Sunday, 21 February 2016

भा ज पा राष्ट्रिय अध्यक्षजी को अभिनंदन



जय गंगाजलः यूपी पुलिस से बोले प्रकाश झा जरूर देखें यह फिल्म

दिग्गज फिल्मकार प्रकाश झा ने उत्तर प्रदेश पुलिस से 4 मार्च को रिलीज हो रही प्रियंका चोपड़ा स्टारर फिल्म 'जय गंगाजल' देखने की अपील की है। झा की यह फिल्म पूरी तरह से पुलिस की कार्यशैली पर आधारित है। फिल्म में समाज के लिये काम करने के बावजूद आम लोगों की पुलिस की खराब छवि की वजह बताई गई है।

पत्र के साथ भेजी प्रोमो की सीडी


झा ने अपनी फिल्म में पुलिस विभाग की कमियों को भी उजागर करने का प्रयास किया है, जिनसे पुलिसकर्मी भी परेशान होते हैं। उन्होंने थानेदारों को पत्र लिखकर उन्हें फिल्म बनाने का कारण बताया और इसे देखने की अपील की। साथ ही उन्होंने थानेदारों को फिल्म के प्रोमो की सीडी भी भेजी है।

251 रूपये के फ्रीडम स्मार्ट फोन का सच

देश का सबसे सस्ते स्मार्ट फ़ोन ”फ्रीडम -251” बुकिंग होने से पहले ही संदेह के घेरे में आ गया है। सोशल मीडिया में छाने के बाद जैसे ही बुकिंग की प्रक्रिया का वक़्त शुरू हुआ वैसे ही रिंगिंग बेल्स कंपनी की वेबसाइट ही क्रेश हो गई। अखबारों में कंपनी के विज्ञापनों में दिए गए कई फोन नंबरों से कोई संपर्क नही हो पा रहा है। जिसके बाद इस सस्ते स्मार्ट फोन फ्रीडम-251 का राज खुलता जा रहा है। टेलिकॉम मिनिस्ट्री भी अब इसको लेकर हरकत में आ गई है और इस फोन को लेकर अब टेलिकॉम मंत्रालय ने जांच के आदेश दे दिए हैं। कुछ जानकारों ने पहले इस मोबाइल को लेकर सवाल उठाये थे।

251 रूपये के इस फोन का विज्ञापन अखबारों में सामने आया लोग बड़ी संख्या में कंपनी की वेबसाइट पर आने लगे। कंपनी को सेकण्ड 6 लाख से ज्यादा हिट मिल गए। ख़बरों के अनुसार आज बड़ी संख्या में लोग खुद कंपनी के नॉएडा स्थित दफ्तर पहुँच गए। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस सबसे सस्ते स्मार्ट फोन को लेकर कोई धोखाधड़ी हो रही है। बीजेपी नेता किरीट सोमैया ने कहा है कि इसमें कोई बड़ा घोटाला हो सकता है।

कौन है कंपनी का डायरेक्टर मोहित गोयल ? जानकारी के अनुसार इस कंपनी के डायरेक्टर मोहित गोयल शामली के रहने वाले हैं। उनके पिता एक छोटी सी ग्रोसरी की दुकान चलाते हैं। मोहित के पास मोबाइल इंजीनियरिंग से सम्बंधित कोई प्रोफेशनल अनुभव भी नही है। ”इंडिया संवाद” ने जब रिंगिंग बेल कंपनी की जानकारी जुटानी शुरू की तो पता चला कि मोहित ने सितम्बर 2015 को ही कंपनी शुरू की है। दिसंबर में उन्होंने धारणा गोयल से शादी कर ली, जिन्हे कि कंपनी का सीईओ बताया गया है।

कंपनी का पता है नॉएडा में कंपनी की वेबसाइट अनुसार कंपनी के दफ्तर का पता नॉएडा सेक्टर 63 में B -44 बताया गया है लेकिन दफ्तर को देखकर ऐसा लगता है कि यह कुछ दिन पहले ही शुरू किया गया है। कंपनी के दफ्तर के बाहर गुब्बारे लटके अभी भी साफ़ दिखाई दे रहा है।

कम्पनी के पास इतने स्मार्ट फ़ोन कहाँ से आये ? कई लोग सवाल यह भी उठा रहे हैं कि कंपनी ने जब इन स्मार्ट फ़ोन को इम्पोर्ट ही नही किया तो वह आये कहा से क्योंकि कंपनी का कहना है कि वह अब अपनी मेनिफ़ेक्चर दफ्तरों को भविष्य में उत्तराखंड में बनाने की सोच रही है। वहीँ इस मोबाइल फ़ोन के उद्घाटन के मौके पर मनोहर परिकर आने वाले थे लेकिन वह नही आये।

प्रमोशन के दौरान कंपनी ने दिखाया दूसरी कंपनी का फोन कहा जा रहा है कि इस कंपनी के विज्ञापन में ही करोड़ों रूपये खर्च किये गए। अखबार की रिपोर्ट के अनुसार कंपनी ने अपने प्रमोशन में जो स्मार्ट फोन दिखाए उनमे एडकॉम नामक कंपनी का लोगों था जब  एडकॉम कंपनी से बात की गई तो उन्होंने माना कि यह उन्ही की कंपनी का मोबाइल है। उनका कहना था कि उन्हों किसी से इस फ़ोन को लेकर कोई डील नही की है। जिसके बाद रिंगिंग बेल को संदेह और भी गहराता जा रहा है।

