Wednesday, 5 April 2017

राम नवमी

 रामनवमी पूरे भारत वर्ष में लोगों के द्वारा 5 अप्रैल, दिन बुधवार को मनाया जाएगा।2017 में रामनवमी पूजा का महूर्त : सुबह 11 बजकर 5 मिनट से दोपहर 1 बजकर 32 मिनट तक।पूजा करने की पूरा कार्यकाल: 2 घंटे और 27 मिनट।


रामनवमी एक धार्मिक और पारम्परिक त्योहार है, जो हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा पूरे उत्साह के साथ हर साल मनाया जाता है। यह अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के पुत्र भगवान राम, के जन्मदिन के रुप में मनाया जाता है। भगवान राम, हिन्दू देवता, भगवान विष्णु के दशावतार में से 7वें अवतार थे। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, यह त्योहार हर वर्ष चैत्र मास (महीने) के शुक्ल पक्ष के 9वें दिन पड़ता है। रामनवमी को चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी भी कहा जाता है, जो नौ दिन लम्बें चैत्र-नवरात्री के त्योहार के साथ समाप्त होती है।
हिन्दू धर्म के लोग इसे नौ दिन के त्योहार के रुप में, पूरे नौ दिनों पर राम चरित्र मानस के अखंड पाठ, धार्मिक भजन, हवन, पारम्परिक कीर्तन और पूजा व आरती के बाद प्रसाद के वितरण आदि का आयोजन करने के द्वारा मनाते हैं। भक्त भगवान राम की शिशु के रुप में मूर्ति बनाते हैं और उसके सामने भगवान की पूजा करते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं कि, भगावन विष्णु के 7वें अवतार भगवान राम थे और उन्होंने सामान्य लोगों के बीच में उनकी समस्याएं हटाने के लिए जन्म लिया था। लोग अपनी समस्याओं को दूर करने और बहुत अधिक समृद्धि व सफलता प्राप्त करने के उद्देश्य से मन्दिरों और अन्य धार्मिक स्थलों को अपने पारम्परिक अनुष्ठानों करने के लिए सुसज्जित करते हैं और प्रभु को फल व फूल अर्पण करते हैं। वे सब इस दिन वैदिक मंत्रों का जाप, आरती और अन्य बहुत से धार्मिक भजनों का गान करने के लिए मन्दिरों या अन्य धार्मिक स्थलों पर एकत्रित होते हैं।

बहुत से भक्त इस त्योहार को पूरे नौ दिनों का उपवास रखने के द्वारा मनाते हैं और नवरात्री के अन्तिम दिन उन्हें पूरा आशीर्वाद मिलता है। दक्षिणी भारतीय लोग इस दिन को भगवान राम और माता सीता की शादी की सालगिरह के रुप में मनाते हैं। दक्षिणी क्षेत्र में नवरात्री मनाने के लिए सभी मन्दिर सजाए जाते हैं। यद्यपि, वाल्मिकी रामायण के अनुसार मिथला और अयोध्या के लोग शादी की सालगिरह को विवाह पंचमी पर मनाते हैं। हजारों श्रद्धालुओं के द्वारा अयोध्या (उत्तर प्रदेश), सीतामढ़ी, बिहार, रामेश्वरम, तमिलनाडु, भद्राचलम, आंध्रप्रदेश आदि, स्थलों पर राम नवमी के भव्य समारोह का आयोजन किया जाता है। कुछ स्थानों (जैसे: अयोध्या, वनारस, आदि) पर, भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की रथ यात्रा अर्थात् जूलुस (शोभा यात्रा) को हजारों श्रद्धालुओं के द्वारा पवित्र नदी गंगा या सरयू में पवित्र डुबकी लेने के बाद निकाला जाता है।

राम नवमी का इतिहास

रामायण हिन्दू धर्म का महान और धार्मिक महाकाव्य है, जो अयोध्या के राजा दशरथ और उनके पुत्र प्रभु श्री राम का इतिहास बताता है। एकबार, त्रेता युग में दशरथ नामक एक राजा थे, जिनकी तीन पत्नियाँ (कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी) थी। उनके कोई भी संतान नहीं थी, जिसके कारण वे अयोध्या के भावी भविष्य के राजा के लिए चिन्तित रहते थे। एक दिन उन्हें महान ऋषि वशिष्ठ ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा को पूरा करने के लिए सन्तान प्राप्ति यज्ञ करने की सलाह दी।
इस यज्ञ को करने के लिए विशेष रुप से ऋष्यशृंग को आमंत्रित किया गया। यज्ञ पूरा करने के बाद, यज्ञ देवता ने उन्हें दिव्य खीर से भरा हुआ कटोरा दिया। उन्होने कटोरे की दिव्य खीर को तीनों पत्नियों में खिला देने के लिए दिया। खीर खाने के कुछ दिनों के बाद में, सभी रानियाँ गर्भवती हो गई। चैत्र के महीने में नौंवी के दिन कौशल्या ने दोपहर के समय राम को, कैकेयी ने भरत को और सुमित्रा ने जुड़वा पुत्र लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया।
कौशल्या के पुत्र राम, भगवान विष्णु के 7वें अवतार थे, जिन्होंने अधर्म का नाश करने और धर्म की स्थापना करने के लिए धरती पर जन्म लिया था। भगवान राम अपने भक्तों को दुष्टों के प्रहार से बचाया था उन्होंने रावण सहित सभी राक्षसों का सर्वनाश करने के द्वारा पूरी धरती से अधर्म का नाश करके पृथ्वी पर धर्म को स्थापित किया। अयोध्या के निवासी अपने नए राजा से बहुत खुश रहते थे, इसलिए उन्होंने अपने राजा का जन्मदिन हर वर्ष राम नवमी के रुप में बहुत अधिक उत्साह और आनंद के साथ मनाना शुरु कर दिया, जो आज एक परम्परा है और धार्मिक रुप से पूरे भारत में हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा मनाया जाता है।

राम नवमी का समारोह

भारत के दक्षिणी क्षेत्र में रहने वाले हिन्दू धर्म के लोग आमतौर पर इस उत्सव को कल्याणोत्सवम अर्थात् भगवान की शादी के समारोह के रुप में मनाते हैं। वे इसे, राम नवमी के दिन, अपने घरों में हिन्दू देवी-देवताओं राम-और सीता की मूर्तियों के साथ मनाते हैं। वे राम नवमी का समारोह करने के लिए दिन के अन्त में भगवान की मूर्तियों के साथ शोभायात्रा निकालते हैं। यह अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नामों से मनाई जाती है; जैसे- महाराष्ट्र में चैत्र नवरात्री, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक या तमिलनाडु में वसंतोत्सव आदि के नाम से मनाई जाती है।
लोग इस त्योहार को भगवान राम, लक्ष्मण, माता सीता और हनुमान जी की मूर्तियों को सजाने के द्वारा मनाते हैं। वे अनुष्ठान करने के लिए मिठाईयाँ, मीठा पेय, तैयार करते हैं, वे हवन और कथा करने के लिए पंडित जी को आमंत्रित करते हैं, वे अपने घरों से बुरी शक्तियों को हटाने और अच्छी शक्तियों और ऊर्जा को लाने के लिए पूजा के अन्त में धार्मिक भजन, मंत्र और आरती पढ़ते हैं। वे अपने परिवार के सदस्यों और अपने बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए भी प्रार्थना करते हैं।
वे पूरे नौ दिन या नवरात्री के अन्तिम दिन पवित्र वार्षिक पूजा करने के लिए उपवास रखते हैं। वे हिन्दूओं के पवित्र महाकाव्य रामायण का पाठ करते हैं; अपने जीवन में खुशहाली और शान्ति लाने के लिए भगवान राम और सीता की पूजा करते हैं। वे सुबह को जल्दी उठकर नहाने के बाद हिन्दूओं के देवता सूर्य की उपासना करते हैं। लोग भगवान राम के साथ, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान की पूजा करते हैं, क्योंकि ये सभी दिल से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

राम नवमी त्योहार का महत्व

राम नवमी का त्योहार हिन्दू धर्म के लोगों के लिए महान महत्व का त्योहार है। चैत्र के महीने में 9वें दिन रामनवमी के त्योहार को मनाना, पृथ्वी से बुरी शक्तियों के हटने और धरती पर दैवीय शक्तियों के आगमन का प्रतीक है। पृथ्वी से असुरी शक्तियों को हटा कर धर्म की स्थापना करने के लिए, भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ के घर पुत्र रुप में जन्म लिया था। रामनवमी हिन्दू धर्म के लोगों के लिए पारम्परिक समारोह है, जिसे वे अपनी आत्मा और शरीर को पवित्र करने के लिए पूरे उत्साह के साथ मनाते हैं। भगवान राम धरती पर विशेष कार्य या जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए अर्थात् राक्षस राज रावण को मारकर धर्म की स्थापना करने के लिए आए थे।
इस त्योहार का उत्सव बुरी शक्तियों पर अच्छाई की विजय को और अधर्म के बाद धर्म की स्थापना को प्रदर्शित करता है। राम नवमी का त्योहार प्रातः काल में हिन्दू देवता सूर्य को जल अर्पण करने के साथ शुरु होता है, क्योंकि लोगों का विश्वास है कि, भगवान राम के पूर्वज सूर्य थे। लोग पूरे दिन भक्तिमय भजनों को गाने में शामिल होने के साथ ही बहुत सी हिन्दू धार्मिक पुस्तकों का पाठ करते और सुनते हैं। इस समारोह के आयोजन पर धार्मिक लोगों या समुदायों के द्वारा वैदिक मंत्रों का जाप किया जाता है।
इस दिन पर उपवास रखना शरीर और मन को शुद्ध रखने का एक अन्य महत्वपूर्ण तरीका है। कुछ स्थानों पर, लोग धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव रामलीला का आयोजन, लोगों के सामने भगवान राम के जीवन के इतिहास को बताने के लिए करते हैं। लोग नाटकीय रुप में भगवान राम के जीवन के पूरे इतिहास को बताते हैं। राम नवमी के त्योहार की रथ यात्रा का पारम्परिक और भव्य जूलुस शान्तपूर्ण राम राज्य को प्रदर्शित करने का सबसे अच्छा तरीका है, जिसमें लोग भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान की मूर्तियों को अच्छे ढंग से सजाते हैं और फिर गलियों में शोभायात्रा निकालते हैं।
आमतौर पर, लोग शरीर और आत्मा की पूरी तरह से शुद्धि की मान्यता के साथ अयोध्या की पवित्र सरयू नदी में स्नान करते हैं। दक्षिणी क्षेत्र के लोग इस अवसर को भगवान राम और माता सीता के विवाह की सालगिरह के रुप में मनाते हैं, जो पति और पत्नी के बीच प्यार के बंधन को बढ़ाने का प्रतीक है।

