Monday, 10 April 2017

'योगी मॉडल’ ने क्यों बढ़ा दी हैं RBI चीफ के चेहरे पर चिंता की लकींरें

नए वित्त वर्ष की क्रेडिट पॉलिसी जारी करते हुए रिजर्व बैंक गवर्नर उर्जित पटेल ने रेपो रेट में कोई बदलाव न करते हुए साफ कर दिया है कि जारी की गई क्रेडिट पॉलिसी देश में ब्याज दरों के लिए नहीं है. उर्जित पटेल ने अपनी क्रेडिट पॉलिसी के जरिए अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी 5 बड़ी चुनौतियों का जिक्र किया. इन चुनौतियों में सबसे अहम उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी द्वारा आगे किया गया किसान कर्ज मॉडल जिसे आरबीआई गंभीर चुनौती कह रही है.

RBI क्रेडिट पॉलिसी के मुताबिक ये हैं 5 बड़ी चुनौतियां.
1. किसान कर्ज माफी से खराब होगी देश की क्रेडिट व्यवस्था
उत्तर प्रदेश सरकार की कर्ज माफी योजना से समस्या में फंसे किसानों को केवल अल्पकालीन राहत मिलेगी लेकिन इससे खराब रिण संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा और राज्य के वित्त पर असर पड़ेगा. उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार ने 2.15 करोड़ लघु एवं सीमांत किसानों को 1,00,000 रुपये तक के कृषि रिण को माफ कर दिया है. इससे राज्य के वित्त पर 307.29 अरब रुपये का बोझ आएगा. इसके अलावा सरकार को 7 लाख किसानों को 56.30 अरब रुपये के कर्ज को गैर-निष्पादित परिसंपत्ति को बट्टे खाते में डाल दिया.
2. वेतन आयोग और जीएसटी लागू होने के बाद बढ़ने वाली महंगाई को काबू करना
केन्द्रीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2017-18 की पहली मौद्रिक समीक्षा नीति पेश करते हुए कहा कि सातवें वेतन आयोग द्वारा प्रस्तावित 8-24 फीसदी हाउस रेंट अलाउंस का असर कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (महंगाई) पर पड़ेगा. आरबीआई का आकलन है कि वेतन आयोग द्वारा प्रस्तावित दरों पर भत्ते को चालू वित्त वर्ष की शुरुआत से मान्य करने के बाद ज्यादातर राज्य भी अपने कर्मचारियों को इसी दर पर भत्ता देना शुरू कर देंगे. इसके चलते वित्त वर्ष के दौरान महंगाई दर उम्मीद से 1 से 1.5 फीसदी अधिक रह सकती है.
3. अल-नीनो और कमजोर मानसून का बढ़ता डर
रिजर्व बैंक ने अपनी मौद्रिक समीक्षा में डर जाहिर किया है कि इस साल अल-नीनो की खतरा गंभीर होता दिख रहा है जिससे मानसून कमजोर रहने के आसार हैं. गौरतलब है कि 2016 में अच्छे मानसून ने कई साल से देश में खरीफ फसल में हो रहे नुकसान की भरपाई की थी. लेकिन एक बार फिर मौसम विभाग द्वारा कमजोर मानसून की भविष्यवाणी केन्द्रीय बैंक के लिए बड़ी चुनौती है.
4. क्रूड ऑयल की कीमत $60 के ऊपर जाने का खतरा, खतरनाक हो जाएगी महंगाई जाएगी
बीते 3 साल से अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल की कीमते अपने न्यूमतम स्तर पर चल रही थी. इसका सीधा असर केन्द्र सरकार के खजाने पर पड़ा और देश का राजकोषीय घाटा काबू में आ गया. लेकिन बीते कुछ महीनों में ओपेक देशों के समझौते के चलते एक बार फिर कच्चा तेल 50 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुका है. रिजर्व बैंक का आंकलन है कि अगले कुछ महीने में कच्चे तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल का स्तर पार कर लेगी तो देश में महंगाई का असर साफ तौर पर दिखने लगेगा.
5. अमेरिकी नीतियों से ग्लोबल ट्रेड पर खतरा
डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका में राष्ट्रपति पद को संभालते ही अमेरिका फर्स्ट का नारा देकर दुनियाभर के देशों के सामने कड़ी चुनौती पेश कर दी है. अभी तक अमेरिका फ्री ट्रेड और ग्लोबलाइजेशन का नेतृत्व कर रहा था और उसकी नीतियों पर दुनिया के कई देशों की आर्थिक स्थिति निर्भर थी. अब रिजर्व बैंक का अपनी मौद्रिक समीक्षा में आंकलन है कि डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का नकारात्मक असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने से गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती है.

योगी के बराबर तो काम कर पाना मुश्किल ही है - अफसरों और मंत्र‍ियों



योगी आदित्यनाथ के बिना रुके काम करने को लेकर यहां के कुछ मंत्री-अफसर परेशान नजर आ रहे हैं। हालांकि, सीएम ने सरकार बनने के बाद ही अफसरों और मंत्र‍ियों को अल्टीमेटम दे दिया था कि जो 16 से 18 घंटे तक काम कर सकता है, वो साथ चले, वरना रास्ते सबके लिए खुले हैं। 3 अप्रैल को योगी ने मंत्रियों- अफसरों के साथ मीटिंग की। डिपार्टमेंट्स की प्रेजेंटेशन देखी। मीटिंग के बाद कुछ मंत्रियों और अफसरों ने  कहा- योगी के बराबर तो काम कर पाना मुश्किल ही है।