क्या कहती है फ़ोन की कीमत को लेकर मोबाइल इंडस्ट्री ”इंडिया संवाद” ने जब तहकीकात इस बात को लेकर करनी शुरू की कि आखिर सबसे सस्ता स्मार्ट फ़ोन किस कीमत में मिल रहा है। जो बात इस तहकीकात में पता लगी उससे साफ़ हुआ कि चीन में बना सिमटेल कंपनी का सबसे सस्ता स्मार्ट फ़ोन भी 1800 रूपये से कम में में मिलता है। दिल्ली के सबसे बड़े मोबाइल मार्केट के कुछ डीलरों से भी जब इस सम्बन्ध में बातचीत की गई तो उनका मानना था कि सबसे सस्ता स्मार्ट फ़ोन 1100 रूपये से कम में नही मिल सकता। कुछ मोबाइल इम्पोर्टर से बातचीत में पता चला कि कई बार चीन से इम्पोर्ट की गई शिपमेंट कुछ कारणों से रद्द की जाती है। वह रद्द रद्द की गई शिपमेंट सस्ते कीमत में बेच ली जाती है लेकिन उन मोबाइल की कीमत भी इतनी कम नही हो सकती। मोबाइल जानकारों का कहना है कि सबसे सस्ते स्मार्ट फ़ोन की कीमत की डिस्प्ले की कीमत 500 से कम नही है।


Source : hindi.indiasamvad.co.in

વિજયભાઇ માટે માત્ર વિજય નહિ, પ્રચંડ વિજય ગણાશે

સરકાર લોકનિષ્‍ઠાથી કામ કરે તેવી ફરજ પાડીને લોકો નો વિશ્વાસ મેળવીને ભા જ પ ને ઉચ્ચ શિખરે પહોચવા વિજયભાઇ માટે માત્ર વિજય નહિ, 
પ્રચંડ વિજય ગણાશે 
ખુબ ખુબ અભિનંદન અને શુભેચ્છાઓ...
જય ભારત વન્દે માતરમ


अजहर से कम खतरनाक नहीं: 33 चर्चित लोगों का बयान

राष्ट्रविरोधी नारे लगाने वाले आतंकी मसूद अजहर से कम खतरनाक नहीं: 33 चर्चित लोगों का बयान

जेएनयू विवाद को लेकर आवाज उठाते हुए बौद्धिक लोगों के एक समूह ने कहा है कि विश्वविद्यालय कैंपस में कथित तौर पर राष्ट्रविरोधी नारे लगाने वाले पाकिस्तान स्थित आतंकी गुट जेईएम प्रमुख मौलाना मसूद अजहर से ‘जरा भी कम खतरनाक’ नहीं हैं।

बौद्धिक लोगों और कलाकारों सहित 33 लोगों की सहमति वाली एक अपील में कहा गया है, ‘शैक्षिक परिसरों में राष्ट्रविरोधी नारों ने हमारी चेतना को झिंझोर दिया है। भारत को कमजोर करने के लिए प्रतिष्ठित परिसर में नारेबाजी होती है और अगर संसद हमले के दोषी अफजल गुरू की शहीद के तौर पर सराहना होती है तो यह शर्मनाक और चिंताजनक है।
’ अभिनेता अनुपम खेर और परेश रावल, पत्रकार स्वप्न दासगुप्ता, पूर्व लोकसभा महासचिव सुभाष कश्यप, अर्थशास्त्री बिबेक देबराय, गीतकार और विज्ञापन क्षेत्र की बड़ी हस्ती प्रसून जोशी समेत अन्य ने इस अपील का समर्थन किया है।अपील में लिखा गया है, ‘हमारा मानना है कि राष्ट्रविरोधी ताकतों की यह सोची समझी साजिश है और हमारा मानना है कि इस तरह के जो नारे लगाते हैं वे आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर की सोच की तुलना में जरा भी कम खतरनाक नहीं हैं।’ जेएनयू की घटना को छिपा हुआ खतरा बताते हुए इसमें कहा गया, ‘हम सरकार के खिलाफ वैचारिक असहमति का स्वागत करते हैं लेकिन सभी देशभक्तों के लिए इस तरह की नारेबाजी अस्वीकार्य है।’ अपील में कहा गया है कि ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर इस तरह की घटना को छिपाने की कोशिश हो रही है।

जाट आरक्षण : आंदोलन या फिर 'साजिश' ?

हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन ने हिंसक रूप अख्तियार कर लिया है। खट्टर सरकार के जाट नेता व मंत्री, पुलिस और सेना को निशाना बनाते हुए यह आंदोलन अब पूरी तरह से समाज विरोधी रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। पूरे प्रदेश में जातीय टकराव की खतरनाक स्थिति बन गई है। निश्चित रूप से इस आंदोलन ने एक साथ कई सवाल खड़े किये हैं? पहला ये कि जाट आरक्षण आंदोलन किसी साजिश का हिस्सा तो नहीं है? क्या जाटों ने आंदोलन की परिभाषा को बदल दिया है? और अंतिम सवाल यह कि आंदोलन का इतने कम समय में इतना हिंसक रूप अख्तियार कर लेना सरकारी मशीनरी की विफलता नहीं है ?
दरअसल जाटों का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता में समुह बनाकर खेती करने वालों से लेकर सत्ता सुख के लिए राजनीति के दौर में समूह बनाकर ब्राहमणवाद और पूंजीवाद से लड़ने और मरने तक का है। इस लेख को लिखने के दौरान जब जाटों के बारे में कुछ तथ्य ढूंढने निकला तो एक बड़ी ही रोचक कहानी से रू-ब-रू हुआ--
जाट ने एक दिन भगवान से कहा : मुझे खुशियां दे दे!
भगवान बोले : ठीक है, पर सिर्फ चार बार ही दूंगा।
वे चार बार तू बता?
जाट ने कहा : ठीक है, गर्मियों, सर्दियों, बरसात और वसंत में। 
भगवान हैरान रह गए! और बोले : नहीं, सिर्फ तीन बार दूंगा। 
जाट ने कहा : ठीक है, आज, कल और परसों दे दे। 
भगवान फिर हैरान रह गए और बोले : सिर्फ दो बार ही दूंगा। 
जाट ने कहा : ठीक है, दिन और रात दे दे। 
भगवान फिर से हैरान रह गए! और बोले : सिर्फ एक दिन ही दूंगा। 
जाट ने कहा : हर दिन। 
फिर भगवान हंसने लगे और बोले : रै जाट, तेरे रहेंगे हमेशा ठाठ।