ગૌહત્યા કોમવાદનું કારણ તાત્કાલિક દેશભરમાં પ્રતિબંધ મુકો :ઝૈનુલ અબેદીન અલી

કોમી એકતા માટે મુસ્લિમો ગૌમાંસ ખાવા-વેચવાનું બંધ કરે, ગૌહત્યા જ કોમવાદનું કારણ, તાત્કાલિક દેશભરમાં તેના પર પ્રતિબંધ મુકો અજમેર શરીફ દરગાહના મુખિયા અને સુન્નિ ધર્મગુરુની અપીલ

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દેશની મોટી દરગાહ પૈકી એક અજમેર શરીફ દરગાહના મુખિયા અને સુન્ની મુસ્લિમ ધર્મગુરુ ઝૈનુલ અબેદીન અલી ખાને જાહેરમાં જણાવ્યું હતું કે સદભાવનાને ખાતર મે અને મારા પરિવારે ગૌમાંસ ખાવાનું છોડી દીધુ છે. સાથે તેઓએ દેશના મુસ્લિમોને પણ વિનંતી કરી હતી કે તેઓ પણ કોમી એક્તા માટે ગૌમાંસ ખાવાનું છોડી દે. ઝૈનુલ અબેદીન અલીએ મોદી સરકારને પણ વિનંતી કરી હતી કે માત્ર કોઇ એક કે બે રાજ્યોમાં નહીં પણ પુરા દેશમાં ગૌહત્યા પર પ્રતિબંધ મુકી દેવો જોઇએ. 
 
મુસ્લિમોને સલાહ આપતા અબેદિને જણાવ્યું હતંુ કે ભારતમાં હિંદુ મુસ્લિમોની વચ્ચે ચાલી રહેલી તકરારનું મુળ ગૌહત્યા પણ છે. માટે પરિસ્થિતિને સમજીને કોમી એક્તા અને ભાઇચારા માટે મુસ્લિમોએ સામે ચાલીને હિંદુઓની ભાવનાની કદર કરવી જોઇએ અને ગૌમાંસનો ત્યાગ કરવો જોઇએ.
 
તેઓએ સરકારને વિનંતી કરી હતી કે દેશમાં જે પણ કતલખાનામાં ગાય કે તેના વંશની હત્યા થતી હોય તેેને તાત્કાલીક ધોરણે અટકાવવી જોઇએ અને આવા કતલખાના પર પ્રતિબંધ મુકવો જોઇએ.
 
પોતાના અને પરિવાર વિશે વાત કરતા તેઓએ જણાવ્યું હતું કે મારા પરિવારમાં કોઇ ગૌમાસ નહોતુ ખાતુ પણ જ્યારે કોઇ આવું ખાનારા મહેમાનો અમારે ત્યાં આવતા તેના માટે જ અમે ગૌમાંસ બનાવતા પણ હવે અમે તે પણ બંધ કરી દીધુ છે અને હું ઇચ્છુ છું કે બાકી મુસ્લિમો પણ આવુ કરે. કેમ કે જો ગૌહત્યા જ કોમવાદનું મુળ હોય તો તેનો ત્યાગ જ સચોટ અને સારો ઉપાય છે. તેઓએ સરકારને પણ વિનંતી કરતા જણાવ્યું હતું કે તાત્કાલીક ધોરણે ગૌહત્યા થતી હોય તેવા કતલખાના બંધ કરવા જોઇએ.
 
ટ્રીપલ તલાક કુરાન વિરૃદ્ધ, પ્રથા રદ કરવી જરૃરી : 

અનેક મુસ્લિમ મહિલાઓ ઇસ્લામમાં પ્રચલીત ટ્રીપલ તલાક પ્રથાનો ભોગ બની રહી છે. જેને પગલે ઝૈનુલ અબેદીન અલીએ આ પ્રથાને રદ કરવાની સલાહ આપી છે. તેઓએ ટ્રીપલ તલાકને ઇસ્લામના ન્યાયશાત્રની વિરોધી પ્રથા ગણાવી હતી. તેઓએ સ્પષ્ટ શબ્દોમાં જણાવ્યું હતું કે ટ્રીપલ તલાક પવિત્ર કુરાનની જે ભાવના છે તેની વિરૃદ્ધ છે. જ્યારે લગ્ન થાય છે ત્યારે સ્ત્રી અને પુરુષ બન્નેની સહમતી તેમાં હોય છે. આવી સ્થિતિમાં જ્યારે તલાકની વાત આવે ત્યારે પુરુષો પોતાની મરજી મુજબ આ રીતે સ્ત્રીને તરછોડી દે તે અયોગ્ય છે. જ્યારે પણ પુરુષો પોતાની પત્નીને તલાક આપે તે પહેલા ૧૦૦ વખત વીચારે.


 


Tuesday, 4 April 2017

योगीजी की सरकार की प्रथम केबिनेट

योगी की पहली कैबिनेट मीटिंग: किसानों का एक लाख रुपए तक का कर्ज माफ
कर्ज माफी के लिए योगी सरकार 36 हजार करोड़ रुपए देगी

योगी सरकार ने पहली कैबिनेट की बैठक में किसानों को बड़ी राहत देते हुए एक लाख रुपए तक का कर्ज माफ कर दिया है. योगी कैबिनेट की मंगलवार शाम पांच बजे से बैठक शुरू हो गई है.
कर्ज माफी के लिए योगी सरकार 36 हजार करोड़ रुपए देगी. फिलहाल प्रदेश के 2.15 करोड़ किसानों का एक लाख रुपए कर्ज माफ होगा.
लोक भवन में होने वाली योगी सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में पांच प्रस्तावों पर मुहर लगेगी-



1. बीजेपी के चुनावी लोक संकल्प पत्र के मुताबिक लघु और सीमांत किसानों की कर्जमाफी के प्रस्ताव पर मुहर लगने की उम्मीद थी. बीजेपी ने अपने लोक संकल्प पत्र में वादा किया था कि सरकार बनने के बाद पहली कैबिनेट बैठक में किसानों का कर्ज माफ कर दिया जाएगा.
कैबिनेट में किसानों की कर्ज माफी का प्रस्ताव पास होने से बुलंदेलखंड के 86 लाख किसानों को लाभ मिलेगा. प्रदेश में लघु और सीमांत किसानों की कुल संख्या 2.15 करोड़ है.
सीमांत किसान वे हैं जिनके पास 2.5 एकड़ भूमि या 1 हेक्टेयर से कम है. लघु किसान वे हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर या 5 एकड़ से कम भूमि है.

2. एंटी रोमियो स्क्वायड गठन के प्रस्ताव को भी मिलेगी मंजूरी.

3. अवैध बूचड़खाने के खिलाफ प्रस्ताव.

4. 100 प्रतिशत गेहूं खरीद के प्रस्ताव को भी मिलेगी हरी झंडी.

5. गाजीपुर में स्टेडियम बनाने के प्रस्ताव पर भी लग सकती है मुहर.
यूपी का मुख्‍यमंत्री बनने के बाद ताबड़तोड़ फैसले करके सुर्खियों में आए योगी आदित्‍यनाथ की पहली कैबिनेट पर प्रदेश ही नहीं पूरे देश की नजर लगी हुई है. सबसे बड़ी वजह किसानों की कर्जमाफी के वादे से जुड़ी है. उनके फैसलों की वजह से लोगों की उम्‍मीदें बढ़ गई हैं.
सरकार के कई मंत्री कह चुके हैं कि इसी बैठक में कर्जमाफी पर फैसला हो जाएगा. क्‍योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव के दौरान वादा किया था कि पहली कलम से लघु और सीमांत किसानों का कर्ज माफ किया जाएगा. उप मुख्‍यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य कह चुके हैं कि संकल्‍प पत्र हमारे लिए धर्म ग्रंथ जैसा है. उसमें किया गया हर वादा निभाया जाएगा.

सरकार पर 35 हजार करोड़ रुपए का बोझ

पार्टी ने ‘मुफ्त’ के जो पांच बड़े वादे किए हैं उससे ही सरकार पर करीब 35 हजार करोड़ रुपए का बोझ पड़ने की संभावना है. जबकि उत्‍तर प्रदेश सरकार पर इस वक्‍त 2,95,770 करोड़ रुपए का कर्ज है.

‘उत्‍तर प्रदेश विकास की प्रतीक्षा में’ नामक किताब लिखने वाले शांतनु गुप्‍ता कहते हैं कि भारत एक लोक कल्‍याणकारी राज्‍य है. पिछले कुछ सालों से सत्‍ता हासिल करने के लिए लोकलुभावन वादों का दौर चल रहा है. इससे बीजेपी भी अछूती नहीं है. इसलिए उसने भी वादे किए हैं. जो वादे किए हैं उसे पूरा भी करना होगा.

Monday, 3 April 2017

हियुवा में सदस्यता में भारी बढ़ावा...