मीटिंग में नाराज हो गए योगी…

– 4 अप्रैल को पहली कैबिनेट मीटिंग से एक दिन पहले यानी 3 अप्रैल को रात एक बजे तक योगी एनेक्सी ऑफिस में थे। ज्यादातर मंत्री भी मौजूद थे।
– योगी उस दौरान नवरात्र के व्रत पर थे। उन्होंने दो बार चाय पी। फलाहार नहीं किया। हालांकि, मौजूद मंत्रियों को फलाहार कराया।
– सीएम इस बात से खासे खफा दिखे कि कुछ कैबिनेट मंत्री मीटिंग में नहीं हैं और उन्होंने जूनियर मिनिस्टर्स को भेज दिया है। फौरन आदेश दिए- कोई भी मंत्री 20 अप्रैल तक वर्किंग डेज में ना तो छुट्टी लेगा और ना ही लखनऊ से बाहर जाएगा। 6 महीने में कौन सा मंत्री क्या करेगा, इसकी डिटेल जल्द तैयार हो जानी चाहिए।

योगी की वर्किंग स्टाइल से बढ़ी अफसरों की मुश्किलें

– योगी की चुस्ती से अफसर मुश्किल में दिख रहे हैं। जो अफसर पिछली सरकार में आराम से काम करते थे, अब सतर्क नजर आ रहे हैं। दरअसल, इन्हें डर है कि कब सीएम उनके ऑफिस पहुंच जाएं और कौन सी फाइल मांग लें?
– 3 अप्रैल की मीटिंग में भी सीएम ने कई फाइलें अचानक मंगा लीं थीं। जब कुछ फाइलें नहीं मिलीं तो योगी नाराज हो गए।

महिला मंत्रियों की दिक्कत

– 3 अप्रैल को एनेक्सी में हुई मीटिंग के दौरान दो महिला मंत्रियों के फोन लगातार बजते रहे। सूत्रों ने बताया कि इन मंत्रियों ने बात करने के लिए मीटिंग से उठकर जाने के लिए सीएम से इजाजत मांगी।
– योगी ने परमिशन तो दे दी, लेकिन साथ में ये भी कह दिया कि कितना भी जरूरी फोन क्यों ना हो, इसके बाद आप में से कोई भी बाहर नहीं जाएगा।

रोज काम की र‍िपोर्ट लेते हैं सीएम

– सूत्रों के मुताबिक, आदित्यनाथ सभी डिपार्टमेंट्स के एचओडी से रोज शाम को 6 से 8 बजे तक एक-एक कर उनके काम की रिपोर्ट लेते हैं।
– इसकी वजह से हर डिपार्टमेंट के चीफ सेक्रेटरीज हर हाल में सुबह 10 बजे तक ऑफिस पहुंच जाते हैं,और मातहतों से रिपोर्ट तलब करते हैं।

हनुमान जयंती:

चैत्र शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन साल 2017 में 11 अप्रैल को हनुमान जयंती मनाई जाएगी। इस बार हनुमान जयंती पर विशेष योग होने के कारण हनुमान भक्तों के लिए ये विशेष फलदायी रहेगी। हनुमान भक्तों के लिए हनुमान जयंती बहुत ही खास होती है इस बार हनुमान जयंती पर हनुमान जी के प्रिय वार मंगलवार के साथ पूर्णिमा तिथि और चित्रा नक्षत्र का संयोग बन रहा है।





इसके साथ ही इस दिन गजकेसरी और अमृत योग ने इस संयोग को महासंयोग में परिवर्तित कर दिया है।  ज्योतिषियों के अनुसार, इस साल हनुमान जयंती पर 120 सालों के बाद ऐसा विशेष योग बन रहा है। इस दिन मंगलवार, पूर्णिमा तिथि, चित्रा नक्षत्र रहेगा,शास्त्रों के अनुसार ये संयोग वैसा ही है जैसा त्रेता युग में हनुमान के जन्म के समय बना था।


मोदी के प्रतिद्वंद्वी नहीं सहयोगी हैं योगी

इन दिनों दो बातों को लेकर ज्यादा चर्चा है। पहला यह कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री क्यों इतनी जल्दी में हैं? दूसरा यह कि सीएम की सक्रियता से पीएम की सक्रियता की चर्चा कम हो गई है। ये दोनों ही विषय सार्थक हैं इसलिए इन पर चर्चाएं भी हो रही हैं। असल में 2019 में आम चुनाव होना है। 2014 और 2017 दोनों ही मोदी को चेहरा आगे कर लड़ा गया था। 2019 भी मोदी के ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा किन्तु तब तक योगी सरकार का कामकाज सीधे मोदी नेतृत्व को प्रभावित करेगा। यही कारण है कि मुख्यमंत्री योगी अभी पहले तो 2019 के आम चुनाव को फतेह करने के लिए लक्ष्य निर्धारित किए हुए हैं और इसके बाद 2022 के विधानसभा पर ध्यान देंगे? सच तो यह है कि योगी आदित्यनाथ स्वभाव से सक्रिय और प्रवृत्ति से योगी हैं। योगी का मतलब ही योग साधक होता है और योग का मतलब श्रीमद् भगवद्गीता में स्वयं योगेश्वर भगवान कृष्ण के अनुसार `योग कर्मसु कौशलम्' अर्थात कार्य में कुशलता ही योग है। इसका मतलब योगी का कार्य में कौशल उसका अनिवार्य गुण होता है। यदि 2019 का लक्ष्य न भी होता तो भी योगी आदित्यनाथ आज जिस तरह तन्मयतापूर्वक अपने कर्तव्यों के प्रति एकाग्र और समर्पणभाव से सक्रिय हैं वह तब भी रहता। किसी भी सरकार की सफलता की कसौटी के तीन बिन्दु होते हैंöपहला प्रभावशीलता, दूसरा गतिशीलता और तीसरा संवेदनशीलता। यदि योगी आदित्यनाथ के गतिशीलता की चर्चा करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों की तरह वे नहीं हैं। 




