલા તીર્થ યાત્રાએ આવવા માંગે છે, તેમને 14 દિવસ સુધી માંસાહારી ભોજન તથા સાંસારિક સુખોનો ત્યાગ કરવાનો હોય છે. મંદિર તરફ એક લાંબી યાત્રામાં હર્યા-ભર્યા ઝાડ, નદીઓ સહિત અનેક દર્શનીય સ્થળો આવે છે અને પ્રત્યેક વ્યક્તિએ જીવનમાં કમ સે કમ એક વખત આ રસપ્રદ અનુભવ ચોક્કસ લેવો જોઇએ. સબરીમાલા તીર્થયાત્રા નવેમ્બર માસના મધ્યથી શરૂ થઈ જાન્યુઆરીના ચોથા અઠવાડિયામાં સમાપ્ત થાય છે. જે લોકો પગપાળા ચાલી મંદિર જવાનું પસંદ કરે છે, તેમના માટે આ કઠિન યાત્રા છે, પરંતુ થકવનાર નથી, કારણ કે યાત્રા દરમિયાન આપને વૃક્ષો મળશે કે જે આપને આરામ, શાંતિ અને શરણ પ્રદાન કરે છે. સબરીમાલા દુનિયામાં સૌથી મોટા વાર્ષિક તીર્થ સ્થળ તરીકે ગણાય છે, કારણ કે અહીં દર વર્ષે 4થી 5 કરોડ ભક્તો આવે છે. અયપ્પાનું મંદિર 18 પર્વતો વચ્ચે છે કે જે એક સુરમ્ય દૃશ્ય છે. આ મંદિર સઘન જંગલો તથા પર્વતમાળાઓથી ઘેરાયેલાં છે અને એક પહાડ પર સમુદ્ર તલથી સરેરાશ ઉંચાઈ 1535 ફુટની ઉંચાઈ પર આવેલ છે.
કેવી રીતે જશો? (ડેસ્ટિનેશનલ પૉઇંટ તરીકે કેરળના પંબાનો નક્શો મૂકવો જોઇએ..)
આપ સબરીમાલા પંબા નગર વિસ્તાર દ્વારા પહોંચી શકો છો કે જે અન્ય મુખ્ય શહેરો સાથે રેલવે અને રોડ માર્ગથી જોડાયેલું છે. સબરીમાલ આવનાર લોકો માટે ટૂરિસ્ટ પૅકેજ અને સસ્તી હોટેલ્સ પણ દરેક મોસમમાં ઉપલબ્ધ હોય છે. અહીં રહેવા માટે સબરીમાલા ટાઉનશિપ પણ છે કે જેમાં કોઈ પણ સ્થાનિક રહેવાસી નથી. આ ટાઉનશિપ તીર્થયાત્રીઓ, દુકાનો અને હોટેલો સાથે વ્યસ્ત હોય છે.
(કનૈયા કોષ્ટી)