जैसे नरेंद्र मोदी के सत्ता में काबिज होते ही आरएसएस में युवाओं की तादाद बढ़ने लगी थी ठीक वैसे ही योगी आदित्यनाथ के यूपी के सीएम बनते ही युवाओं में युवा वाहिनी के प्रति रूझान बढ़ता नजर आ रहा है। एक अंग्रेजी अखबार की खबर के मुताबिक योगी की युवा वाहिनी में रोजाना 5 हजार से ज्यादा आवेदन आने लगे हैं।

साल 2002 में स्थापित सामाजिक संगठन हिंदू युवा वाहिनी में आवेदनों की संख्या में तेजी आई है। हिंदू युवा वाहिनी के मुख्यालय से मिल रही खबरों के मुताबिक रोजाना लगभग 5000 आवेदन संगठन को मिल रहे हैं। इसलिए अब संगठन ने कुछ दिशा निर्देश जारी किए हैं। पहले संगठन में कोई नियम नहीं थे। लेकिन अब इसकी सदस्यता के लिए कुछ गाइडलाइंस का पालन करना होगा।


इससे पहले युवा वाहिनी को हर महीने महज 500 से 1000 आवेदन मिलते थे। लेकिन योगी सरकार के सत्ता में आते ही इसमें इजाफा हुआ है। योगी आदित्यनाथ एक हिंदूत्ववादी चेहरा हैं। नए दिशा निर्देश के मुताबिक अब इसकी सदस्यता पाने के लिए कैंडिडेट्स को एक साल की एक जांच प्रक्रिया का सामना करना होगा। इसमें पता चलेगा कि पिछले एक साल में कैंडिडेट किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा था या नहीं, उसका बैकग्राउंड क्या है।

उसके बाद वो सर्कुलर संगठन के पास आएगा और और कई तरह के प्रोसेस के बाद उसपर अमल किया जाएगा। आपको बता दें कि इस संगठन में एक भी महिला सदस्या नहीं हैं। पहले केवल 11 रुपए देकर इसकी सदस्यता हासिल की जा सकती थी, बाद में सदस्यता को मुफ्त कर दिया गया था। बताया जा रहा है कि तमिलनाडु, ओडिशा, केरल, महाराष्ट्र से ज्यादा आवेदन आ रहे हैं। फिलहाल संगठन में दो लाख से ज्यादा सदस्य हैं। नए नियमों में साफ कहा गया है कि कैंडिडेट का पिछला रिकॉर्ड देखा जाएगा, उसका कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड तो नहीं है।

तीन तलाक की प्रथा खत्म करे ...!!!

पाकिस्तान और 21 दूसरे देश तीन तलाक की प्रथा खत्म कर सकते हैं तो भारत क्यों नहीं?

तीन तलाक के मुद्दे पर पूरी दुनिया जिस तरफ बढ़ रही है एआईएमपीएलबी का रुख उसके बिल्कुल उलट हैl
पाकिस्तान और 21 दूसरे देश तीन तलाक की प्रथा खत्म कर सकते हैं तो भारत क्यों नहीं?