मायावती जब मुख्यमंत्री थीं तो महीने में कभी अपने कार्यालय जाती थीं। अपने निवास से ही शासन का संचालन करती थीं और अपनी पार्टी का नेतृत्व करती थीं। मुख्यमंत्री के तौर पर अखिलेश यादव का रिकार्ड थोड़ा बेहतर था। वे सप्ताह में दो दिन सीएम आफिस में बैठते थे। मुलायम सिंह और कल्याण सिंह तो अपने कार्यकाल में सोमवार से शनिवार तक बैठा करते थे और जब अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन चल रहा था तो मुलायम सिंह अधिकारियों के साथ रात में एक से दो बजे तक बैठकें किया करते थे किन्तु बाद के वर्षों में मायावती और अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री कार्यालय से दूरी बना ली जिसका परिणाम यह हुआ कि अफसरशाही अकर्मण्य और निरंकुश हुई तो साथ ही मंत्री और नेता भ्रष्ट और बदचलन होते गए। योगी आदित्यनाथ 16 से 18 घंटे तक सीएम आफिस में ही रहते हैं इसलिए अफसरशाही में सक्रियता आना स्वाभाविक है। कुछ जानकार वरिष्ठ अधिकारी तो यहां तक बताते हैं कि मुख्यमंत्री योगी को शासकीय प्रक्रिया का गहन ज्ञान है। पांचवीं बार लोकसभा सदस्य चुने जाने वाले योगी आदित्यनाथ को अधिकारियों के व्यवहार एवं कार्यशैली की अच्छी जानकारी है। वे हर फाइल का गंभीरता से अध्ययन करते हैं और उससे संबंधित सवाल अधिकारियों से पूछते हैं। सभी विभागों के प्रमुख सचिवों एवं सचिवों से नियमित मिलते हैं और दायित्वों का बोध कराते हैं। पूर्व सरकार की टीम से ही दो सप्ताह के अंदर योगी के नेतृत्व में सरकार ने जो छवि बनाई है वह अपने आपमें अप्रतिभ बन चुका है। दूसरी कसौटी है गतिशीलता। यदि इस दृष्टि से देखा जाए तो पूर्व मुख्यमंत्रियों के नकारेपन के कारण राज्य सरकार की कार्यशैली पंगु हो चुकी थी किन्तु योगी सरकार ने जंग लग चुकी अफसरशाही और शासकीय तंत्र को सक्रिय और गतिशील करके राज्य के अपने विरोधियों को भी यह कहने पर मजबूर कर दिया कि कुशासन के लिए अधिकारी वर्ग नहीं बल्कि सरकार का शीर्ष नेतृत्व जिम्मेदार होता है और अफसरशाही को दिशानिर्देश तथा सकारात्मक ऊर्जा भी शासकीय नेतृत्व से मिलती है। कार्यदिवस में बच्चों के साथ कम्प्यूटर पर गेम खेलने की जानकारी और पार्टी कार्यकर्ताओं के माध्यम से वसूली की बात जब अफसरशाही जान जाती है तो उसमें निक्रियता की जंग स्वत लग जाती है। सरकार की सक्रियता की तीसरा कसौटी है संवेदनशीलता। इस कसौटी पर सिर्फ दो सप्ताह के अंदर ही सरकार के कार्यनिष्पादन की समीक्षा करें तो इस बात का अहसास होता है कि मुख्यमंत्री योगी और उनके मंत्री राज्य की जनता के प्रति कितने अधिक संवेदनशील हैं। किसानों की कर्ज माफी और महिला सुरक्षा के साथ-साथ राज्य सरकार ने अन्नपूर्णा भोजनालय का फैसला कर पांच रुपए में भोजन और तीन रुपए में नाश्ता की व्यवस्था से अपनी छवि जन कल्याणकारी बनाने का जो प्रयास किया है उससे आलोचकों और विरोधियों में हलचल मच गई है। मुख्यमंत्री योगी का यह कथन सही साबित होता दिख रहा है कि `शासन तो योगी ही कर सकता है भोगी कदापि नहीं।' लक्ष्मी नारायण मोदी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट कितने दिनों पहले ही अवैध पशु वधशालाओं को बंद करने का निर्देश दे चुका था किन्तु पूर्ववर्ती सरकारों ने अपने अकर्मण्यता और वोट की चिन्ता के कारण सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया किन्तु योगी सरकार ने पिछली सरकारों के अनिर्णय संबंधी रोगों को अपने पास फटकने तक नहीं दिया और साबित कर दिया कि संवैधानिक भावनाओं के अनुरूप एक योगी भी शासकीय प्रक्रिया को कुशलतापूर्वक संचालित कर सकता है। रही बात दूसरे सवाल की कि योगी के सामने मोदी की छवि मंद पड़ गई है। सच तो यह है कि मोदी की एक प्रधानमंत्री के रूप में भूमिका एक मुख्यमंत्री की भूमिका से बिल्कुल भिन्न है। ऐसा सोचना सिर्फ धारणाओं पर निर्भर करता है। जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी पहले ही कह चुके हैं कि उत्तर प्रदेश में कार्य करने की असीम संभावनाएं हैं तो योगी जी जो भी निर्णय ले रहे हैं वह राज्य के अकर्मण्य सरकारों के कारण उत्पन्न समस्याओं का निराकरण करने से संबंधित हैं। जब गुजरात में नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री बने थे तो वे भी इसी तरह 18 घंटे काम करते थे और बिजली तथा पानी के लिए आधारभूत ढांचा के विकास के लिए दिन-रात सक्रिय रहते थे। कानून व्यवस्था की राज्य में इतनी परेशानी नहीं थी और न ही किसान इतने परेशान थे जितना कि उत्तर प्रदेश में हैं। इसलिए मोदी की सक्रियता और कार्यनिष्पादन की प्रशंसा केंद्र सरकार के स्वास्थ्य, ऊर्जा, ग्रामीण विकास, शहरी विकास एवं योजना आयोग की रिपोर्टों में लगातार की जाती रही। यही नहीं राजीव गांधी फाउंडेशन ने भी मुख्यमंत्री मोदी के कामों की तारीफ जब अपने वार्षिक रिपोर्ट में छापी तो आलोचकों से जवाब देते नहीं बनता था। बहरहाल एक योगी की सरकार तो स्वाभाविक रूप से ऐसे ही चलेगी जो सत्ता के भोग के उद्देश्य से नहीं बल्कि जन कल्याण के लिए समर्पित हैं तथा मुख्यमंत्री योगी प्रधानमंत्री मोदी के प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि सहयोगी एवं पूरक हैं और दोनों अपनी-अपनी भूमिकाओं का निर्वहन जनाकांक्षाओं एवं कल्याणकारी शासन के लिए कर रहे हैं। जो काम स्वयं मोदी नहीं कर सकते वह योगी ही कर सकते हैं इसलिए योगी प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं मोदी के बल्कि उनके सहयोगी हैं।