Wednesday, 13 January 2016

लोहड़ी : संस्‍कृति और उल्‍लास का पर्व

लोहड़ी आज, जानिये क्‍या है संस्‍कृति और उल्‍लास के इस पर्व की महिमा
लोहड़ी का पर्व पूरे उत्तर भारत में बुधवार को धूमधाम से मनाया जा रहा है। यह पर्व पूरे उत्तर भारत विशेषकर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल और अन्य पड़ोसी राज्यों में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। मकर संक्राति की पूर्व संध्या पर मनाए जाने वाले इस त्यौहार में सिख एवं पंजाबी समुदाय के लोग आग जलाकर प्रकृति की पूजा करते हैं और इस दौरान लोग परंपरागत तरीके से और खुशी के गीतों के बीच लोहड़ी मनाते हैं। आग में तिल, गजक, मूंगफली, गुड़ और गन्ना चढ़ाते हुए लोहड़ी मनाते हैं।
लोहड़ी केवल पंजाब तक ही सीमित नहीं है, लेकिन वहां इस त्योहार की बात ही कुछ और है। इस दिन यहां रंग और खुशी अपने शबाब पर होती है। लोहड़ी त्योहार ही है, प्रकृति को धन्यवाद कहने का। लोहड़ी को मकर संक्रांति के आगमन की दस्तक भी कहा जाता है। लोहड़ी की संध्या में लोकगीतों की प्रस्तुति खूबसूरत समां बांध देती है। लोहड़ी के दिन खेतों में झूमती फसलों को घर ला, अग्नि प्रज्ज्वलित कर उसके चारों ओर नाच-गाकर शुक्रिया अदा किया जाता है। यह भी देवों की पूजा करने का एक अलग तरीका है। लोहड़ी के दिन भंगड़े की गूंज और शाम होते ही लकडिय़ों की आग और आग में डाले जाने वाले खाद्यान्नों की महक एक गांव को दूसरे गांव व एक घर को दूसरे घर से बांधे रखती है।
इस त्योहार का सीधा संबंध सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से होता है। सूर्य स्वयं आग व शक्ति के कारक हैं, इसलिए इनके त्योहार पर अग्नि की पूजा तो होनी ही है। किसान इसे रबी की फसल आने पर अपने देवों को प्रसन्न करते हुए मनाते हैं।
उधर, पंजाब सरकार ने लोहड़ी त्योहार की पूर्व संध्या पर पूरे राज्य में सप्ताह भर जश्न मनाने की घोषणा की और इस दौरान जिन लोगों के यहां बेटी का जन्म होगा उन्हें विशेष तौर पर सम्मान दिया जाएगा। राज्य के सभी उपायुक्तों को लोहड़ी के त्यौहार के मौके पर विशेष जश्न मनाने के निर्देश दिये गए हैं। पंजाब के सभी जिलों में सामाजिक सुरक्षा अधिकारियों से भी कहा गया है कि स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय करें ताकि एक या अधिक नवजात बच्चियों के गौरवान्वित अभिभावकों को पर्याप्त रूप से सम्मानित किया जा सके।
ज़ी मीडिया ब्‍यूरो 

Tuesday, 12 January 2016

સ્‍વામી વિવેકાનંદજીના વિચારો સાથે યુવકોના ઘડતરનાં સંકલ્‍પ લઇએ


સમગ્ર ભારત વર્ષ જે મહાપુરૂષને યાદ કરે છે તેવા યુવકોના આદર્શ, હિમાલય જેવા અડીખમ, દૃઢ મનોબળ યુકત આકર્ષક મુદ્રા ધરાવનારા સ્‍વામીની જન્‍મ જયંતીને યુવા દિન તરીકે એ માટે ઉજવવામાં આવે છે કે તેઓએ પોતાની ભરયુવાનીમાં દેશ માટે ઉંડુ ચિંતન કર્યુ, દેશભ્રમણ કરી પ્રજાની નિર્બળતા, લાચારી, વિવશતા, દરિદ્રતા, હિનતા અને અનેક પ્રકારની નિર્બળતાઓ નિહાળી આ પ્રજામાં નવા પ્રાણ ફંકી કહયું ઉઠો, જાગો અને ધ્‍યેયની પ્રાપ્‍તિ માટે કટિબધ્‍ધ થાઓ, એ ધ્‍યેય કર્યુ ?

   શું ફેઇસ બુક, ટવીટર, નેટ અને એવા અનેક વળગણોમાં ચોવીસે કલાક ખોવાયા રહેલું ? શું ચેટીંગ કરતાં રહી મન હી મન ખ્‍યાલી પુલાવ પકવતાં રહેવું ? શું પાનના ગલ્લે કે એવા કોઇ વ્‍યસનના સ્‍થળે સતત ગામ ગપાટા માર્યા કરી જીવન જીવવું ? ના... ના...ના... મારા યુવક મિત્રો આપણે તેમના સ્‍વપ્‍નના ભારતના નિર્માણ કરવાનું કાર્ય હજુ બાકી છે. આપ સર્વે યુવાન મિત્રો સાચા અને સાર્થક ધ્‍યેયની પ્રાપ્‍તી માટે કટિબધ્‍ધ થા ઓ !