कहने का मतलब यह कि आप कुछ भी कीजिए, लेकिन जाट के ठाठ में किसी तरह की कोई कमी आई तो जाट बिरादरी इसे कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता। इस छोटी सी कहानी को पढ़ने के बाद मैं क्या, शायद आप भी इस नतीजे पर जरूर पहुंचे होंगे कि हरियाणा में कहीं न कहीं जाट के ठाठ में सरकार या सियासत के स्तर पर दखलंदाजी हुई है जो उसे नागवार गुजरा। आरक्षण की मांग तो एक बहाना भर है, एक साजिश भर है। असली कहानी तो कुछ और ही है। हरियाणा के सियासी पंडित बताते हैं कि असली निशाना तो जाटों के गढ़ में मनोहर लाल खट्टर के रूप में गैर जाट मुख्यमंत्री हैं।
आरक्षण मांग रही जाट समुदाय का यह आंदोलन इतना बड़ा और हिंसक हो जाएगा, इसका अंदाजा हरियाणा की खट्टर सरकार को भी नहीं रहा होगा। कहीं न कहीं इस हिंसक आंदोलन को सरकार की विफलता के तौर पर भी देखा जा रहा है। सरकार की इंटेलिजेंस यह पता लगाने में पूरी तरह से विफल रही कि इतने बड़े पैमाने पर आंदोलन की तैयारी है क्योंकि इतना बड़ा आंदोलन एक-दो दिनों की कवायद तो नहीं हो सकती है। इसके लिए काफी लंबा वक्त लगा होगा। गांव-गांव में जाट नेताओं ने बैठकें की होंगी और आंदोलनकारियों को सर पर कफन बांधकर निकलने के लिए ब्रेनवाश भी किया गया होगा।
दरअसल, पिछली हुड्डा सरकार का आरक्षण देने का फैसला कोर्ट के आदेश पर रद्द हो गया था। इसके बाद से जाट समुदाय खट्टर सरकार पर नया रास्ता तलाशने का दबाव बढ़ा रही थी। लेकिन खट्टर सरकार को यह समझ में नहीं आया कि वह जाटों को कैसे मनाएं। हरियाणा में 30 प्रतिशत आबादी रखने वाली जाट बिरादरी अपने लिए ओबीसी कैटेगरी में आरक्षण चाहती है। और यह संभव नहीं है।
हुड्‌डा सरकार ने 2012 में स्पेशल बैकवर्ड क्लास (एसबीसी) के तहत जाट, जट सिख, रोड, बिश्नोई और त्यागी समुदाय को आरक्षण दिया। यूपीए सरकार ने भी 2014 में हरियाणा समेत नौ राज्यों में जाटों को ओबीसी में लाने का ऐलान किया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जाटों को पिछड़ा मानने से इनकार कर यूपीए सरकार का आदेश रद्द कर दिया। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद 19 सितंबर 2015 को खट्टर सरकार को भी जाटों सहित पांच जातियों को आरक्षण देने की अधिसूचना को वापस लेना पड़ा। यह अधिसूचना हुड्डा सरकार के वक्त जारी हुआ था। इसके बाद से जाट समुदाय खट्टर सरकार पर नया रास्ता तलाशने का दबाव बना रही थी।
हरियाणा में कुल 67 प्रतिशत आरक्षण पहले से ही लागू है। अनुसूचित जाति को 20 प्रतिशत, बैकवर्ड क्लास-ए को 16 प्रतिशत, बैकवर्ड क्लास-बी को 11 प्रतिशत, स्पेशल बैकवर्ड क्लास को 10 प्रतिशत और आर्थिक रूप से बैकवर्ड क्लास-सी को 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। जाट नेता अपनी बिरादरी के लिए अब ओबीसी कैटेगरी में आरक्षण चाहते हैं। लेकिन हरियाणा सरकार इसपर राजी नहीं है। कहने का तात्पर्य कि आरक्षण का जो गणित है वह जाट आरक्षण आंदोलन के नेताओं को भी पता है कि यह संभव नहीं है लेकिन वह इसे भावनात्मक मुद्दा बनाकर गैरजाट मुख्यमंत्री को सत्ता से बेदखल करना चाहते हैं। जाट बहुल प्रदेश में कोई गैरजाट नेता मुख्यमंत्री बन जाए यह जाट समुदाय को पच नहीं रहा है। इसलिए जाट आरक्षण आंदोलन नहीं एक साजिश है कहने या मानने में कोई संदेह नहीं है। 
जहां तक आंदोलन की अवधारणा की बात है तो इस कसौटी पर भी जाट आरक्षण आंदोलन को उचित नहीं ठहराया जा सकता है। आंदोलन समाज और देश के हित में होता है। यह आंदोलन की पहली शर्त होती है। लेकिन जाट आरक्षण आंदोलन से किस समाज और देश का भला हो रहा है? खुद जाट समाज के लिए भी यह आंदोलन जानलेवा साबित हो रहा है। लोगों की जानें जा रही हैं। सामाजिक तानाबाना छिन्न-भिन्न हो रहा है। पीने का पानी और दूध का संकट पैदा हो गया है। लोग कहीं आ-जा नहीं सकते हैं। स्कूल कॉलेज, सरकारी दफ्तर सब बंद हो गए हैं। खाने-पीने के जरूरी सामान नहीं मिल रहे हैं। पेट्रोल पंप, सरकारी कार्यालय, सर्किट हाउस, मंत्रियों के घर, रेलवे स्टेशन, पुलिस चौकी और सरकारी व सार्वजनिक वाहनों में आग लगाई जा रही है। पूरे प्रदेश में अराजकता का माहौल है।
बड़ा सवाल यह है कि संवैधानिक स्थिति एवं सामाजिक औचित्य को दरकिनार कर विपक्ष में रहते हुए देश और प्रदेश की तमाम सियासी पार्टियां आरक्षण जैसी मांगों को हवा देती हैं और सत्ता में आने पर उसकी कीमत चुकाती हैं। यह सवाल उठाने का साहस कोई राजनीतिक दल नहीं कर पा रहा है कि क्या आरक्षण ही तमाम आर्थिक-सामाजिक कठिनाइयों का समाधान है? गुजरात में पटेल समुदाय आरक्षण की मांग करे, हरियाणा में जाट समुदाय आरक्षण की मांग करे तो इससे ज्यादा हास्यास्पद बात कुछ और हो नहीं सकती। इसलिए आज जरूरत है इस तरह की मांगों से प्रेरित आंदोलन की रणनीति या मंशा को सरकार समझे और समय रहते इसका उचित समाधान करे।