Sunday, 9 April 2017

विश्व को पाकिस्तान से खतरा ...!!!


First slide

इस्लामाबाद में सीआइए के पूर्व स्टेशन प्रमुख केविन हल्बर्ट ने चेतावनी दी है कि पाकिस्तान के 'विफल' होने से दुनिया के लिए परेशानी खड़ी होगी। हल्बर्ट ने खुफिया समुदाय के लिए साइफर ब्रीफ नाम की वेबसाइट पर लिखा कि पाकिस्तान एक ऐसे बैंक की तरह है जो इतना बड़ा है कि विफल नहीं होना चाहिए या इतना बड़ा है कि उसे कोई विफल नहीं होने देगा क्योंकि अगर उसे विफल होने दिया गया तो इसका विश्व की अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी असर हो सकता है। उन्होंने कहा कि हमारे पास 3.3 करोड़ की आबादी वाले अफगानिस्तान में बड़ी समस्याएं हैं, लेकिन पाकिस्तान में करीब 18.2 करोड़ नागरिक हैं जो अफगानिस्तान की आबादी का करीब पांच गुना ज्यादा हैं। गिरती अर्थव्यवस्था, वहां फैला आतंकवाद, सबसे तेजी से बढ़ता परमाणु शस्त्रागार, छठी सबसे बड़ी आबादी और विश्व में सबसे ऊंची जन्म दर वाले देशों में से एक पाकिस्तान गंभीर चिंता का विषय है।
हल्बर्ट ने कहा कि अंत में, हालांकि पाकिस्तान विश्व में सबसे खतरनाक देश नहीं है, लेकिन संभवत: यह दुनिया के लिए सबसे खतरनाक देश है। आज पाकिस्तान में काफी कुछ किया जाना बाकी है लेकिन अगर हम उसे अलग-थलग करने या प्रतिबंध लगाने की रणनीति अपनाते रहे तो इससे स्थिति और खराब हो जाएगी। उन्होंने कहा कि अमेरिका और आइएमएफ ने उसे खरबों रुपए की वित्तीय सहायता दी है तथा पाकिस्तान का साया अमेरिकी राष्ट्रपति को किसी अन्य देश के मुकाबले अधिक डरा रहा है। इसे देखते हुए हम पैसा बहा रहे हैं, उन्हें अच्छा व्यवहार करने के लिए मनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें सीमित सफलता ही मिली है लेकिन हमें ये कोशिशें जारी रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के साथ सबसे खास बात यह है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में वह एक साथ हमारा सबसे बेहतर सहयोगी और सबसे खराब सहयोगी है। हल्बर्ट ने कहा कि अफगानिस्तान में आज एकमात्र असली मकसद देश को तालिबान के हाथों में जाने से रोकना और अफगानिस्तान को आतंकवादियों के लिए पनाहगाह बनने से रोकना है जो पश्चिमी देशों के खिलाफ हमले की साजिश रच सकते हैं।
भारत के दौरे पर आए अफगानिस्तान के सांसद और अंतर्राष्ट्रीय विदेश मामलों की समिति के सदस्य नादर खान कटवाजाइ ने दक्षिण एशियाई देशों के लोकसभा अध्यक्षों के शिखर सम्मेलन में बोलते हुए कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देने का काम कर रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पाकिस्तान के विरुद्ध साउथ एशियन एसोसिएशन फॉर रीजनल को-ऑपरेशन (सार्क) देशों को एकजुट होना होगा, तभी विश्व में बढ़ते आतंकवाद की गतिविधियों पर रोक लगेगी। कटवाजाइ ने कहा कि विश्व का हर देश जानता है कि पाकिस्तान को आंतकवाद को बढ़ावा देने के लिए हथियार और आर्थिक मदद कौन कर रहा है। इस सम्मेलन में पाकिस्तान के शामिल नहीं होने के सवाल के जवाब में उन्होंने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि पाकिस्तान हमेशा बातचीत करने से बचता है, जबकि उसे सार्क देशों के इस मंच पर अपनी बात रखने का अवसर था। 
पाकिस्तान ने अपनी बिगड़ती छवि और गिरती साख को बचाने के लिए जहां आतंकी संगठन लश्करे तैय्यबा के मुखिया हाफिज सईद को आतंकवाद निरोधक कानून के तहत नजरबंद किया है। वहीं पिछले दिनों सूफी दरगाह पर हुए आत्मघाती हमले के बाद 100 से अधिक आतंकवादियों को मारा और 350 के करीब आतंकियों को गिरफ्तार भी किया है। भारत ने पाकिस्तान के हाफिज सईद को आतंकी घोषित करने के निर्णय का स्वागत करते हुए इसे पाक सरकार का सकारात्मक कदम कहा है।
तस्वीर का दूसरा पहलू यह कि पाकिस्तान ने आतंकी संगठन लश्करे तैय्यबा और हिजबुल मुजाहिदीन के माध्यम से कश्मीर घाटी में आतंक फैलाने के लिए फिर से उसको समर्थन देना शुरू कर दिया है। इन आतंकी संगठनों के माध्यम से घाटी में अशांति फैलाने के लिए 35 हजार रुपये के वेतन पर युवाओं की भर्ती शुरू कर दी है। पाकिस्तान में आतंकियों के कैंप फिर से लगने शुरु हो गए हैं।
पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका सहित दुनिया को यह दर्शाने की कोशिश कर रहा है कि वह आतंकियों विरुद्ध लड़ाई लड़ रहा है। दूसरी तरफ घाटी में आतंकियों को समर्थन व संरक्षण देकर भारत में हिंसा बढ़ाने की कोशिश भी कर रहा है। पाकिस्तान आर्थिक रूप से जहां पिछड़ रहा है, वहीं राजनीतिक दृष्टि से भी कमजोर पड़ रहा है। अपनी उपरोक्त दो कमजोरियों को छुपाने के लिए वह भारत विरुद्ध प्रचार कर आतंकियों का समर्थन भी कर रहा है। अपनी उपरोक्त दो मुंही नीति के कारण ही पाकिस्तान की साख और छवि कमजोर होती जा रही है। अगर पाक सरकार ने अपनी नाकारात्मक नीतियों को नहीं छोड़ा तो वह दिन दूर नहीं जब पाकिस्तान गृहयुद्ध के कगार पर पहुंच जाएगा।
उपरोक्त स्थिति का अंदाजा लगाते हुए ही सीआईए के पूर्व स्टेशन चीफ रहे केविन हल्र्बट पाकिस्तान को विश्व के लिए खतरा मान रहे हैं। लेकिन इस खतरे से बचने के लिए जो नीति केविन हल्बर्ट सुझा रहे हैं वह व्यवहारिक नहीं है। पाक के प्रति नर्म नीति जो अमेरिका सहित विकसित देशों ने अपनाई उसी कारण पाकिस्तान उत्पन्न हुई स्थिति का लाभ उठाता चला गया। आज नहीं तो कल पाकिस्तान के आंतरिक हालात के कारण देश के भीतर विस्फोट होने वाला है जिसके कारण विश्व के सम्मुख कई प्रकार की चुनौतियां आएंगी। पाकिस्तान सरकार को आंखें बंद कर समर्थन देने से बेहतर है, विश्व आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए अपने को तैयार करे।     
-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, उत्तम हिन्दू। 