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए तीन तलाक का मामला संवैधानिक पीठ को सौंप दिया है. शीर्ष अदालत ने इसके लिए एक पांच सदस्यीय बेंच गठित की है जो 11 मई से सुनवाई शुरू करेगी. चीफ जस्टिस जगदीश सिंह खेहर ने कहा कि ये मामला बहुत महत्वपूर्ण है जिसे टाला नहीं जा सकता. उनका ये भी कहना था कि इसकी सुनवाई के लिए अदालत शनिवार और रविवार को भी काम करने को तैयार है.
इस मुद्दे पर बीते कुछ समय से लगातार हलचल बनी हुई है. कई महिलाएं तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची हैं. उधर, मोदी सरकार ने अदालत में कहा है कि इस्लाम में तीन तलाक जरूरी धार्मिक रिवाज नहीं है और वो इसका विरोध करती है. सरकार का तर्क है कि संविधान पुरुषों और महिलाओं को बराबरी का अधिकार देता है और अदालत को इसी आधार पर इस प्रथा की समीक्षा करनी चाहिए. दूसरी तरफ, आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक प्रथा का बचाव किया है. उसकी दलील है कि ये महजब का मामला है जिसमें अदालत को दखल नहीं देना चाहिए.
अब इस पूरी कवायद का अंतिम नतीजा क्या होता है, यह तो काफी अरसे बात पता चलेगा. लेकिन अभी यह जरूर स्पष्ट हो गया है कि इस मुद्दे पर पूरी दुनिया जिस तरफ आगे बढ़ रही है एआईएमपीएलबी का रुख उसके बिल्कुल उलट है. यह बात भी खासी महत्वपूर्ण है कि तकरीबन 22 मुस्लिम देश, जिनमें पाकिस्तान और बांग्लादेश भी शामिल हैं, अपने यहां सीधे-सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से तीन बार तलाक की प्रथा खत्म कर चुके हैं.
इस सूची में तुर्की और साइप्रस भी शामिल हैं जिन्होंने धर्मनिरपेक्ष पारिवारिक कानूनों को अपना लिया है; ट्यूनीशिया, अल्जीरिया और मलेशिया के सारावाक प्रांत में कानून के बाहर किसी तलाक को मान्यता नहीं है; ईरान में शिया कानूनों के तहत तीन तलाक की कोई मान्यता नहीं है. कुल मिलाकर यह अन्यायपूर्ण प्रथा इस समय भारत और दुनियाभर के सिर्फ सुन्नी मुसलमानों में बची हुई है.
भारत में कहा जाता है कि विदेशों में रहने वाले धार्मिक अल्पसंख्यक बदलावों के प्रति अपेक्षाकृत ज्यादा अड़ियल रुख अपनाते हैं. उन्हें डर होता है कि उनकी धार्मिक प्रथाओं में जरा से परिवर्तन से उनकी धार्मिक पहचान खतरे में पड़ जाएगी. हालांकि यह तर्क हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका तक में लागू होता नहीं दिखता. यहां 10 फीसदी के तकरीबन मुस्लिम आबादी है. श्रीलंका का शादी और तलाक (मुस्लिम) कानून, 1951 जो 2006 में संशोधित हुआ था, तुरंत तलाक वाले किसी नियम को मान्यता नहीं देता. इसके मुताबिक शौहर को तलाक देने से पहले काजी को इसकी सूचना देनी होती है. नियमों के मुताबिक अगले 30 दिन के भीतर काजी मियां-बीवी के बीच सुलह करवाने की कोशिश करता है. इस समयावधि के बाद ही तलाक हो सकता है लेकिन वह भी काजी और दो चश्मदीदों के सामने होता है. इस्लामाबाद की इंटरनेशनल इस्लामिक यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर डॉ मुहम्मद मुनीर अपने एक शोधपत्र में बताते हैं कि श्रीलंका में तीन तलाक के मुद्दे पर बना कानून एक आदर्श कानून है.
भारत में अब भी इस मुद्दे पर भारी बहस चल रही है
भारत में रहने वाले सुन्नी मुसलमान तीन तलाक का नियम बदल सकते हैं या उन्हें बदलना चाहिए, यह बहस दसियों साल पुरानी है. इस्लाम में तलाक के तीन तरीके चलन में हैं. इनमें से एक है तलाक ए अहसन. इस्लाम के कानूनविदों का मानना है कि तलाक ए अहसन (तलाक का एक तरीका) में शौहर बीवी को तब तलाक दे सकता है जब उसका मासिक चक्र न चल रहा हो (तूहरा की समयावधि). इसके बाद तकरीबन तीन महीने की समयावधि जिसे इद्दत कहा जाता है, वह तलाक वापस ले सकता है. यदि ऐसा नहीं होता तो इद्दत के बाद तलाक को स्थायी मान लिया जाता है. लेकिन इसके बाद भी यदि यह जोड़ा चाहे तो भविष्य में शादी कर सकता है और इसलिए इस तलाक को अहसन (सर्वश्रेष्ठ) कहा जाता है.
दूसरे प्रकार की तलाक को तलाक ए हसन (बेहतर) कहा जाता है. इसकी प्रक्रिया की तलाक ए अहसन की तरह है लेकिन इसमें शौहर अपनी बीवी को तीन अलग-अलग बार तलाक कहता (जब बीवी का मासिक चक्र न चल रहा हो) है. यहां शौहर को अनुमति होती है कि वह इद्दत की समयावधि खत्म होने के पहले तलाक वापस ले सकता है. यह तलाकशुदा जोड़ा चाहे तो भविष्य में फिर से शादी कर सकता है. इस प्रक्रिया में तीसरी बार तलाक कहने के तुरंत बाद वह अंतिम मान लिया जाता है. तलाकशुदा जोड़ा फिर से शादी तब ही कर सकता है जब बीवी किसी दूसरे व्यक्ति से शादी कर ले और उसे तलाक दे. इस प्रक्रिया को हलाला कहा जाता है.
जो जोड़ा तीन बार के तलाक के बाद अलग हुआ है, इस्लाम के मुताबिक उसे फिर शादी नहीं करनी चाहिए लेकिन, हलाला की व्यवस्था इसका तोड़ निकालती है. इसके लिए आमतौर पर यह होता है कि तीसरे व्यक्ति के साथ एक आपसी समझ बनाई जाती है जो संबंधित महिला से शादी कर उसे तुरंत तलाक दे देता है. इसके बाद वह महिला अपने पहले शौहर से शादी कर सकती है.
यहीं आकर तलाक की उस प्रक्रिया की बुराइयां साफ-साफ दिखने लगती हैं जिसमें शौहर एक बार में तीन तलाक कहकर बीवी को तलाक दे देता है. इसे तलाक उल बिदत कहा जाता है और यह उतनी पुरानी परंपरा है जितना इस्लाम.
तलाक उल बिदत के तहत शौहर तलाक के पहले ‘तीन बार’ शब्द लगा देता है या ‘मैं तुम्हें तलाक देता हूं’ को तीन बार दोहरा देता है. इसके बाद शादी तुरंत टूट जाती है. इस तलाक को वापस नहीं लिया जा सकता. तलाकशुदा जोड़ा फिर हलाला के बाद ही शादी कर सकता है.
आमतौर पर जल्दी से जल्दी तलाक का यह तरीका होता है कि शौहर अपनी पत्नी से तीन अलग-अलग बार, जब मासिक चक्र न चल रहा हो, तलाक बोले. डॉ ताहिर महमूद और डॉ सैफ महमूद इस्लामिक कानूनों से जुड़ी अपनी किताब में लिखते हैं कि तलाक के लिए लगातार तीन तूहर (जब मासिक चक्र न चल रहा हो) का कम के कम समय निर्धारित होता है लेकिन हर मामले में यह निश्चित नहीं है. इन लेखकों ने अपनी बात के पक्ष में देवबंदी विद्वान अशरफ अली थानवी (1863-1943) की राय का हवाला दिया है. इसके अनुसार – ‘कोई व्यक्ति एक बार तलाक कह देता है. उसके बाद वह बीवी से सुलह कर लेता है और दोनों फिर साथ रहने लगते हैं. कुछ सालों के बाद किसी तरह के उकसावे में आकर वह दूसरी बार फिर से तलाक कह देता है. इसके बाद वह उकसावे को भूल जाता है और फिर से बीवी के साथ रहने लगता है. लेकिन उसके दो तलाक पूरे हो चुके हैं. इसके बाद वह जब भी तलाक कहता है वह अंतिम तलाक होता है और उसके बाद निकाह तुरंत खत्म हो जाता है.’
कहते हैं कि तलाक उल बिदत या एक साथ तीन बार तलाक कहकर तलाक देने की प्रक्रिया यह सुनिश्चित करने लिए शुरू की गई थी कि जहां जोड़े के बीच कभी न सुधरने की हद तक संबंध खराब चुके हैं या दोनों का साथ रहना बिलकुल मुमकिन नहीं हैं वहां तुरंत तलाक हो जाए..
दावा यह भी किया जाता है कि तलाक की यह प्रक्रिया उन महिलाओं के लिए ईजाद की गई थी जो अपने ऐसे पतियों के शोषण से मुक्ति चाहती हैं जो बात-बात में उन्हें तलाक देकर उसे वापस ले लेते हैं.
वजह जो भी हो लेकिन तलाक की यह प्रक्रिया मुस्लिम दुनिया में लंबे समय से स्वीकार्य रही है. यहां तक कि चारों सुन्नी विचार धाराएं – हनफी, मलिकी, हंबली और शाफेई इस प्रक्रिया पर सहमति जताती हैं.
तीन तलाक माने एक
सुन्नी विचारधारा के बीच तीन तलाक को लेकर सहमति तब टूटी जब हंबली विद्वान इब्न तैमिया (1268-1328) ने तर्क दिया कि एक बार में तीन तलाक एक के बराबर होता है. इस विचार को हाशिये पर रखा जाता रहा है लेकिन बीती शताब्दी में 20 से ज्यादा देशों ने इसे मान्यता दी है.
मिस्र पहला देश था जिसने 1929 में इस विचार को कानूनी मान्यता दी. वहां कानून-25 के जरिए घोषणा की गई कि तलाक को तीन बार कहने पर भी उसे एक ही माना जाएगा और इसे वापस लिया जा सकता है. लेकिन लगातार तीन तूहरा (जब बीवी का मासिक चक्र न चल रहा हो) के दौरान तलाक कहने से तलाक अंतिम माना जाएगा. 1935 में सूडान ने भी कुछ और प्रावधानों के साथ यह कानून अपना लिया. आज ज्यादातर मुस्लिम देश – ईराक से लेकर संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डन, कतर और इंडोनेशिया तक ने तीन तलाक के मुद्दे पर तैमिया के विचार को स्वीकार कर लिया है.
ट्यूनीशिया तो तैमिया के विचार से भी आगे निकल चुका है. 1956 में बने कानून के मुताबिक वहां अदालत के बाहर तलाक को मान्यता नहीं है. ट्यूनीशिया में बाकायदा पहले तलाक की वजहों की पड़ताल होती है और यदि जोड़े के बीच सुलह की कोई गुंजाइश न दिखे तभी तलाक को मान्यता मिलती है. अल्जीरिया में भी तकरीबन यही कानून है.
वहीं तुर्की ने मुस्तफा कमाल अतातुर्क के नेतृत्व में 1926 में स्विस सिविल कोड अपना लिया था. यह कानून प्रणाली यूरोप में सबसे प्रगतिशील और सुधारवादी मानी जाती है और इसके लागू होने का मतलब था कि शादी और तलाक से जुड़े इस्लामी कानून अपने आप ही हाशिये पर चले गए. हालांकि 1990 के दशक में इसमें कुछ संशोधन जरूर हुए लेकिन जबर्दस्ती की धार्मिक छाप से यह तब भी बचे रहे. बाद में साइप्रस ने भी तुर्की में लागू कानून प्रणाली अपना ली.
जहां तक भारत की बात है तो यहां तीन तलाक की जड़ें आम जनमानस में काफी गहरी हैं. अनजाने में या पितृसत्तात्मक समाज के प्रभाव से यहां तलाक की यह प्रक्रिया सबसे प्रभावी बन गई. यहां तक कि कई मुसलमान यह भी मान लेते हैं कि इस्लाम में तलाक का यही एकमात्र तरीका है.
इसलिए गुस्से के क्षणों में कई लोग तीन तलाक कहकर अपनी बीवी तो तलाक दे देते हैं और फिर इस फैसले पछताते हैं. क्योंकि यह तलाक वापस नहीं लिया जा सकता और तलाकशुदा लोगों को फिर से आपस में शादी करनी है तो उन्हें हलाला की व्यवस्था से गुजरना पड़ता है.
पाकिस्तान में बदलाव कैसे आया
पाकिस्तान में तीन तलाक के नियम पर दोबारा विचार की शुरुआत एक विवाद के चलते हुई. 1955 में वहां के तत्कालीन प्रधानमंत्री मुहम्मद अली बोगरा ने अपनी बीवी को तलाक दिए बिना सेक्रेटरी से शादी कर ली थी. इसपर पाकिस्तान के संगठन ऑल पाकिस्तान वूमैन एसोसिएशन ने आंदोलन छेड़ दिया और सरकार को शादी और पारिवारिक कानूनों पर एक सात सदस्यीय आयोग बनाना पड़ा.
इस आयोग ने 1956 में सिफारिश की कि एक बार में तीन तलाक बोलने को एक माना जाए. दूसरी सिफारिश थी कि लगातार तीन तूहरा में जब शौहर तलाक बोले तब तलाक को प्रभावी माना जाना चाहिए. आयोग ने तीसरी सिफारिश में कहा कि शौहर तब तक तलाक नहीं दे सकता जबतक कि विवाह और परिवार अदालत से वह इसपर आदेश हासिल नहीं कर लेता.
इस तीसरी सिफारिश की आयोग के ही एक सदस्य मौलाना एहतेशाम उल हक थानवी ने खूब आलोचना की. अपने असहमति पत्र में उनका कहना थी तलाक के पहले ही अदालत से इसकी अनुमति हासिल करना धार्मिक विश्वास के साथ खिलवाड़ है और जब तलाक अनिवार्य हो चुका है तो यह प्रक्रिया उसमें बाधा डालने जैसी है.
पाकिस्तान में 1961 में मुस्लिम परिवार कानून अध्यादेश (एमएफएलओ) जारी किया गया था लेकिन मौलाना एहतेशाम उल हक थानवी की आपत्ति के मद्देनजर तलाक के मामले को अदालती हस्तक्षेप से दूर रखा गया.
इस अध्यादेश के सेक्शन सात में तलाक के बारे में जिक्र है और इससे जुड़े छह सब सेक्शन इस प्रकार हैं :
1. कोई भी व्यक्ति ‘किसी भी रूप में तलाक’ कहता है तो उसे यूनियन काऊंसिल (स्थानी निकाय) के चेयरमैन को इसबारे में जानकारी देते हुए एक नोटिस देना होगा और इसकी कॉपी अपनी बीवी को देनी होगी.
2. यदि कोई व्यक्ति ऐसा करने में असफल रहता है तो उसे एक साल की सजा हो सकती है या 5000 रुपये का जुर्माना देना पड़ सकता है.
3. चेयरमैन को नोटिस देने के 90 दिन बाद ही तलाक प्रभावी माना जाएगा.
4. नोटिस पाने के 30 दिनों के भीतर चेयरमैन को एक पंच परिषद बनानी होगी जो तलाक के पहले सुलह करवाने की कोशिश करेगी.
5. यदि महिला गर्भवती है तो तलाक 90 दिन या प्रसव, जिसकी समयावधि ज्यादा हो के बाद ही प्रभावी होगा.
6. संबंधित महिला तलाक होने बाद भी अपने पूर्व पति से शादी कर सकती है और इसके लिए उसे बीच में किसी तीसरे व्यक्ति से शादी करने की जरूरत नहीं है.
इस्लामी कानूनों के जानकार मानते हैं कि पाकिस्तान के ये प्रावधान तीन तलाक की प्रथा या तलाक उल बिदत को अप्रत्यक्षरूप से अप्रभावी बना देते हैं.
बांग्लादेश का निर्माण 1971 में हुआ था. उस समय तक वहां भी यही अध्यादेश लागू था और पाकिस्तान से स्वतंत्रता के बाद सरकार ने यह कानून जारी रखा.
भारत में तीन तलाक पर अदालतों का रुख क्या रहा है
ऐसा नहीं है कि भारतीय अदालतों में तीन तलाक को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कुछ फैसले न दिए हों. उदाहरण के लिए 2008 के एक मामले में फैसला देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज बदर दुरेज अहमद ने कहा था कि भारत में तीन तलाक को एक तलाक (जो वापस लिया जा सकता है) समझा जाना चाहिए. इसी तरह से गुवाहाटी हाईकोर्ट ने जियाउद्दीन बनाम अनवरा बेगम मामले में कहा था कि तलाक के लिए पर्याप्त आधार होने चाहिए और सुलह की कोशिशों के बाद ही तलाक होना चाहिए.
कई सर्वेक्षणों की राय से जाहिर हुआ है कि भारत में इस समय मुसलमान महिलाओं का एक बड़ा तबका तीन तलाक के नियम को खत्म करने के पक्ष में है. लेकिन ऐसा लगता है कि एआईएमपीएलबी ने इस मामले में शुतुरमुर्ग की तरह अपना सिर रेत में दबा लिया है. उसे दूसरे मुस्लिम देशों में हुए सुधारों का अध्ययन करना चाहिए ताकि हमारे यहां भी तीन तलाक की प्रथा को खत्म किया जा सके.