Saturday, 13 February 2016

क्या मुस्लिम वास्तव में देश भक्त है ???


यह किसी पेज का स्क्रीन शॉट है जिसमे प्रश्न पूछा गया है कि आपको क्या होने पर गर्व है 1. भारतीय, 2. हिन्दू 3. मुस्लिम और इसमें 10 लोगो के कमेन्ट दिख रहा है जिसमेंं 5 हिन्दू और 5 मुस्लिम है। चित्र में सभी मुस्लिमो ने मुस्लिम (पीले रंग में) होने पर गर्व होने की बात कही उसी में मु‍स्लिम ने मुस्लिम और भारतीय होने पर गर्व होने की बात कही, सभी हिन्दूओं ने भारतीय होने में गर्व की बात कही और उसी मे से एक हिन्दू ने भारतीय के साथ हिन्दू होने की बात कही।
यह चित्र उस मुस्लिम चेहरे का प्रतिनिधित्व करता है उसकी सोच को दर्शाता है कि वास्तव देश इस्लाम की अपेक्षा आज भी उनके लिये दोयम दर्जे पर है। ज्‍यादातर मुस्लिम देश की मुख्‍य धारा मे जुडे ही नही और जुडना भी नही चाहते है। ज्‍यादातर मुस्लिमो को भारतीय होने ज्‍यादा मु‍सलमान हाने पर गर्व है। मुस्लिमो की यह सोच धर्मनिपेक्षता की श्रेणी मे आता हैै यह साम्‍प्रा‍यिकता की श्रेणी में यह तथाकथित वोट बैंक सेक्‍युलर नेताओ के लिये सोचने का विषय है।देश के मुस्लिमोे के नाम पर बटवारे के बाद भी आज मुुस्लिम भारत परस्‍त नही है, उनकी निष्‍ठा आज भी देश से ज्यादा इस्‍लाम पर है। भारत देश की रचना इसलिये पंथनिरपेक्ष राष्‍ट्र की नही रखी गर्इ कि धर्म कोे देश के से उपर रखा जाये।
घिन आती है तुच्‍छ धर्मिक मानसिकता पर जब देश में ही तिरंगे को पैरों तले रौदा जाता है और पाकिस्‍तानी झंडे को लहराया जाता है। कही न कही गडबड जरूर है भारत केे मुस्लिम बुरे नही है उनकी मानसिकता बुरी है। विश्‍व के कई देशो यहां तक कि इस्‍लामिक देशो में मुसलमान इस्‍लाम की पोंगापंथी को त्‍याग कर देश की मुख्‍यधारा जुडे हुये है। यह विचार करने की जरूरत है कि भारत जैसे देश मे जहां उनको सारी सहुलियत मौजूद है जोे उनको इस्‍लामिक देश मे नही है वहाँ उनकी मुस्लिम मानसिकता देश से सर्वोपरि है। आज जरूरत है कि रोग को पहचान कर उनका इलाज करने कीए कठोर निर्णय लेने की। जिससे पोंगा पंथी विचारधारा से मुक्ति की परिवर्तन हवा सभी तक पहुॅचे। बाकी जरूरत करने की जरूरत है ज्‍यादा कुछ कहने की नही है।

मुलायम सिंह यादव का परिवारवाद : सपा


एक बार संसद में गोरखपुर से भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ ने कहा कि मुलायम सिंह यादव खुद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, दो भाई पार्टी के महासचिव और बेटा प्रदेश अध्यक्ष है। यह समाजवाद है या परिवारवाद? योगी के इस सवाल ने भारतीय राजनीति में परिवारवाद के मुद्दे को एक बार फिर से गरम कर दिया है। भारत की राजनीति में परिवारवाद का बोलबाला अब काफी बढ़ गया है। शायद ही कोई पॉलिटिकल पार्टी ऐसी हो, जिसमें परिवारवाद और वंशवाद की बेल दिखाई नहीं पड़ती हो। 