Saturday, 8 April 2017

'मेरा रंग दे बसंती चोला'

भगत सिंह की ज़िंदगी के वे आख़िरी 12 घंटे


भगत सिंह
लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च, 1931 की शुरुआत किसी और दिन की तरह ही हुई थी. फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था कि सुबह-सुबह ज़ोर की आँधी आई थी.
लेकिन जेल के क़ैदियों को थोड़ा अजीब सा लगा जब चार बजे ही वॉर्डेन चरत सिंह ने उनसे आकर कहा कि वो अपनी-अपनी कोठरियों में चले जाएं. उन्होंने कारण नहीं बताया.
उनके मुंह से सिर्फ़ ये निकला कि आदेश ऊपर से है. अभी क़ैदी सोच ही रहे थे कि माजरा क्या है, जेल का नाई बरकत हर कमरे के सामने से फुसफुसाते हुए गुज़रा कि आज रात भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है.
उस क्षण की निश्चिंतता ने उनको झकझोर कर रख दिया. क़ैदियों ने बरकत से मनुहार की कि वो फांसी के बाद भगत सिंह की कोई भी चीज़ जैसे पेन, कंघा या घड़ी उन्हें लाकर दें ताकि वो अपने पोते-पोतियों को बता सकें कि कभी वो भी भगत सिंह के साथ जेल में बंद थे.

सॉन्डर्स मर्डर केस में जज ने इसी कलम से भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के लिए फांसी की सज़ा लिखी 