मस्जिद में गौशाला और मुसलमान गौरक्षक

मध्य प्रदेश के मुफ्ती-ए-आजम अब्दुर्रज्जाक खान 1984 से निजी तौर पर गौपालन कर रहे हैं. आज भी इनकी गौशाला में आठ गायें हैं

गौशाला मस्जिद में भी हो सकती है और गौरक्षक मुसलमान भी

यह मिसाल है, उन लोगों के लिए जो गाय को हरे या केसरिया रंग में रंगने में लगे हैं. जो उसके बड़े और निर्बाध अस्तित्व को दायरों में बांधने-समेटने की कोशिश कर रहे हैं. और ये मिसाल निकलती है, मध्य प्रदेश के मुफ्ती-ए-आजम अब्दुर्रज्जाक खान की निजी गौशाला से, जहां रहने वाली गायें सिर्फ इंसान और उन्हें रोटी देने वाले हाथ को पहचानती हैं.
भोपाल से लगभग 20 किलोमीटर दूर इंदौर हाई-वे पर टोल नाके से आधा-एक किलोमीटर पहले ही दाहिनी तरफ एक रास्ता तूमड़ा गांव की तरफ जाता है. इस रास्ते में दो-तीन किलोमीटर भीतर जाने पर एक बड़ी सी मस्जिद नजर आती है. मुफ्ती अब्दुर्रज्जाक की ही करीब 60 एकड़ निजी जमीन पर 24,000 वर्गफीट में बनी इस दारुल उलूम हुसैनिया मस्जिद (नीचे तस्वीर में) के पास ही दुधारू जानवरों का एक बाड़ा है. इस बाड़े में 20-25 बकरियां हैं. चार-पांच भैंसें और इन सबके साथ छह-सात गायें भी हैं. इस बाड़े की सबसे पुरानी रहवासी ये गायें ही हैं क्योंकि मुफ्ती अब्दुर्रज्जाक से इनका नाता तीन दशक से ज्यादा पुराना हो चुका है. एक तरह से कहें तो बचपन से ही.
खुद मुफ्ती बताते हैं, ‘जब सात-आठ साल का था, तब मेरे भाई ने 13 रुपए में एक गाय सहारनपुर (उत्तरप्रदेश) से खरीदी थी. तभी से इससे मुझे मोहब्बत हो गई थी. हालांकि, इसके बाद बड़ा हुआ तो पढ़ाई-लिखाई और दूसरे चीजों में मशरूफ हो गया. इसी दौरान भोपाल आना हुआ और फिर यहीं का हो गया. लेकिन पूरे दौर में गाय की खिदमत करने की मंशा मेरे मन में हमेशा बनी रही. इसी बीच 1984 में ऐसा वाकया हुआ कि गाय से मेरा नाता फिर जुड़ गया, जो बदस्तूर बना हुआ है.’ यहां बताते चलें कि मुफ्ती अब्दुर्रज्जाक की उम्र इस वक्त करीब 93 साल हो चुकी है.

दारुल उलूम हुसैनिया मस्जिद

उनके पांचवें नंबर के दामाद सूफी मुशाहिद उज्ज़मा खान उस वाकये के बारे में बताते हैं, जब मुफ्ती अब्दुर्रज्जाक का नाता दोबारा गाय से हुआ. उनके मुताबिक, ‘उस वक्त (1984 में) मुफ्ती साहब की बेगम शम्शुन्निसा की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई थी. उनकी किडनियां खराब थीं. डॉक्टरों ने मशविरा दिया कि उन्हें गाय का दूध पिलाएं. फायदा होगा. मुफ्ती साहब भी इस मशविरे से मुतमईन (सहमत) थे. लिहाजा, उन्होंने अपने बेटे को अब्दुल रक़ीब को कहा कि गाय खरीद लाएं. वे भोपाल के नज़दीकी कस्बे गैरतगंज से तब 1,500 रुपए में पहली गाय लेकर आए थे. उसे भोपाल में मस्जिद के पास ही रखा गया था. उसके बाद शम्शुन्निसा बेगम तो दो साल ही इस दुनिया में रह पाईं. लेकिन गाय हमेशा के लिए हमारे पास रह गई. आज हमारी गौशाला जो गायें हैं, वे सब उसी के वंश की हैं.’
मुशाहिद बताते हैं, ‘शहर में गाय को पालने और रखने में दिक्कतें होती थीं. इसलिए हमने उन्हें यहां (तूमड़ा रोड की गौशाला में) रख दिया. हुसैनिया मदनी सोशल वेलफेयर सोसायटी के बैनर तले हमने यहां एक मदरसा भी शुरू किया. इसमें करीब 200 बच्चे पढ़ते हैं. गायों और दूसरे जानवरों की देखभाल तथा बाकी कामों के लिए पांच परिवार भी यहां चौबीसों घंटे रहते हैं. गायों का दूध इन्हीं सबके काम आता है. कुछ बच गया तो मुफ्ती साहब के परिवार के लिए भोपाल भेज दिया जाता है. लेकिन बेचा नहीं जाता.’
मुफ्ती अब्दुर्रज्जाक खुद गाय के दूध और यहां तक कि गौ-मूत्र को भी मुकद्दस (पवित्र) मानते हैं. वे बताते हैं, ‘हकीमी (चिकित्सा संबंधी) किताबों में लिखा है कि गाय का गोश्त बीमारी है. दूध उसका दवा है. यह खाने के लिए है. यहां तक कि गाय का पेशाब भी दवा की तरह बताया गया है. मजहबी (धार्मिक) किताबों में भी लिखा है कि अगर गाय की पेशाब के छींटे जिस्म पर गिर जाएं उसके बाद हमें वुज़ू (नमाज से पहले हाथ-मुंह धोना) करने की भी जरूरत नहीं रह जाती.’
फिर मौजूदा माहौल पर वे दुख भी जताते हैं, ‘लोगों को इल्म नहीं है. बहुतों को तो यह भी नहीं मालूम कि दारुल उलूम देवबंद का फतवा है कि गाय का गोश्त नहीं खाना है. मगर अफसोस कि लोग समझने को, मानने को तैयार नहीं हैं. दूसरी जानिब (हिन्दुओं में) भी यही हाल है. गुमराह लोगों की भीड़ बढ़ रही है. यही भीड़ मजहब के नाम पर लड़ने-लड़ाने में लगी है. लगता है, अब ऊपर वाला ही इन्हें राह दिखा सकता है.’
नीलेश द्विवेदी

Sunday, 2 April 2017

गुजरात पशु संरक्षण संशोधन विधेयक

मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने कहा कि हम चाहते हैं कि गुजरात शाकाहारी हो और राज्य में जर्सी गायें न हों.

देश भर में चल रहे अलग-अलग तरह के गोरक्षा अभियानों के बीच गुजरात विधानसभा ने एक सख़्त क़ानून पास किया है. विधानसभा में पेश किया गया गोहत्‍या संशोधन बिल शुक्रवार को पास हो गया. इस क़ानून के तहत प्रावधान किया गया है कि गोहत्‍या के दोषियों को उम्रक़ैद की सज़ा होगी. वहीं यदि किसी के पास गोमांस मिलता है तो उसे सात से 10 साल की सज़ा होगी. विधेयक में रात के समय पशुओं को एक जगह से दूसरे जगह ले जाने को भी प्रतिबंधित किया गया है.
एनडीटीवी के मुताबिक, ‘गोवंश के साथ पकड़े जाने पर जमानत नहीं मिल सकती है. गोमांस की हेराफेरी करते हुए पकड़े जाने पर सात से 10 साल तक की सज़ा और एक से पांच लाख तक का दंड हो सकता है. इसके साथ ही गाय की तस्‍करी पर भी सख़्त पाबंदी लगा दी गई है. गोमांस का ट्रांसफर करते हुए जो वाहन पकड़े जाएंगे वो वाहन हमेशा के लिए जब्‍त हो जाएंगे. अगर जानवरों को लाने-ले जाने से संबंधित लाइसेंस भी है तब भी ये हेराफेरी रात के समय नहीं की जा सकेगी.’
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, ‘गुजरात विधानसभा में पास किए गए नये क़ानून के मुताबिक गोहत्या का दोषी पाए जाने पर न्यूनतम दस साल से लेकर उमक़ैद तक की सज़ा होगी. बिल पास होने के दौरान मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने कहा कि हम चाहते हैं कि गुजरात शाकाहारी राज्य हो और हम जर्सी गायें नहीं चाहते. विधेयक विपक्षी पार्टी कांग्रेस के सदस्यों की अनुपस्थिति मेें पेश किया गया. कांग्रेस सदस्यों को विधानसभा अध्यक्ष ने हंगामा करने के चलते निलंबित कर दिया था. बिल पास होने के दौरान विधानसभा में सैकड़ों हिंदू पुजारियों की भीड़ मौजूद थी. बिल पास होने के दौरान उनमें से कुछ दर्शक दीर्घा में घुस आए. ‘
आज तक की ख़बर के मुताबिक, नए कानून में पुलिस को काफी अधिकार दिए गए हैं. क़ानून में प्रावधान है कि जिनके पास जानवर ख़रीदने-बेचने का लाइसेंस है वो भी यह काम सुबह आठ बजे से शाम के पांच बजे तक ही कर पाएंगे.’
समाचार एजेंसी भाषा ने लिखा है, ‘इस संशोधन विधेयक के पारित होने के साथ ही गोवध के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान करने वाला गुजरात देश का पहला राज्य बन गया है. साथ ही गौ वध को गैर-जमानती अपराध बनाया गया है. गुजरात पशु संरक्षण संशोधन विधेयक के अंतर्गत गोमांस को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने, एकत्रित करने और उसकी बिक्री करने के लिए भी दस वर्ष की जेल का प्रावधान है.’
इसके पहले गुजरात में नरेंद्र मोदी सरकार ने गाय सुरक्षा विधेयक पास किया था. इसके तहत गोहत्या के दोषियों के लिए अधिकतम सात साल की सज़ा का प्रावधान था, जिसे अब उमक़ैद में बदल दिया गया है. पिछले क़ानून में 50 हज़ार रुपये का ज़ुर्माना था जो अब एक लाख से पांच लाख तक कर दिया गया है. गौरतलब है कि इस साल गुजरात में विधानसभा चुनाव होना है.

हिंदुत्व का गढ़ गोरखनाथ पीठ

सांप्रदायिकता और जातिवाद के ख़िलाफ़ शुरू होने वाले गोरखनाथ पीठ से कभी बड़ी संख्या में मुसलमान और अछूत मानी जाने वाली जातियां जुड़ी थीं.

gorakhpur

पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुसलमान जोगियों के दर्जनों गांव हैं. इन गांवों में ऐसे मुसलमान जोगी रहते हैं जो नाथ पंथियों की तरह गेरूआ रंग का वस्त्र (गुदरी, कंथा) पहनते हैं और हाथ में सारंगी लिए गांव-गांव गोपीचंद्र और राजा भर्तृहरि के गोरखनाथ के प्रभाव में संन्यासी हो जाने की लोककथा गीत गाते फिरते हैं. ग्रामीण इन्हें भेंट स्वरूप अनाज व नकदी देते हैं और बड़े चाव से उनसे गोरखनाथ की महिमा का वर्णन करने वाले गीत सुनते हैं.
ये जोगी कौन हैं, उनका क्या इतिहास है और उनका गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित नाथ संप्रदाय से क्या संबंध है, इसको आज बहुत कम लोग जानते हैं. पहले ये मुसलमान जोगी खूब देखे जाते थे लेकिन अब बहुत कम दिखते हैं.
Yogi Adityanath
हिंदी के प्रसिद्ध विद्वान हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नाथ संप्रदाय पर लिखी अपनी पुस्तक में इनके बारे में जानकारी दी है. उन्होंने लिखा है, ‘नाथमत को मानने वाली बहुत सी जातियां घरबारी हो गई हैं. देश के हर हिस्से में ऐसी जातियों का अस्तित्व है. इनमें बुनाई के पेशे से जुड़ी तमाम जातियां हैं. इनमें मुसलमान जोगी भी हैं. पंजाब के गृहस्थ योगियों को रावल कहा जाता है और ये लोग भीख मांगकर, करामात दिखाकर, हाथ देखकर अपनी जीविका चलाते हैं. बंगाल में जुगी या जोगी कहने वाली कई जातियां हैं. योगियों का बहुत बड़ा संप्रदाय अवध, काशी, मगध और बंगाल मे फैला हुआ था. ये लोग गृहस्थ थे और पेशा जुलाहे या धुनिए का था. ब्राह्मण धर्म में इनका कोई स्थान नहीं था.’
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने बताया है कि बंगाल के रंगपुर जिले के योगियों का काम कपड़ा बुनना, रंगसाजी और चूना बनाना है. इनमें स्मरणीय महापुरूष गोरखनाथ, धीरनाथ, छायानाथ और रघुनाथ आदि हैं. इनके गुरू और पुरोहित ब्राह्मण नहीं होते बल्कि इनकी अपनी ही जाति के लोग होते हैं. इनके यहां बच्चों के कान चीरने और मृतकों की समाधि देने की परम्परा है.