   રાષ્‍ટ્રીય શાળા અને રાજકુમાર કોલેજના ‘જંકશન' પરની તેમની પ્રતિમા કદીએ ધ્‍યાન થી નિહાળી છે ? રામકૃષ્‍ણ આશ્રમમાં જઇ તેમના પુસ્‍તકો નિહાળ્‍યા કે વાંચ્‍યા છે? કન્‍યાકુમારીના સાગર મધ્‍યે ‘રોક મેમોરિયલ' નિહાળ્‍યું છે કે જયાં સ્‍થિત તેમની પ્રતિમા સાગરને ચેલેન્‍જ કરતાં કહે છે કે આ યૌવન તારી જેમ જ ધુધવતું રહી હમ્‍મેશ સશકત, તાકાતવાન, આત્‍મ નિર્ભર : નિર્ભય અને ભ્રષ્‍ટાચાર વિહિત ભારતનું નિર્માણ કરશે. બિલ્‍કૂલ તેમની સાથે સ્‍થિત દક્ષિણ ભારતના સંત-સુધારક ‘તિરૂવલ્લુરવલજી' સ્‍વામીજીને જાણે કે પ્રોત્‍સાહન આપી રહ્યા હોય તેવી મુદ્રામાં દૃષ્‍ટિમાન છે જયાં જઇ બન્‍નેનો સંદેશ ઝિલવો જૂરી છે.

   સ્‍વામીજીની પ્રતિમાને ફૂલહાર કરી તેના ગુણગાન ગાવા એ જયંતીની સાર્થક ઉજવણી ન કરી કહેવાય. તેમના વિચારોને અનુરૂપ એક વર્ષમાં દશ યુવકોનું ઘડતર કરવાનો સંકલ્‍પ લઇ તેને સિધ્‍ધ કરવા કાટબધ્‍ધ થવું જોઇએ. તેમના નામે ચાલતી સંસ્‍થાઓ પહેલ કરશે ?

   મંદિરો, મઠો, તીર્થ સ્‍થાનો, એની પ્રતિષ્‍ઠા માટે તમે મને નિમંત્રણ આપો છો, અને મારી પાસેથી આશા રાખો છો કે  હું તેમાં સહયોગ આપું પણ મારા પ્‍યારા દેશવાસીઓ આજે મારો પ્રાણ તો એવું કરવા તડપી ઉઠયો છે કે, આ બધાંય મંદિરોને વેચી નાખી, તેમાંથી પ્રાપ્‍ત થનારી અપાર લક્ષ્મી વડે મારા કંગાલ ભારત દેશના આ જીર્ણશીર્ણ દેહવાળા, રોગીષ્‍ટ, દુર્બળ, ભુખ્‍યા સંતાનોનો ઉધ્‍ધાર કરૂં શું મંદિરો ઉભા કરવાની અત્‍યારે કોઇ જરૂર હોય શકે ખરી ? ના અત્‍યારે એની હરગિઝ જરૂર નથી. આજે જયારે મારો કોઇક સમયનો સુખદામ - વરદામ ભારત દેશ પોતાની અપાર અનંત વ્‍યથાઓને કારણે મૃત્‍યુ શટયા પર પડી, અસહ્ય યંત્રણ ભોગવી રહયો છે.