बरकत भगत सिंह की कोठरी में गया और वहाँ से उनका पेन और कंघा ले आया. सारे क़ैदियों में होड़ लग गई कि किसका उस पर अधिकार हो. आखिर में ड्रॉ निकाला गया.
अब सब क़ैदी चुप हो चले थे. उनकी निगाहें उनकी कोठरी से गुज़रने वाले रास्ते पर लगी हुई थी. भगत सिंह और उनके साथी फाँसी पर लटकाए जाने के लिए उसी रास्ते से गुज़रने वाले थे.
एक बार पहले जब भगत सिंह उसी रास्ते से ले जाए जा रहे थे तो पंजाब कांग्रेस के नेता भीमसेन सच्चर ने आवाज़ ऊँची कर उनसे पूछा था, "आप और आपके साथियों ने लाहौर कॉन्सपिरेसी केस में अपना बचाव क्यों नहीं किया."
भगत सिंह का जवाब था, "इन्कलाबियों को मरना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मज़बूत होता है, अदालत में अपील से नहीं."
वॉर्डेन चरत सिंह भगत सिंह के ख़ैरख़्वाह थे और अपनी तरफ़ से जो कुछ बन पड़ता था उनके लिए करते थे. उनकी वजह से ही लाहौर की द्वारकादास लाइब्रेरी से भगत सिंह के लिए किताबें निकल कर जेल के अंदर आ पाती थीं.
भगत सिंह को किताबें पढ़ने का इतना शौक था कि एक बार उन्होंने अपने स्कूल के साथी जयदेव कपूर को लिखा था कि वो उनके लिए कार्ल लीबनेख़ की 'मिलिट्रिज़म', लेनिन की 'लेफ़्ट विंग कम्युनिज़म' और अपटन सिनक्लेयर का उपन्यास 'द स्पाई' कुलबीर के ज़रिए भिजवा दें.
भगत सिंह जेल की कठिन ज़िंदगी के आदी हो चले थे. उनकी कोठरी नंबर 14 का फ़र्श पक्का नहीं था. उस पर घास उगी हुई थी. कोठरी में बस इतनी ही जगह थी कि उनका पाँच फिट, दस इंच का शरीर बमुश्किल उसमें लेट पाए.
भगत सिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे. मेहता ने बाद में लिखा कि भगत सिंह अपनी छोटी सी कोठरी में पिंजड़े में बंद शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे.
उन्होंने मुस्करा कर मेहता को स्वागत किया और पूछा कि आप मेरी किताब 'रिवॉल्युशनरी लेनिन' लाए या नहीं? जब मेहता ने उन्हे किताब दी तो वो उसे उसी समय पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज़्यादा समय न बचा हो.
मेहता ने उनसे पूछा कि क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहेंगे? भगत सिंह ने किताब से अपना मुंह हटाए बग़ैर कहा, "सिर्फ़ दो संदेश... साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और 'इंक़लाब ज़िदाबाद!"
इसके बाद भगत सिंह ने मेहता से कहा कि वो पंडित नेहरू और सुभाष बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचा दें, जिन्होंने मेरे केस में गहरी रुचि ली थी. भगत सिंह से मिलने के बाद मेहता राजगुरु से मिलने उनकी कोठरी पहुंचे.
राजगुरु के अंतिम शब्द थे, "हम लोग जल्द मिलेंगे." सुखदेव ने मेहता को याद दिलाया कि वो उनकी मौत के बाद जेलर से वो कैरम बोर्ड ले लें जो उन्होंने उन्हें कुछ महीने पहले दिया था.
मेहता के जाने के थोड़ी देर बाद जेल अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों को बता दिया कि उनको वक़्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दी जा रही है. अगले दिन सुबह छह बजे की बजाय उन्हें उसी शाम सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा.
भगत सिंह मेहता द्वारा दी गई किताब के कुछ पन्ने ही पढ़ पाए थे. उनके मुंह से निकला, "क्या आप मुझे इस किताब का एक अध्याय भी ख़त्म नहीं करने देंगे?"
भगत सिंह ने जेल के मुस्लिम सफ़ाई कर्मचारी बेबे से अनुरोध किया था कि वो उनके लिए उनको फांसी दिए जाने से एक दिन पहले शाम को अपने घर से खाना लाएं.
लेकिन बेबे भगत सिंह की ये इच्छा पूरी नहीं कर सके, क्योंकि भगत सिंह को बारह घंटे पहले फांसी देने का फ़ैसला ले लिया गया और बेबे जेल के गेट के अंदर ही नहीं घुस पाया.
थोड़ी देर बाद तीनों क्रांतिकारियों को फांसी की तैयारी के लिए उनकी कोठरियों से बाहर निकाला गया. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपने हाथ जोड़े और अपना प्रिय आज़ादी गीत गाने लगे-
कभी वो दिन भी आएगा
कि जब आज़ाद हम होंगें
ये अपनी ही ज़मीं होगी
ये अपना आसमाँ होगा.
फिर इन तीनों का एक-एक करके वज़न लिया गया. सब के वज़न बढ़ गए थे. इन सबसे कहा गया कि अपना आखिरी स्नान करें. फिर उनको काले कपड़े पहनाए गए. लेकिन उनके चेहरे खुले रहने दिए गए.

भगत सिंह
भगत सिंह की भूख हड़ताल का पोस्टर जिस पर उनके ही नारे छपे हैं. पोस्टर नेशनल आर्ट प्रेस, अनारकली, लाहौर ने प्रिंट किया था