कांग्रेस से लेकर तमाम क्षेत्रीय दलों में परिवारवाद की जड़ें काफी मजबूत हो गई हैं। काडर आधारित दलों जैसे कम्युनिस्ट पार्टियों और भाजपा में परिवारवाद भले न दिखाई पड़े, पर दक्षिण की क्षेत्रीय पार्टियां हों या उत्तर भारत के अनेकानेक दल, सभी में परिवारवाद और वंशवाद मजबूत होता चला गया है।

परिवारवाद को लोकतंत्र के लिए कभी अच्छा नहीं समझा गया, लेकिन तथ्य यह है कि कांग्रेस में ही इस प्रवृत्ति की शुरुआत हुई और धीरे-धीरे यह संक्रामक हो गई। कांग्रेस के अलावा यह प्रवृत्ति समाजवादी कहे जाने वाले नेताओं और पार्टियों में भी दिखलाई पड़ती है। लालू हों या मुलायम या रामविलास पासवान, कोई भी राजनीति में कोई भी परिवारवाद और वंशवाद को आगे बढ़ाने के मोह से बच नहीं पाए।




देश के सबसे बड़े राज्य और केंद्र में सरकार बनाने की चाबी अपने पास रखने का दावा करने वाले यूपी में सत्तानशीं समाजवादी पार्टी में परिवारवाद काफी मजबूत होकर उभरा है। आज यूपी की कमान सपा प्रमुख मुलायम सिंह के पुत्र अखिलेश के हाथों में है। सिर्फ अखिलेश ही नहीं, मुलायम के परिवार की तीसरी पीढ़ी का भी अब राजनीति में दखल हो चुका है। यही नहीं, मुलायम परिवार की महिलाएं भी राजनीति में आगे बढ़ रही हैं।

देश के इस सबसे बड़े राजनीतिक कुनबे से कुल 13 लोग क्रमश: मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, डिंपल यादव, शिवपाल यादव, राम गोपाल यादव, अंशुल यादव, प्रेमलता यादव, अरविंद यादव, तेज प्रताप सिंह यादव, सरला यादव, अंकुर यादव, धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव राजनीतिक धरातल पर जोर-आजमाइश कर रहे हैं।

हेमचन्द्र विक्रमादित्य - एक विस्मृत हिंदु सम्राट



हेमू का पूरा नाम सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य है। हेमू इतिहास के भुला दिए गए उन चुनिन्दा महानायकों में शामिल है जिन्होंने इतिहास का रुख पलट कर रख दिया और हेमू ने बिलकुल अनजान से घर में जन्म लेकर, हिंदुस्तान के तख़्त पर राज़ किया। हेमू अपार पराक्रम एवं लगातार अपराजित रहने की वजह से उसे विक्रमादित्य की उपाधि दी गयी। नि:संदेह हेमू अथवा सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य दिल्ली के सिंहासन पर बैठे अंतिम हिन्दू सम्राट थे। उन्होंने अति साधारण परिवार में जन्म लेकर भारत की स्वतंत्रता के लिए शानदार कार्य किया था। उन्होंने भारत को एक शक्तिशाली हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए अत्यंत साहसी तथा पराक्रमपूर्ण विजय प्राप्त की थीं। सम्राट हेमचन्द्र वह महान न्यायवादी थे जिन्होंने भारत का भविष्य बदलने के लिए मृत्युपर्यंत भरसक प्रयत्न किए।वे एक प्रतिभाशाली शासक, एक सफल सेनानायक, एक चतुर राजनीतिज्ञ तथा दूर-द्रष्टा कूटनीतिज्ञ थे। समस्त पठानों तथा तत्कालीन मुगल शासकों -बाबर तथा हुंमायूं के काल तक एक भी हिन्दू इतने ऊंचे पद पर नहीं पहुंचा था। हेमचन्द्र भारतीय इतिहास में सर्वश्रेष्ठ स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने विदेशी शासन के विरुद्ध देश के लिए अपना बलिदान दिया।

 A Forgotten Hindu Emperor Maharaja Hemchandra Vikramaditya

हेमू का जन्म सन 1501 में राजस्थान के अलवर जिले के मछेरी नामक एक गांव में रायपूर्णदास के यहां हुआ था। इनके पिता पुरोहिताई का कार्य करते थे किन्तु बाद में मुगलों के द्वारा पुरोहितो को परेशान करने की वजह से रेवारी (हरियाणा) में आ कर नमक का व्यवसाय करने लगे। 'हेमू' (हेम चन्द्र) की शिक्षा रिवाडी में आरम्भ हुई। उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, फारसी, अरबी तथा गणित के अतिरिक्त घुडसवारी में भी महारत हासिल की। समय के साथ साथ हेमू ने पिता के नये व्यवसाय में अपना योगदान देना शुरु किया। काफी कम उम्र से ही हेमू, शेर शाह सूरी के लश्कर को अनाज एवं पोटेशियम नाइट्रेट (गन पावडर हेतु) उपलब्ध करने के व्यवसाय में पिताजी के साथ हो लिए थे। सन 1940 में शेर शाह सूरी ने हुमायु को हरा कर काबुल लौट जाने को विवश कर दिया था। हेमू ने उसी वक़्त रेवारी में धातु से विभिन्न तरह के हथियार बनाने के काम की नीव राखी, जो आज भी रेवारी में ब्रास, कोंपर, स्टील के बर्तन के आदि बनाने के काम के रूप में जारी है।| जब 22 मई, 1545 में शेरशाह सूरी की मृत्यु हुई, तब तक हेमू ने अपने प्रभाव का अच्छा खासा विस्तार कर लिया था। यही कारण है कि शेरशाह सूरी की मृत्यु के बाद जब उसका पुत्र इस्लामशाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा तो उसने हेमू की योग्यता को पहचान कर उन्हें शंगाही बाजार अर्थात दिल्ली में 'बाजार अधीक्षक' नियुक्त किया। कुछ समय बाद बाजार अधीक्षक के साथ-साथ हेमू को आंतरिक सुरक्षा का मुख्य अधिकारी भी नियुक्त कर दिया और उनके पद को वजीर के पद के समान मान्यता दी।