हैदराबाद के दवरे और रावल भी नाथ योगियों के गृहस्थ रूप हैं. कोंकण के गोसवी भी अपने का नाथ योगियों से संबद्ध बताते हैं. इस प्रकार की योगी जातियां बरार, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और दक्षिण भारत में भी पाई जाती हैं.
जार्ज वेस्टन ब्रिग्स ने अपनी पुस्तक ‘गोरखनाथ एंड दि कनफटा योगीज’ में 1891 की जनसंख्या रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि भारतवर्ष में योगियों की संख्या 2,14,546 हैं. आगरा व अवध प्रांत में 5,319 औघड़, 28,816 गोरखनाथी और 78,387 योगी थे. इनमें बड़ी संख्या मुसलमान योगियों की है.
इसी वर्ष की पंजाब की रिपोर्ट में बताया कि मुसलमान योगियों की संख्या 38,137 है. वर्ष 1921 की जगगणना में इनकी जोगी हिंदू 6,29,978, जोगी मुसलमान 31,158 और फकीर हिंदू 1,41,132 बताई गई हैं. इस जनगणना में पुरूष और स्त्री योगियों की संख्या भी अलग-अलग बताई गई है.
बाद की जनगणना रिपोर्टों में इन लोगों का अलग से उल्लेख नहीं है. ब्रिग्स ने अपनी किताब में योगी जातियों का विस्तार से जिक्र किया है.
इससे स्पष्ट होता है कि आज भी गोपीचंद और भर्तहरि को गाने वाले मुसलमान योगी नाथपंथ से जुड़े गृहस्थ योगी हैं जो अपने को जोगी कहते हैं. इन मुसलमान जोगियों के गांव गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, संतकबीरनगर, आजमगढ़ बलरामपुर में मिलते हैं लेकिन अब ये अपनी परम्परा को छोड़ रहे हैं.

मुसलमान जोगियों पर समुदाय के भीतर और समुदाय के बाहर दोनों तरफ से अपनी इस परम्परा को छोड़ने का दबाव बढ़ रहा है. सांप्रदायिक हिंसा और कटुता बढ़ने के कारण अब ये जोगी गेरूआ वस्त्र में खुद को असहज पाते हैं. उनके घरों में नौजवान मुसलमान इस कार्य को हेय दृष्टि से देखते हैं.
उनका कहना है कि यह कार्य ठीक नहीं है. वे इसे सिर्फ भीख मांगने के एक तरीके के रूप में देखते हैं. दूसरी तरफ हिंदू कट्टरपंथी संगठन इनको अपने लिए खतरा मानते हैं क्योंकि जिस दर्शन और सिद्धांत पर वे घृणा की राजनीति खड़ा करना चाहते हैं उस पर मुसलमान जोगियों की यह परम्परा बहुत गहरा चोट करती है.
वर्ष 2007 से मैंने मुसलमान जोगियों के बारे में खोजबीन शुरू की. मेरी मुलाकात एक कबीरपंथी साधु से हुई जिसने बताया कि गोरखपुर जिले के पाली ब्लाक के बड़गो गांव में मुसलमान जोगी रहते हैं. जब मै वहां पहुंचा जो गांव के बाहर कुछ नौजवानों से मुलाकात हुई. मैंने उनसे जब जोगियों के घर के बारे में पूछा तो उन्होंने नफरत से कहा कि पता नहीं क्यों वे मुसलमान होकर गेरूवा वस्त्र पहनते हैं? हम चाहते हैं कि वे जल्दी से इस कार्य को छोड़ दें. ये सभी हिंदू युवक थे. इनमें से कुछ अपने को हिंदू युवा वाहिनी से जुड़ा बता रहे थे.