चरत सिंह ने भगत सिंह के कान में फुसफुसा कर कहा कि वाहे गुरु को याद करो.
भगत सिंह बोले, "पूरी ज़िदगी मैंने ईश्वर को याद नहीं किया. असल में मैंने कई बार ग़रीबों के क्लेश के लिए ईश्वर को कोसा भी है. अगर मैं अब उनसे माफ़ी मांगू तो वो कहेंगे कि इससे बड़ा डरपोक कोई नहीं है. इसका अंत नज़दीक आ रहा है. इसलिए ये माफ़ी मांगने आया है."
जैसे ही जेल की घड़ी ने 6 बजाय, क़ैदियों ने दूर से आती कुछ पदचापें सुनीं. उनके साथ भारी बूटों के ज़मीन पर पड़ने की आवाज़े भी आ रही थीं. साथ में एक गाने का भी दबा स्वर सुनाई दे रहा था, "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है..."
सभी को अचानक ज़ोर-ज़ोर से 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' और 'हिंदुस्तान आज़ाद हो' के नारे सुनाई देने लगे. फांसी का तख़्ता पुराना था लेकिन फांसी देने वाला काफ़ी तंदुरुस्त. फांसी देने के लिए मसीह जल्लाद को लाहौर के पास शाहदरा से बुलवाया गया था.
भगत सिंह इन तीनों के बीच में खड़े थे. भगत सिंह अपनी माँ को दिया गया वो वचन पूरा करना चाहते थे कि वो फाँसी के तख़्ते से 'इंक़लाब ज़िदाबाद' का नारा लगाएंगे.
लाहौर ज़िला कांग्रेस के सचिव पिंडी दास सोंधी का घर लाहौर सेंट्रल जेल से बिल्कुल लगा हुआ था. भगत सिंह ने इतनी ज़ोर से 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का नारा लगाया कि उनकी आवाज़ सोंधी के घर तक सुनाई दी.
उनकी आवाज़ सुनते ही जेल के दूसरे क़ैदी भी नारे लगाने लगे. तीनों युवा क्रांतिकारियों के गले में फांसी की रस्सी डाल दी गई. उनके हाथ और पैर बांध दिए गए. तभी जल्लाद ने पूछा, सबसे पहले कौन जाएगा?
सुखदेव ने सबसे पहले फांसी पर लटकने की हामी भरी. जल्लाद ने एक-एक कर रस्सी खींची और उनके पैरों के नीचे लगे तख़्तों को पैर मार कर हटा दिया. काफी देर तक उनके शव तख़्तों से लटकते रहे.
अंत में उन्हें नीचे उतारा गया और वहाँ मौजूद डॉक्टरों लेफ़्टिनेंट कर्नल जेजे नेल्सन और लेफ़्टिनेंट कर्नल एनएस सोधी ने उन्हें मृत घोषित किया.
एक जेल अधिकारी पर इस फांसी का इतना असर हुआ कि जब उससे कहा गया कि वो मृतकों की पहचान करें तो उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया. उसे उसी जगह पर निलंबित कर दिया गया. एक जूनियर अफ़सर ने ये काम अंजाम दिया.
पहले योजना थी कि इन सबका अंतिम संस्कार जेल के अंदर ही किया जाएगा, लेकिन फिर ये विचार त्यागना पड़ा जब अधिकारियों को आभास हुआ कि जेल से धुआँ उठते देख बाहर खड़ी भीड़ जेल पर हमला कर सकती है.
इसलिए जेल की पिछली दीवार तोड़ी गई. उसी रास्ते से एक ट्रक जेल के अंदर लाया गया और उस पर बहुत अपमानजनक तरीके से उन शवों को एक सामान की तरह डाल दिया गया.
पहले तय हुआ था कि उनका अंतिम संस्कार रावी के तट पर किया जाएगा, लेकिन रावी में पानी बहुत ही कम था, इसलिए सतलज के किनारे शवों को जलाने का फैसला लिया गया.
उनके पार्थिव शरीर को फ़िरोज़पुर के पास सतलज के किनारे लाया गया. तब तक रात के 10 बज चुके थे. इस बीच उप पुलिस अधीक्षक कसूर सुदर्शन सिंह कसूर गाँव से एक पुजारी जगदीश अचरज को बुला लाए.
अभी उनमें आग लगाई ही गई थी कि लोगों को इसके बारे में पता चल गया. जैसे ही ब्रितानी सैनिकों ने लोगों को अपनी तरफ़ आते देखा, वो शवों को वहीं छोड़ कर अपने वाहनों की तरफ़ भागे. सारी रात गाँव के लोगों ने उन शवों के चारों ओर पहरा दिया.
अगले दिन दोपहर के आसपास ज़िला मैजिस्ट्रेट के दस्तख़त के साथ लाहौर के कई इलाकों में नोटिस चिपकाए गए जिसमें बताया गया कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का सतलज के किनारे हिंदू और सिख रीति से अंतिम संस्कार कर दिया गया.
इस ख़बर पर लोगों की कड़ी प्रतिक्रिया आई और लोगों ने कहा कि इनका अंतिम संस्कार करना तो दूर, उन्हें पूरी तरह जलाया भी नहीं गया. ज़िला मैजिस्ट्रेट ने इसका खंडन किया लेकिन किसी ने उस पर विश्वास नहीं किया.
इस तीनों के सम्मान में तीन मील लंबा शोक जुलूस नीला गुंबद से शुरू हुआ. पुरुषों ने विरोधस्वरूप अपनी बाहों पर काली पट्टियाँ बांध रखी थीं और महिलाओं ने काली साड़ियाँ पहन रखी थीं.
लगभग सब लोगों के हाथ में काले झंडे थे. लाहौर के मॉल से गुज़रता हुआ जुलूस अनारकली बाज़ार के बीचोबीच रूका.
अचानक पूरी भीड़ में उस समय सन्नाटा छा गया जब घोषणा की गई कि भगत सिंह का परिवार तीनों शहीदों के बचे हुए अवशेषों के साथ फिरोज़पुर से वहाँ पहुंच गया है.
जैसे ही तीन फूलों से ढ़के ताबूतों में उनके शव वहाँ पहुंचे, भीड़ भावुक हो गई. लोग अपने आँसू नहीं रोक पाए.
वहीं पर एक मशहूर अख़बार के संपादक मौलाना ज़फ़र अली ने एक नज़्म पढ़ी जिसका लब्बोलुआब था, 'किस तरह इन शहीदों के अधजले शवों को खुले आसमान के नीचे ज़मीन पर छोड़ दिया गया.'
उधर, वॉर्डेन चरत सिंह सुस्त क़दमों से अपने कमरे में पहुंचे और फूट-फूट कर रोने लगे. अपने 30 साल के करियर में उन्होंने सैकड़ों फांसियां देखी थीं, लेकिन किसी ने मौत को इतनी बहादुरी से गले नहीं लगाया था जितना भगत सिंह और उनके दो कॉमरेडों ने.
किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि 16 साल बाद उनकी शहादत भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अंत का एक कारण साबित होगी और भारत की ज़मीन से सभी ब्रिटिश सैनिक हमेशा के लिए चले जाएंगे.
(ये लेख मालविंदर सिंह वड़ाइच की किताब 'इटर्नल रेबल', चमनलाल की 'भगत सिंह डॉक्यूमेंट्स' और कुलदीप नैयर की किताब 'विदाउट फियरमें प्रकाशित सामाग्री पर आधारित है.)