हेमचन्द्र विक्रमादित्य - एक विस्मृत हिंदु सम्राट

1545 में इस्लाम शाह की मृत्यु के बाद उसके 12 साल के पुत्र फ़िरोज़ शाह को उसी के चाचा के पुत्र आदिल शाह सूरी ने मार कर गद्दी हथिया ली। आदिल ने हेमू को अपना वजीर नियुक्त किया। आदिल अय्याश और शराबी था।।। कुल मिला कर पूरी तरह अफगानी सेना का नेतृत्व हेमू के हाथ में आ गया था। हेमू का सेना के भीतर जम के विरोध भी हुआ, पर हेमू अपने सारे प्रतिद्वंदियो को एक एक कर हराता चला गया। उस समय तक हेमू की अफगान सैनिक जिनमे से अधिकतर का जन्म भारत में ही हुआ था। अपने आप को भारत का रहवासी मानने लग गए थे और वे मुग़ल शासको को विदेशी मानते थे, इसी वजह से हेमू हिन्दू एवं अफगान दोनों में काफी लोकप्रिय हो गया था। हुमायु ने जब वापस हमला कर शेर शाह सूरी के भाई को परस्त किया तब हेमू बंगाल में था। हेमू ने तब दिल्ली की तरफ रुख किया और रास्ते में बंगाल, बिहार उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश की कई रियासतों को फ़तेह किया। आगरा में मुगलों के सेना नायक इस्कंदर खान उज्बेग को जब पता चला की हेमू उनकी तरफ आ रहा है तो वह बिना युद्ध किये ही मैदान छोड़ कर भाग गया ,इसके बाद हेमू ने 22 युद्ध जीते और दिल्ली सल्तनत का सम्राट बना। हेमू ने अपने जीवन काल में एक भी युद्ध नहीं हारा, पानीपत की लडाई में उसकी मृत्यु हुई जो उसका आखरी युद्ध था। अक्टूबर 6, 1556 में हेमू ने तरदी बेग खान (मुग़ल) को हारा कर दिल्ली पर विजय हासिल की।
Purana killa were hemu crowned as emperor of India
हेमू का किला
सन 1553 में हेमू के जीवन में एक बड़ा उत्कर्षकारी मोड़ आया। इस्लाम शाह की मृत्यु के बाद आदिलशाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा। आदिलशाह एक घोर विलासी शराबी और लम्पट शासक था। उसे अपने विरुद्ध बढ़ते विद्रोही को दबाने और राजस्व वसूली के लिए हेमू जैसे विश्वस्त परामर्शदाता और कुशल प्रशासक की आवश्यकता थी। उसने हेमू को ग्वालियर के किले में न केवल अपना प्रधानमंत्री बनाया वरन अफगान फौज का मुखिया भी नियुक्त कर दिया। अब तो राज्य प्रशासन का समस्त कार्य हेमू के हाथ में आ गया और व्यवहारिक रूप में वह ही राज्य का सर्वेसर्वा बन गए। शासन की बागडोर हाथों में आते ही हेमू ने टैक्स न चुकाने वाले विद्रोही अफगान सामंतों को बुरी तरह से कुचल डाला। इब्राहिम खान, सुल्तान मुहम्मद खान, ताज कर्रानी, रख खान नूरानी जैसे अनेक प्रबल विद्रोहियों को युद्ध में परास्त किया और एक-एक कर उन सभी को मौत के घाट उतार दिया। हेमू ने छप्परघटा के युद्ध में बंगाल के सूबेदार मुहम्मद शाह को मौत के घाट उतारा व बंगाल के विशाल राज्य पर कब्जा कर अपने गवर्नर शाहबाज खां को नियुक्त किया। इस बीच आदिल शाह का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और हेमू व्यवहारिक रूप से बादशाह माने जाने लगे। उन्हे हिंदू तथा अफगान सभी सेनापतियों का भारी समर्थन प्राप्त था। हेमू जिन दिनों बंगाल में विद्रोह को कुचलने में लगे थे। उनकी अनुपस्थिति का लाभ उठाकर जुलाई 1555 में हुमायुं ने पंजाब, दिल्ली और आगरा पर पुन: अपना अधिकार कर लिया।
इसके 6 माह बाद ही हुमायुं का देहांत हो गया और उसका नाबालिग पुत्र अकबर उसका उत्तराधिकारी बना। हेमू ने इसे अनुकूल अवसर जानकार मुगलों को परास्त करके और दिल्ली पर अपना एकछत्र शासन करने के स्वर्णिम अवसर के रूप में देखा। वह एक विशाल सेना को लेकर बंगाल से वर्तमान बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश को रौंदते हुए दिल्ली की ओर चल पड़े। उनके रण कौशल के आगे मुगल फौजदारों में भगदड़ मच गई। आगरा सूबे का मुगल कमांडर इस्कंदर खान उजबेक तो बिना लड़े ही आगरा छोड़कर भाग गया। हेमू ने इटावा, काल्पी, बयाना आदि सूबों पर बड़ी सरलता से कब्जा कर वर्तमान उत्तरप्रदेश के मध्य एवं पश्चिमी भागो पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। अब दिल्ली की बारी थी। 6 अक्टूबर 1956 को तुगलकाबाद के पास मात्र एक दिन की लड़ाई में हेमू ने अकबर की फौजों को हराकर दिल्ली को फतेह कर लिया। पुराने किले में जो प्रगति मैदान के सामने है अफगान तथा राजपूत सेनानायकों के सान्निध्य में पूर्ण धार्मिक विधि विधान में राज्याभिषेक कराया। 7 अक्तूबर, 1556 को भारतीय इतिहास का वह विजय दिवस आया जब दिल्ली के सिंहासन पर सैकड़ों वर्षों की गुलामी तथा अधीनता के बाद हिन्दू साम्राज्य की स्थापना हुई। विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार डा. आर.