बड़गो इस गांव में 75 घर मुसलमानों के हैं जिसमें दो दर्जन मुसलमान जोगी है. बख्शीश इनमें से एक था. हमारी जब उससे भेंट हुई तो वह खेत में काम कर रहे थे. 35 वर्षीय बख्शीश के पिता दिलशफी और ससुर अलीहसन भी जोगी हैं. बख्शीश ने अपने पिता और ससुर से भर्तृहरि और गोपीचंद के गीत तथा कबीर के भजन को गाना सीखा.
उसके पास एक बहुत पुरानी सारंगी थी जिसके आयु के बारे में उसका कहना था कि वह दो पीढ़ी पुरानी है. उसके पास खेती योग्य एक बित्ता भी जमीन नहीं थी. उसने कहा कि वह अब वह जोगी नहीं बने रहना चाहता क्योंकि उसकी बिरादरी के लोग इसे पसंद नहीं कर रहे हैं. जब हमने उसकी सारंगी देखनी चाही तो उसने असमर्थता जता दी.
बहुत कुरेदने पर उसने बताया कि उसकी पत्नी मायके गयी है और सारंगी को कमरे में बंद कर ताले की चाभी भी अपने साथ लेती गयी है. वह नहीं चाहती कि उसकी गैरहाजिरी में बख्शीश सारंगी लिए गीत-भजन गाते गांवों में निकल पड़े.
इस गांव के दूसरे जोगी एक शादी में गए थे इसलिए उनसे मुलाकात नहीं हो पाई. गांव के प्रधान मुख्तार अहमद भी इस बात की हिमायत कर रहे थे कि बख्शीश और दूसरे जोगियों को सारंगी बजाते हुए गांवों में गोरखनाथ की महिमा गाने की परंपरा से मुक्त हो जाना चाहिए और इसके बजाय उन्हें दूसरा काम करना चाहिए.
मुख्तार ने कहा कि वह जोगियों का जॉब कार्ड बना रहा है और वह चाहता है कि वे सारंगी छोड़ कर हाथ में फावड़े थाम लें. बख्शीश ने बहुत अनुनय-विनय करने पर उज्जैन के राजा भर्तृहरि के राज-पाट छोड़ योगी हो जाने की लोक कथा को गाकर सुनाया. जोगी गोपीचंद भर्तहरि को गाकर सुनाने के पहले गोरखनाथ की ख्याति के बारे में पद सुनाता है जिसे वह झाप लेना कहता है-
गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ
मगहर में संत कबीर
आजमगढ़ में बाबा भैरवनाथ
तीनों एक तपस्वी जीव
ले ल गुरू जी का नाम
इसके बाद उसने सुनाया…
जग में अमर राजा राज भर्तृहरि
छोड़े गढ़ उज्जैन का राज
 बड़गों गांव के पास के गांव में कुछ जोगी रहते हैं. लोगों ने बताया कि हमीद जोगी बहुत अच्छा गाते है. हमें उनसे मिलना चाहिए. हमीद के घर उनकी पत्नी मिलीं. उन्होंने बताया कि हमीद को गुजरे तीन-चार वर्ष हो गए.
वह जीवन भर गोपीचन्द और भर्तृहरि की लोककथा लोगों को सुनाते रहे. उनके पास बहुत पुरानी सारंगी थी. जब बीमार पड़े और उन्हें लगा कि नहीं बचेगें तो पत्नी से कहा-इसका (सारंगी ) क्या करें ? आज के युग के लड़के हमारी परम्परा को आगे नहीं बढाएंगें. उन्होंने अपने पट्टीदार को बुलाकर उन्हें इस उम्मीद में सारंगी दे दी कि शायद वह इस परम्परा को आगे बढ़ाएं. हमीद का बेटा फेरी लगाकर बर्तन बेचता है.
लौटते वक्त रास्ते में कालू जोगी से भेंट हो गई. वह बड़गो गांव का रहने वाला था. वह जोगी बाने में सारंगी बजाते हुए बंगाल के राजा गोपीचंद के गोरखनाथ के प्रभाव में योगी बन जाने की लोककथा को गा रहा था.
कालू ने मुसलमान जोगियों के कुछ और गांवों के बारे में जानकारी दी. उसने बताया कि गोरखपुर जिले में भीटी, महेशपुर, सेमरी, चैकड़ी में मुसलमान जोगी रहते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी इस परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं.
मुसलमान जोगियों से मिलने वर्ष 2008 में हम देवरिया जिले के रूद्रपुर क्षेत्र का जगत मांझा गांव गए. यहां जोगियों के 15 परिवार हैं. गांव के बाहर सलाउद्दीन मिल गया जिसके पिता मो शफी जोगी हैं. उसने बताया कि पिता घर पर नहीं हैं. यह पूछने पर कि क्या वह हमको गोपीचंद या भर्तृहरि का कोई गीत सुना सकता है, सलाउद्दीन चिढ़ गया. उसने कहा कि हमें यह पसंद नहीं है. हमारे लिए यह अच्छा काम नहीं है. इसलिए मैने पिता को बाहर काम करने के लिए भेज दिया गया है.
इसी गांव के मुसलमान जोगी कासिम उर्फ डा. दुर्गा बताते हैं कि उन्होंने अब आर्केस्टा शुरू कर दिया है और शादी-विवाह के मौके पर फिल्मी गीत गाते हैं. वह कहता है कि पास खेती की जमीन नहीं है. परिवार का खर्च कैसे चलाएं ? कुछ तो करना पड़ता है. कासिम से कुछ सुनाने का अनुरोध करते हैं तो वह एक लड़के से सारंगी लाने को कहता है लेकिन फिर मना कर देता है.
वह पूछता है कि आप लोग कौन हैं और हमारे बारे क्यों जानना चाहते है? यह बताने पर कि हम पत्रकार हैं और जोगियों की परंपरा के बारे में काम कर रहे हैं, बड़ी मुश्किल से एक गीत गाने को तैयार होता है.
जब हमने उससे जोगी वेश में सारंगी के साथ गाने की सिफारिश की तो वह नाराज हो गया और सारंगी को एक तरफ रखते हुए बोला कि आखिर हम समझ नहीं पा रहे हैं कि आप लोग ऐसा क्यों करवाना चाहते है. कुछ हो जाएगा तो. मै पूछता हूं-क्या हो जाएगा तो उसका जवाब था कि आप नहीं समझेंगे. वह कहता है कि हम गुदरी ( गेरूआ रंग का यह कपड़ा जो गले से शरीर में डाला जाता है और पैर तक आता है. इस कपड़े को कंथा और चोलना भी कहा जाता है. कुछ मुसलमान जोगी पीला कंथा भी पहनते हैं ) पहने बिना गाना सुना देते हैं. काफी अनुरोध के बाद उसने जोगी वेश धारण किया.
गुदरी पहनने के बाद उसने सिर पर गेरूए रंग का साफा बांधा और सारंगी बजानी शुरू की. तभी उसकी पत्नी आ गई और उसने सारंगी बजाने से रोक दिया. उसका कहना था कि वह डर रही है. कासिम ने पत्नी को आश्वास्त करने के बाद सारंगी की 36 खूंटियों में बंधे 36 तारों में से कुछ तारों को कसा और गाया…
मुसलमान जोगी जिस सारंगी को बजाते हैं, कहा जाता है कि उसका अविष्कार गोपीचंद ने ही किया था. गोपीचंद बंगाल के राजा मानिकचंद्र के पुत्र थे जिनका संबंध पालवंश से बताया जाता है.
डा. मोहन सिंह ने अपनी पुस्तक में पंजाब यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में मौजूद कई हस्तलिखित प्रतियों के आधार पर ‘उदास गोपीचंद गाथा, गोरखपद’ नाम से एक अंश छापा है जो गोपीचंद और उनमी मां मयनावती के संवाद के रूप में है. अधिकतर मुसलमान जोगी इसी कथा को गाते हैं. कुछ कहानियों में कहा गया है कि गोपीचंद बंगाल के राजा थे. उनकी मां मयनावती ने गोरखनाथ से दीक्षा ली थी और बेटे के राजा बन जाने पर उन्होंने ही योगी बन जाने को प्रेरित किया.
मुसलमान जोगी ‘भरथरी चरित्र’ की कथा को गाते हैं जो सबसे पहले दूधनाथ प्रेस हाबड़ा से छपा है. इस पुस्तक में भरथरी या भर्तहरि को उज्जैन के राजा इंद्रसेन का पौत्र व चंद्रसेन का पुत्र बताया गया है.
राजा भर्तहरि का विवाह सिंहल देश की राजकुमारी सामदेई से हुआ था. गोरखनाथ से मुलाकात के बाद भर्तहरि योगी हो गए. मुसलमान जोगी जो गीत गाते हैं उसमें भर्तहरि और सामदेई के बीच संवाद है. एक जोगी ने मुझे जो गीत सुनाया था उसमें सामदेई, भर्तहरि को धिक्कारती हैं और कहती हैं कि योगी बन कर उसने पति धर्म का निर्वाह नहीं किया.
कुशीनगर जिले के हाटा में रहने वाले जोगी सरदार शाह ने कहा कि जोगियों के पास भर्तहरि के जीवन चरित्र के बारे में दो किताबे हैं. ‘भरथरी चरित्र’ और ‘भरथरी हरि’. भरथरी हरि में भरथरी की पत्नी के बतौर पिंगला दर्ज हैं. सरदार शाह भरथरी चरित्र को ही असली मानते हैं.
72 वर्षीय सरदार शाह ने बताया कि अधिकतर मुसलमान जोगी अकेले या समूह में पांच-छह महीने के लिए निकल जाते हैं और घूमते-फिरते बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल तक पहुंच जाते हैं. वह खुद भी जवानी के दिनों में लंबी यात्राएं करते थे.
उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल में मुसलमान जोगियों का काफी सम्मान है और लोग उन्हें गोरखनाथ की भूमि से आया बताते हुए खूब दान देते हैं. शाह सरकार की उपेक्षा से दुखी हैं और तीखा व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि बलमुआ टाइप का गीत गाने वाले हीरो बन रहे हैं लेकिन हम जैसे कलाकारों की कोई पूछ नहीं है.
सरदार शाह के बेटे और पौत्र, उनकी कला साधना से दूर हैं. बेटा टैक्सी चलाता है और उसकी सारंगी और गोपीचंद-भर्तहरि कथा गायन में कोई रूचि नहीं हैं. वह सरदार शाह को भी यह सब छोड़ देने के लिए कहता है लेकिन उनका कहना है कि जब तक जिंदगी है वह कलाकार बने रहेंगे.
पहले मुसलमान जोगी गोरखनाथ मंदिर जाते थे और भंडारे में भाग लेते थे लेकिन अब उनका मंदिर से रिश्ता उतना जीवंत नहीं है. वर्ष 1935 में दिग्विजयनाथ के महंत बनने के बाद गोरखनाथ मंदिर हिंदुत्व की राजनीति का केंद्र हो गया जिसको उनके बाद के महंत अवैद्यनाथ और फिर योगी आदित्यनाथ ने और आगे बढ़ाया. ऐसे में मुसलमान जोगियों का नाथ सम्प्रदाय की सबसे बड़ी पीठ से संबंध और संपर्क कमजोर होना स्वभाविक ही था.

Saturday, 1 April 2017

ભગવાન રામને માન્યા હતાં રાજા તુલસીદાસે : આદિત્યનાથ

ગોરખપુરના પ્રવાસના બીજા દિવસે મુખ્યમંત્રી યોગી આદિત્યનાથે બાબા ગંભીરનાથ શતાબ્દીની પુણ્યતિથિ સમારોહમાં હિન્દુઓના પવિત્ર ગ્રંથ રામચરિત માનસના રચયિતા તુલસીદાસનો ઉલ્લેખ કરતા કહ્યું કે તેમણે પોતાના તત્કાલિન મુઘલ સમ્રાટ અકબરને ક્યારેય પોતાના રાજા માન્યા નહતાં. તેમણે કહ્યું કે તુલસીદાસે કહ્યું હતું કે તેમના બાદશાહ એકમાત્ર ભગવાન રામ છે, બીજુ કોઈ નહીં. યોગીએ એમ પણ કહ્યું કે ગોસ્વામી તુલસીદાસે આ અંગે એક નારો પણ આપ્યો હતો કે રાજા રામચંદ્ર કી જય. ઈતિહાસકારોના મત મુજબ મુઘલ બાદશાહ અકબર અને તુલસીદાસ સમકાલીન હતાં.

સીએમ યોગી આદિત્યનાથે કહ્યું કે ઈતિહાસમાં એવી ધારણા છે કે અકબર ઉદારવાદી રાજા છે, પરંતુ જ્યારે અકબરને ખબર પડી કે તેમના શાસનકાળમાં એક સંત એવા પણ છે કે જેઓ રામનો મહિમા ગાય છે અને લોકોની વચ્ચે ભક્તિનો સંચાર કરે છે ત્યારે અકબરે તે મહાપુરુષને પોતાના નવરત્નોમાં જગ્યા આપીને તેમની ભક્તિધારાને પ્રભાવિત કરવાનું વિચાર્યું હતું. આથી તેમણે પોતાના એક દૂતને તુલસીદાસ પાસે મોકલ્યા હતા અને કહ્યું કે તમને આ મુલ્કના બાદશાહ બોલાવી રહ્યાં છે. જેના પર તુલસીદાસે પૂછ્યું કે આ બાદશાહ કોણ હોય છે? તો અકબરના દૂતે કહ્યું કે તેઓ આ દેશના રાજા છે. જેના જવાબમાં તુલસીદાસે કહ્યું કે મારા રાજા માત્ર એક જ છે અને તે છે ભગવાન રામ. સીએમ યોગી આદિત્યનાથે એમ પણ કહ્યું કે ત્યારબાદ તુલસીદાસજીએ એક નારો આપ્યો હતો જે અત્યારે પણ પ્રસિદ્ધ છે. આ નારો હતો રાજા રામચંદ્રની જય.
સીએમ યોગી આદિત્યનાથે કહ્યું કે વિશ્વ વિજેતા રહી ચૂકેલા સિકંદર પણ પોતાની જાતને ભારતના બાદશાહ સાબિત કરવાની કોશિશ કરી હતી પરંતુ અહીંના સંતોએ તેમને પણ નકાર્યા હતાં. આ કાર્યક્રમમાં તેમણે બાબા ગંભીરનાથની પણ ચર્ચા કરી અને કહ્યું કે નિસ્વાર્થ સેવાના મામલે આવા સંતો બહુ ઓછા જોવા મળે છે. ભારતવર્ષમાં સંતોની એક ગૌરવશાળી પરંપરા રહી છે અને દેશવાસીઓએ હંમેશા આ પરંપરાનું સન્માન કર્યું છે.