   ત્‍યારે તેને સંજીવની ની જરૂર છે. તે સંજીવની આપવાની તમારા વર્તમાન ધર્મ, કર્મ કે મંદિરો અને મઠો પાસે મુદલ શકિત રહી નથી. એ સંજીવની તમારી પોતાની પરમ પવિત્ર આત્‍મ શકિતમાંથી પેદા થઇ શકે તેમ છે. એના સર્જક તમે પોતે જ બની શકો તેમ છો. અંધશ્રધ્‍ધા, સામાજીક રૂઢિઓ અને ધર્મ વિષેના ખોટા ખ્‍યાલોની જે કાળ મીંઢ વ્રજશૃંખલાઓએ તમારા આત્‍માની આસપા ભરડો લઇ જે રીતે તમારા પ્રાણને રૂંધી રાખ્‍યો છે, એ શૃંખલાઓના જીવલેણ બંધનોને તોડવામાં જ તમારા દેશનું કલ્‍યાણ અને તમારા આત્‍માનું પરમ ગૌરવ છૂપાયેલા છે. તમારી આત્‍મશકિતને જાગૃત કરો. આ મૂઢમતિઓ! પથ્‍થરના મંદિરની નિર્જીવ મૂર્તિઓની પૂજા કરતાં પહેલાં તમારા પ્રાણ મંદિરમાં રહેલા શિવને ઓળખી કાઢવાનો  પ્રયાસ કરો. તમારા હૃદય મંદિરમાં સત્‍યનો દીવો પ્રગટાવીને એ અદ્રશ્‍ય સૌંદર્ય - મૂર્તિનું  દર્શન કરો... એનું જ પૂજન કરો.. એનું જ અર્ચન કરો... અને પછી.. તમે જે કંઇ કરી શકશો એ એવું અપૂર્વ, એવું આનંદદાયક અને નિઃસીમ સુખથી ભરેલું હશે કે આના હીન ભાગી ભારત દેશની એ ભવ્‍ય સિધ્‍ધિને સારૂં વિશ્વ આヘર્ય મુગ્‍ધ નેત્રે જોઇ રહેશે.

   -: સંકલન :-
   ડો. ગિરીશ જે. ત્રિવેદી
   (સેવા નિવૃત હિન્‍દી-પ્રોફેસર સૌરાષ્‍ટ્ર યુનિ. રાજકોટ) 
‘ઓમ' ૧ સોમનાથ સોસાયટી, ગલી નં. ર, રોઝરી સ્‍કુલ પાસે, 
૧પ૦ ફુટ રીંગ રોડ, રાજકોટ.

Friday, 1 January 2016

કાલ ભૈરવજી : બ્રહ્માજીના અહંકારને નષ્ટ કર્યો હતો.





કારતક માસના વદ પક્ષની આઠમના દિવસે મધ્યાહ્ન કાળમાં ભગવાન કાલ ભૈરવજીનું અવતરણ થયું હતું. તેથી આ દિવસે કાલ ભૈરવ જયંતી મનાવવામાં આવ છે. શ્રદ્ધાળુ ભક્તો આ દિવસે વ્રત પણ રાખે છે. આ દિવસના દરેક પ્રહરમાં કાલ ભૈરવ અને ઈશાન નામના શિવની પૂજા કરવાનું અને અર્ધ્ય આપવાનું વિધાન છે. મધ્ય રાત્રિ પછી કાલ ભૈરવની પૂજા અર્ચના કરવામાં આવે છે. આખી રાત જાગરણ કરવામાં આવે છે. એવી માન્યતા છે કે ભગવાન ભૈરવનું વાહન કૂતરો છે. તેથી આ દિવસે કૂતરાં ખાસ કરીને કાળા રંગના કૂતરાંની પણ પૂજા કરવામાં આવે છે.

આ દિવસના વ્રતનો ઉલ્લેખ શિવ પુરાણમાં વિસ્તારથી કરવામાં આવ્યો છે. કાલભૈરવને ભગવાન શિવજીનું જ સ્વરૂપ માનવામાં આવે છે. એવી માન્યતા છે કે આ દિવસે બપોરના સમયે શિવજીના પ્રિય ગણ ભૈરવનાથનો જન્મ થયો હતો. ભૈરવથી કાળ પણ ભયભીત રહે છે, તેથી તેમને કાલભૈરવ પણ કહે છે. ભારતમાં ભૈરવજીનાં ઘણાં મંદિરો છે, જેમાં કાશીમાં આવેલું કાલ ભૈરવ મંદિર જગપ્રસિદ્ધ છે.