सी. मजूमदार ने इसे भारत के इतिहास के मुस्लिम शासन की अद्वितीय घटना बताया। वस्तुत: यह महान घटना, समूचे एशिया में दिल दहलाने वाली थी। आश्चर्य तो यह है कि मुस्लिम चाटुकार दरबारी इतिहासकारों तथा लेखकों से न्यायोचित प्रशंसा की अपेक्षा तो नहीं थी, बल्कि विश्व में निष्पक्षता तथा नैतिकता का ढोल पीटने वाले, किसी भी ब्रिटिश इतिहासकार ने हेमचन्द्र की वीरता एवं शौर्य के बारे में एक भी शब्द नहीं लिखा। संभवत: इससे उनका भारत पर राज करने का भावी स्वप्न पूरा न होता। वस्तुत: यह किसी भी भारतीय के लिए, जो भारतभूमि को पुण्यभूमि मातृभूमि मानता हो, अत्यंत गौरव का दिवस था।
हेमचन्द्र का राज्याभिषेक भी भारतीय इतिहास की अद्वितीय घटना थी। भारत के प्राचीन गौरवमय इतिहास से परिपूर्ण पुराने किले (पांडवों के किले) में हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुसार राज्याभिषेक था। अफगान तथा राजपूत सेना को सुसज्जित किया गया। सिंहासन पर एक सुन्दर छतरी लगाई गई। हेमचन्द्र ने भारत के शत्रुओं पर विजय के रूप में 'शकारि' विजेता की भांति 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की। नए सिक्के गढ़े गए। राज्याभिषेक की सर्वोच्च विशेषता सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य की घोषणाएं थीं जो आज भी किसी भी प्रबुद्ध शासक के लिए मार्गदर्शक हो सकती हैं। सम्राट ने पहली घोषणा की, कि भविष्य में गोहत्या पर प्रतिबंध होगा तथा आज्ञा न मानने वाले का सिर काट लिया जाएगा। उन्होंने शताब्दियों से विदेशी शासन की गुलामी में जकड़े भारत को मुक्त कराकर हेमचंद्र विक्रमादित्य की उपाधि धारण की व उत्तर भारत में दक्षिण भारत में स्थापित विजय नगर साम्राज्य की तर्ज पर हिंदू राज की स्थापना की। इस अवसर पर हेमू ने अपने चित्रों वाले सिक्के ढलवाए सेना का प्रभावी पुनर्गठन किया और बिना किसी अफगान सेना नायक को हटाए हिंदू अधिकारियों को नियुक्त किया। अपने कौशल, साहस और पराक्रम के बल पर अब हेमू हेमचंद विक्रमादित्य के नाम से देश की शासन सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर आसीन थे। अब्बुल फजल के अनुसार दिल्ली विजय के बाद हेमू काबुल पर आक्रमण करने की योजना बना रहे थे।
उधर अकबर अपने सेनापतियों की सलाह पर हेमू की बढ़ती शक्ति से डर कर काबुल लौट जाने की तैयारी में था कि उसके संरक्षक बैरमखां ने एक और मौका लेने की जिद की। दोनों ओर युद्ध की तैयारियां जोरों पर थी। हेमू एक विशाल सेना लेकर दिल्ली से पानीपत के लिए निकले। 5 नवम्बर 1556 को पानीपत के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने आ डटी। भय और सुरक्षा के विचार से अकबर और बैरमयां ने स्वयं इस युद्ध में भाग नहीं लिया और वे दोनों युद्ध क्षेत्र से 8-10 मील की दूरी पर, सौंधापुर गांव के कैंप में रहे किंतु हेमू ने स्वयं अपनी सेना का नेतृत्व किया। भयंकर युद्ध मे प्रारंभिक सफलताओं से ऐसा लगा कि मुगल सेना शीघ्र ही मैदान से भाग जाएगी लेकिन दुर्भाग्यवश एक तीर अचानक हाथी पर बैठे हेमू की आंख में लग गया। तीर निकाल कर हेमू ने लड़ाई जारी रखा। तीर लगने के कारण हेमू बेहोश हो गए। हेमचन्द्र का सर अकबर ने खुद काटा और अकबर को गाजी की ऊपदी मिली । हेमू का कटा सिर अफगानिस्तान स्थित काबुल भेजा गया जहां उसे एक किले के बाहर लटका दिया गया। जबकि उनका धड़ दिल्ली के पुराने किले के सामने जहां उनका राज्यभिषेक हुआ था, लटका दिया गया। इस प्रकार एक असाधारण व्यक्तित्व के धनी, भारत सम्राट की गौरवपूर्ण जीवन यात्रा पूरी हुई।
बैरमखाँ ने सैनिकों के सशस्त्र दल को हेमचन्द्र के अस्सी वर्षीय पिता के पास भेजा। उन को मुस्लमान होने अथवा कत्ल होने का विकल्प दिया गया। वृद्ध पिता ने गर्व से उत्तर दिया कि 'जिन देवों की अस्सी वर्ष तक पूजा अर्चना की है उन्हें कुछ वर्ष और जीने के लोभ में नहीं त्यागूंगा'। उत्तर के साथ ही उन्हे कत्ल कर दिया गया था। दिल्ली पहुँच कर अकबर ने 'कत्ले-आम' करवाया ताकि लोगों में भय का संचार हो और वह दोबारा विद्रोह का साहस ना कर सकें। कटे हुये सिरों के मीनार खडे किये गये। पानीपत के युद्ध संग्रहालय में इस संदर्भ का ऐक चित्र आज भी हिन्दूओं की दुर्दशा के समारक के रूप मे सुरक्षित है किन्तु हिन्दू समाज के लिय़े शर्म का विषय तो यह है कि हिन्दू सम्राट हेम चन्द्र विक्रमादूतीय का समृति चिन्ह भारत की राजधानी दिल्ली या हरियाणा में कहीं नहीं है।