રાજકોટમાં ગેરકાયદે કતલખાના-માંસાહાર ધમધોકાર

ઉત્તર પ્રદેશના મુખ્યમંત્રી યોગી આદિત્યનાથજીએ ગેરકાયદે કતલખાના અંગે પગલાં ભર્યા તેની દેશભરમાં સરાહના થઇ રહી છે. આ સામે ચોમેર ધમધમતા ગેરકાયદે કતલખાના અંગે અવાજ પણ ઉઠી રહ્યો છે. ગુજરાત ભાજપનું મોડેલ રાજય છે, અહીંથી ઉકેલી નેતાગીરીએ દેશમાં સંસ્કૃતિની પુનઃ સ્થાપના આદરી છે. આ સંજોગોમાં ગુજરાતમાં ચાલતા ગેરકાયદે કતલખાના બંધ કરાવવા જૈન સમાજ રાજકોટ તથા કરુણા ફાઉન્ડેશને અવાજ ઉઠાવ્યો છે.
   રાજકોટમાં ગેરકાયદે કતલખાના ધમધમે છે. દરેક વિસ્તારમાં નોનવેજનું ગેરકાયદે વેચાણ થાય છે. આ સામે કડક કાયદાકીય પગલાં  ભરવા માંગણી થઇ છે.
   જીવદયા ફાઉન્ડેશનની યાદી પ્રમાણે રાજકોટમાં ચાલતા ગેરકાયદેસર કતલખાના,બિનઅધિકૃત નોનવેજ વેંચાણ કેન્દ્રો
મોચી બજાર,ભિલવાસ (મોટાભાગના, રેસ્ટોરન્ટ તેમજ રેકડીઓ), જંગલેશ્વર (ગેરકાયદેસર)૩ થી ૪ જગ્યાએ, ભગવતીપરા (ગેરકાયદેસર)૧ જગ્યાએ, મોરબી રોડ (જુના-સીટી સ્ટેશન) (ભંગાર ભેગા કરે છે ત્યાં) (ગેરકાયદેસર), થોરાળા, દુધની ડેરી સામે વેચાણ કેન્દ્રો છે.


   પશુઓનો મેળોઃ- (ગેરકાયદેસર):-

   ૮૦ ફુટ રોડ, કે.એસ.ડીઝલ સામે, ગમારા પેટ્રોલ પંપની બાજુમાં, ૭-૮ વખતની ધરપકડ થઇ છે. કોઠારીયા સોલવન્ટ પાસે પશુ મેળામાં ગેરકાયદેસર વેચાણ થાય છે.
   રાજકોટમાં ખુલ્લેઆમ ઉભી રહેતી આમલેટ/ નોનવેજની લારીઓ (આમા જગ્યા રોકાણ કાયદાનો ભંગ થાય છે):- રાજકોટના કાલાવાડ રોડ પર મોટા મૌવા પછી ૩ થી ૪ લારીઓ, ફુલછાબ ચોકમાં ખુલ્લામાં ચીકન લટકાવીને વેચતી ૧૪ લારીઓ, જંકશન (રેલ્વે) પાસે ૪ લારીઓ, અંડરબ્રીજ મહીલા કોલેજ ઉપર ૧ લારી પાટા પાસે, આજીડેમ, કોઠારીયા રોડ હાઇવે પર ૩ લારી, માર્કેટ યાર્ડ પાસે ૪ થી ૫ લારી, અંડર બ્રીજ ક્રોસ કરીને આલાબાઇનાં ભઠ્ઠા પાસે ૧ લારી, ઇગલ પેટ્રોલ પંપ પાસે ૫ રેસ્ટોરન્ટ, ભીલવાસ ચોકમાં મટન માર્કેટ ચાલુ થઇ ગઇ છે. જે સંપુર્ણ પણે ગેરકાયદેસર છે, જાહેરમાં કેબીન નાખીને સેકડો મરઘા કપાય છે, બી.પી.એમ.સી. એકટ પ્રમાણે ચોખ્ખાઇનાં એકપણ નીયમનું ધ્યાન રાખવામાં આવતું નથી, રૈયા રોડ પર ૧૦ લારી, રૈયા ચોકડીથી ઇન્દીરા સર્કલ સુધી ૫ લારીઓ, ઇન્દીરા સર્કલથી ગોંડલ ચોકડી સુધી ૫ લારીઓ, લક્ષ્મીનગર નાલા પાસે ૨ લારીઓ, ગોંડલ ચોકડીથી ગ્રીનલેન્ડ ચોકડીથી સુધી ૫ લારીઓ, મોટામવા સ્મશાનથી આગળ ચાલતી લારી-ગલ્લાઓ હજારો નાના-મોટા ભુલકા-વિદ્યાર્થીઓ જયા ભણે  છે તે શાસ્ત્રી સ્કૂલ (રેસકોર્સ સામે) વાળી શેરી, રેડક્રોસ (જયાં અવારનવાર લગ્ન સમારોહ ધમધમતા હોય છે)ની બરાબર સામે છેલ્લા ૪ મહિનામાંજ ૩ પરપ્રાંતીયોની નોનવેજની રેકડીઓ રાત્રે ગોઠવાઇ ગઇ છે.
   આજીડેમ પાસે મેલડી માતાનાં મંદિરની પાછળ, ચૌકીઢાણી પાછળ, સાંઇબાબાના મંદીરની સામે જ જળાશયમાં હોડકા લઇ ૫૦ થી વધુ માણસો માછીમારી કરે છે. નાના નાના જળાશયો પાસે, મોરબી રોડ પર માછીમારો, જળાશયો પાસે રેગ્યુલર માછીમારી થાય છે.


   જે કોઇ જગ્યાએ આ પ્રવૃતિઓ ચાલી રહી છે તેની આસપાસની ૧૦૦ એ ૧૦૦ ટકા પ્રજા હિંદુ-શાકાહારી-અહીંસાવાદી છે. ધોરી નસ જેવા રસતાઓ પર (ભીલવાસ,ફુલછાબ ચોક)માં આ બધુ વહેલી સવારથી મોડી રાત સુચી ચાલે છે. જે ફરજીયાત બધાએ જોવું પડે છે. આ કતલખાના આસપાસ સંર્પુણ પણે હિન્દુ પ્રજા છે. તેમજ હિન્દુઓના પવિત્ર વર્ષો જુનો ધર્મો સ્થળો છે જેની યાદી નીચે પ્રમાણે છે. જાગનાથ મંદિર, પંચનાથ ંમદિર, કાશી વિશ્વનાથ મહાદેવ મંદિર, મહાકાળી મંદિર, જલારામ મંદિર, રવિ હોટલ સામે મહાદેવ મંદિર. જાગનાથ દેરાસર, શ્રીમદ રાજચંદ્ર મંદિર, દીગંબર જૈન મંદિર, આટલા ધાર્મીક સ્થળો જો આ જગ્યાની આસપાસ છે જયાં જવું હોય તો કતલખાના, મટન માર્કેટ ચીરીને જ જવુ પડે અને ધાર્મિક લાગણી સતત દુભાય રોજ દુભાય.



   ભીલવાસની કેટલી રેસ્ટોરન્ટ (મટન) અને કતલખાના પાસે બી.પી. એમ.સી. એકટ મુજબની પરવાનગી છે? ભીલવાસમાં ગેરકાયદેસર કતલ માટેના પશુઓ/મરઘાઓ/ઘેટાઓને ખુલ્લા મુકાય છે જે લોકો રોજ જુએ છે. જીવ બાળે છે. નાના પાડાની કતલ ગેરકાયદેસર છે. છતાં રોજ કતલ થાય છે અને તે બાબત અગાઉ મ્યુ. કમીશ્નરને ઘર્ષણ પણ થઇ ચુકયું છે છતા કોઇ ફેર નથી પડયો. શ્રાવણ માસ-પર્યુષણ દરમીયાન પણ પરિસ્થિતિમાં કોઇ ફેર નથી પડ્યો. સદરનું કતલખાનું બંધ રહે પણ બાકીની બધી મટન માર્કેટ કે જે સંપુર્ણ ગેરકાયદેસર છે તેનું શું? સરકારી તંત્ર-કલેકટર તંત્ર-મ્યુનીસીપાલીટી-કોર્પોરેશન-પોલીસ તંત્ર-ધારાસભ્યો-સાંસદો ને આ અંગે અનેકો રજુઆત થઇ ચૂકી છે.
   કાયદો
   દરેક ધર્મની લાગણીને માન આપવુ એ રાજય સરકારનો કાયદો છે (ભારતના બંધારણ પ્રમાણે), બી.પી.એમ.સી. એકટ મુજબ આ અંગેની જવાબદારી સંપૂર્ણ પણે નગરપાલીકાની છે (કલમ નં.૩૩૫) આ સંજોગોમાં શહેરની શાંતિ અને કાયદો વ્યવસ્થાની જાળવણી માટે પોલીસ કમિશ્નર પણ આમા ધ્યાન આપે તે જરૂરી હોવાનું કરૂણા ફાઉન્ડેશન જણાવે છે.
   કતલખાનામાં રેડ અન્વયે કલમોની માહિતી

   (૧) મુંબઇ પશુ સંરક્ષણ ધારો ૧૯પ૪ - કલમ નંબર પ-૬-૮
   અધિકૃત પશુ ડોકટરનાં સર્ટીફીકેટ બાદ જ પશુઓની કતલ થઇ શકે છે
   પશુ ગૌવંશ ન હોવું જોઇએ.
   પશુ સંપુર્ણ પણે બીન ઉત્પાદક હોવુ જોઇએ.
   અધિકૃત પરવાનગીઓ જરૂરી એન. ઓ. સી. બાદ જ કતલ થઇ શકે, જે નીચે મુજબ છે.
   (૧) મ્યુનીસીપાલીટી-ગ્રામ પંચાયતની પરવાનગી.
   (ર) પ્રદુષણ નિયંત્રણ બોર્ડનું એન. ઓ. સી.
    (૩) કલેકટરની પરવાનગી (કાયમી)
   (ર) આઇ. પી. સી. કલમ નં. ૪ર૯
   ઉપર મુજબનાં નિયમોનું પાલન કર્યા બાદ જ પશુ ને કે પશુઓનાં અવયવોને નકામાં બનાવવા કે પશુ ને આંખુ નકામુ બનાવી શકાય (કાયદાકીય વધ)
   જો નિયમનું પાલન કરવામાં ન આવે તો પ વર્ષની સજાની જોગવાઇ.
   (૩) આઇ. પી. સી. કલમ નં. ર૬૯
   કતલ થયેલ માંસ વાસી છે કે રોગ જન્ય છે કે ની તેનો નિત્ય પુરાવો જોઇએ (મ્યુનીસીપાલટી દ્વારા ચેકીંગ થવું જોઇએ) જો આમાં કોઇ કસાઇ દોષીત પુરવાર થાય તો નીચે મુજબ જોગવાઇ
   ૩ વર્ષની જેલ સજા
   (૪) આઇ. પી. સી. કલમ નં. ર૯પ
   અહીંસાવાદીઓની ધાર્મિક લાગણી દુભાવાથી આ કલમ લાગુ પાડી શકાય છે. જો જાહેરમાં પ્રવૃતિ થતી હોય તો હૃદય દ્રવી ઉઠે અથવા અસર થાય તો ગુનો બને છે.
   મુંબઇ પશુ સંરક્ષણધારો ૧૯પ૪ મુજબ છ માસ જેલની સજા