ભૈરવજીનું વ્રત-પૂજન ગણેશજી, વિષ્ણુ ભગવાન, યમ, ચંદ્ર, કુંબેર વગેરેએ કર્યું હતું અને આ કાલ ભૈરવ જયંતીના વ્રતના પ્રભાવથી જ ભગવાન વિષ્ણુ લક્ષ્મીપતિ બન્યા હતા, અપ્સરાઓને સૌભાગ્ય મળ્યું હતું અને ઘણાં રાજા ચક્રવર્તી બન્યા હતા. તેથી તેને સમસ્ત કામનાઓ પૂર્ણ કરતું વ્રત માનવામાં આવે છે.
ભૈરવજીના ઉપવાસ માટે આઠમ અથવા ચૌદશનો દિવસ જ્યારે રવિવાર કે મંગળવાર હોય તેને શ્રેષ્ઠ માનવામાં આવે છે. એવું માનવામાં આવે છે કે આઠમના દિવસે સ્નાન કરીને પિતૃઓને શ્રાદ્ધ તર્પણ કર્યાં પછી જો કાલ ભૈરવની પૂજા કરવામાં આવે તો ઉપાસકનાં તમામ સંકટો અને વિઘ્નો દૂર થાય છે. ભૈરવ મંદિરમાં ચઢાવવામાં આવેલા કાળા દોરાને ગળા અથવા બાવડા પર બાંધવામાં આવે તો તે વ્યક્તિ પર ભૂત-પ્રેત અને જાદૂ-ટોણા વગેરેની કોઈ અસર થતી નથી. શિવ પુરાણ, શતરુદ્ર સંહિતાના અધ્યાય-૮ અનુસાર ભગવાન શંકરે આ જ આઠમના દિવસે બ્રહ્માજીના અહંકારને નષ્ટ કર્યો હતો. તેથી આ દિવસ ભૈરવ અષ્ટમી તરીકે ઓળખાવા લાગ્યો.........



Shri Shani Chalisa


કોર્ટની બહાર એક ચાની લારીવાળા ની દીકરી કોર્ટમાં જજ બની

Shruti


 એક પ્રેરક ઘટના... પંજાબના જાલંધરના નાકોદર જિલ્લાની એક કોર્ટમાં એક યુવતી શ્રુતીની નિમણૂક જજ તરીકે થઇ છે. સામાન્‍ય લાગતી આ ઘટનામાં અસામાન્‍યતા પડદા પાછળ રહેલી છે. જજ શ્રુતીએ સ્‍થાન ગ્રહણ કર્યું ત્‍યારે કોર્ટની બહાર એક ચાની લારીવાળા ગરીબ વડીલની આંખ આંસુથી છલકાઇ હતી. આ આંસુ હર્ષના હતા. આ વડીલનું નામ સુરેન્‍દ્રકુમાર છે. પેટિયું રળવા ચાની લારી કરી... પરિવારનું ગુજરાન ચલાવ્‍યું ... દીકરીને ભણાવી... આ દીકરી કોર્ટમાં જજ બનીને આવી હતી...
   ગરીબ બાપની દીકરી શ્રુતિ પંજાબ સિવિલ સર્વિસ (ન્‍યાય)ની પરીક્ષામાં પ્રથમ ક્રમે પાસ થઇ હતી. એક વર્ષની તાલીમ બાદ પિતા જયાં ચા વેચે છે તે કોર્ટમાં જજ બનીને આવી.. પિતા સુરેન્‍દ્રભાઇએ આંસુ સાથે કહ્યું- ‘મને જે લોકો પરેશાન કરતા એ હવે સલામ ભરે છે...'
   આ ન્‍યુઝ પ્રેરક છે અને સકારાત્‍મક છે. કરોડો લોકોને પ્રેરણા આપતા સમાચારમાં ભારતીય મીડિયાને રસ પડતો નથી, દેશના મોટા ગણાતા માધ્‍યમો માટે આવા સમાચારો ફાલતુ ગણાય છે. આપણે ભલે શ્રુતિ મેડમને ઓળખતા નથી, પણ તેમને અને તેમના પિતાશ્રીની સાધનાને સલામ કરીએ.
 શ્રુતિ મેડમ જેવાને વારસાની હૂંફની જરૂર ન હોય, ક્ષમતા હોય તો તણખલા પણ પથ્‍થરો ફાડીને ઉગી નીકળે છે.

Yogi Aditynath Maharaj ki sena ' Hindu Yuva Vahini '