Friday, 5 February 2016

अयोध्या में राममंदिर के ऊपर बनाई गई थी मस्जिद – डॉ. के.के. मोहम्म

डॉ.के.के. मोहम्मद

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रसिध्द पुरातत्ववेत्ता डॉ. के.के. मोहम्मद ने, वर्षों बाद भी अयोध्या प्रकरण का समाधान नहीं निकलने के लिए वामपंथी इतिहासकारों को उत्तरदायी ठहराया है । उनके अनुसार वामपंथियों ने इस मुद्दों का समाधान नहीं होने दिया ।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण उत्तर क्षेत्र के पूर्व निदेशक डॉ. मोहम्मद ने मलयालम में लिखी आत्मकथा ‘जानएन्ना भारतीयन’ (मैं एक भारतीय) में यह दावा करते हुए कहा है कि, ‘वामपंथी इतिहासकारों ने इस मुद्दे को लेकर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेताओं के साथ मिलकर देश के मुसलमानों को पथभ्रष्ट किया ।’ उनके अनुसार, इन लोगों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय तक को भी पथभ्रष्ट करने का प्रयास किया था ।
अपनी आत्मकथा में डॉ.के.के. मोहम्मद ने बताया है कि, १९७६-७७ के कालावधि में एएसआइ के तत्कालीन महानिदेशक प्रो. बीबी लाल के नेतृत्व में पुरातत्ववेत्ताओं के दल द्वारा अयोध्या में किए गए उत्खनन के कालावधि में मंदिरों के ऊपर बने कलश के नीचे लगाया जाने वाला गोल पत्थर मिला । यह पत्थर केवल मंदिर में ही लगाया जाता है । इसी प्रकार जलाभिषेक के पश्‍चात, मगरमच्छ के आकार की जल प्रवाहित करनेवाली प्रणाली भी मिली है ।

देश के एक प्रमुख पोर्टल समाचार से बात करते हुए डॉ. मोहम्मद ने बताया कि, इस मुद्दे को लेकर इरफान हबीब (भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष) के नेतृत्व में कार्रवाई समिति की कई बैठकें हुईं थीं ।
उन्होंने कहा कि, ‘रोमिला थापर, बिपिन चंद्रा और एस गोपाल सहित इतिहासकारोने कट्टरपंथी मुसलमान समूहों के साथ मिलकर तर्क दिया था कि, १९ वीं शताब्दी से पहले मंदिर की तोडफोड और अयोध्या में बौद्ध जैन केंद्र होने का कोई संदर्भ नहीं है । इसका इतिहासकार इरफान हबीब, आरएस शर्मा, डीएन झा, सूरज बेन और अख्तर अली ने भी समर्थन किया था ।’ इनमें से कइयों ने सरकारी बैठकों में हिस्सा लिया और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का खुला समर्थन किया ।’
पुस्तक के एक अध्याय में डॉ. मोहम्मद ने लिखा है, ‘जो कुछ भी मैंने जाना और कहा है, वह ऐतिहासिक सच है । हमे विवादित स्थल पर एक नहीं, बल्कि १४ स्तंभ मिले थे । सभी स्तंभों पर कलश खुदे थे । ये ११ वीं व १२ वीं शताब्दी के मंदिरों में पाए जानेवाले कलश के समान थे । कलश ऐसे नौ प्रतीकों में एक हैं, जो मंदिर में होते हैं । इस से कुछ मात्रा में यह भी स्पष्ट हो गया था कि, मस्जिद एक मंदिर के अवशेष पर खडी है । उन दिनों मैंने इस बारे में अंग्रेजी के कई समाचार पत्रों को लिखा था ।
उन्होंने यह भी बताया है कि, मेरे विचार को केवल एक समाचार पत्र ने प्रकाशित किया और वह भी ‘लेटर टू एडिटर कॉलम’ में ।’
हिन्दुओ, ध्यान रखें कि कोई कितने भी प्रमाण दे; परंतु हिंदुद्रोही और अल्पसंख्यक कभी भी हिन्दुआें को अयोध्या में राममंदिर नहीं बनाने देंगे । इसलिए राममंदिर का निर्माण करने हेतु संगठित हो जाएं