अमरीका पहले विश्व युद्ध के लिए मजबूर क्यों हुआ था ?

वूड्रो विल्सन

अमरीका पहले विश्व युद्ध में 6 अप्रैल 1917 को शामिल हुआ, लेकिन युद्ध का रास्ता दो महीने पहले तय हो चुका था. तब जर्मन सरकार ने ब्रिटिश द्वीपों के चारों ओर तटीय जल पर ग़ैर-प्रतिबंधित पनडुब्बी हमलों की युद्ध नीति को फिर से शुरू करने का निर्णय लिया था.
दूसरे शब्दों में कहें तो वो समुद्रमार्ग से गुज़रने वाले हर जहाज़ पर हमला करने की नीति पर लौट आने वाले थे जिसमें अमरीकी जहाज़ भी शामिल थे.

प्रथम विश्व युद्ध: पहली चिंगारी- आर्चड्यूक की हत्या-1
प्रथम विश्व युद्ध: पहली चिंगारी - आर्चड्यूक की हत्या-2

विल्सम की चुनावी अभियान गाड़ी

तटस्थ रहने की अमरीकी नीति

अमरीका के राष्ट्रपति वूड्रो विल्सन विपक्ष के घोर विरोध के बावजूद ढाई साल तक अपने देश को यूरोपीय संघर्ष से दूर रखने के लिए नाज़ुक राजनीतिक संतुलन बनाए रखने में कामयाब रहे थे.
विल्सन एक धीर गंभीर बुद्धिजीवी थे, वो प्रेस्बिटेरियन स्कॉट के वशंज थे. अमरीकी गृहयुद्ध के दौरान उनके बचपन के अनुभव बेहद कड़वे थे, यही वजह थी कि वो देश को 1914 में शुरू हुए यूरोपीय संघर्ष से दूर रखना चाहते थे.
ये एक ऐसी लड़ाई थी जिसका असर और मक़सद उन्होंने देखा था. उनके विचार में इसमें हिस्सा लेने से अमरीकी विदेश नीति को कोई फ़ायदा नहीं था.
तटस्थ रहना विल्सन का आदर्श वाक्य था, और इसी धुरी के आधार पर वो यूरोपीय देशों से व्यवहार कर रहे थे.
अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति थियोडेर रूजवेल्ट समेत कई आलोचकों की नज़र में वो ''सोच और कार्यवाही'' दोनों में तटस्थ बन गए थे.
प्रथम विश्व युद्ध: पहली चिंगारी - आर्चड्यूक की हत्या-3
प्रथम विश्वयुद्धः जांबाज़ नर्सों के नाम कई लड़ाईयां

डूबता हुआ ब्रितानी जहाज़

''ये हमें युद्ध से दूर रखेगा''
बेहद उकासावे के माहौल के बावजूद युद्ध के शुरुआती सालों में विल्सन अपनी तटस्थता की नीति पर क़ायम रहे.
इसका सबसे बड़ा उदाहरण मई 1915 में देखा गया, जब दक्षिणी आयरलैंड के तट पर एक जर्मन पनडुब्बी ने आरएमएस ल्यूसतानिया नाम के ब्रिटिश यात्री जहाज को नष्ट कर दिया था. इसमें लगभग 1,200 लोग मारे गए थे, जिनमें 128 अमरीकी शामिल थे.
सितंबर 1915 में मामले में हस्तक्षेप के लिए आंतरिक विरोध बढ़ रहा था, जब विल्सन ने जर्मनी को आदेश दिया कि बिना चेतावनी के जहाज़ों को ना डुबाया जाए.
इस तरह से विल्सन ने सावधानी के साथ सतर्कता बरकरार रखी. यहां तक कि उसके बाद वाले सालों में भी उनके चुनावी अभियान का यही नारा था ''उन्होंने हमें यु्द्ध से बाहर रखा.''
मुश्किल से ही सही लेकिन वो चुनाव जीते.
31 जनवरी 1917 में जब यूरोप में संघर्ष ख़त्म हुआ तब उन्होंने सीनेट में एक भाषण के दौरान क़ानूनविदों से दोनों देशों के बीच ''शांति की नींव'' बनाए रखने के लिए मदद की अपील की थी.
लेकिन विल्सन को अचानक अपने विचार बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा.

प्रथम विश्व युद्ध के सैनिक

वो एक चिट्ठी और एक टेलीग्राम
सीनेट में अपने भाषण के एक हफ़्ते बाद वॉशिंगटन डीसी में जर्मनी के राजदूत योहेन हैनरिक फॉन बर्नस्ट्रॉफ ने अमरीका के विदेश मंत्री रॉबर्ट लेंसिंग को बुलाया.
फॉन बर्नस्ट्रॉफ के पास एक चिट्ठी थी जिसमें जर्मनी ने समुद्री रास्ते में पनडुब्बी हमले की अपनी नीति को बहाल करने की घोषणा की थी.
बस यहीं से अमरीका के युद्ध में शमिल होने की उलटी गिनती शुरू हुई.
पहला कूटनीतिक संबध टूट गया था. अगला निशाना था वो बीच का बिंदु जिसे विल्सन ''सशस्त्र तटस्थता'' कहते थे. क्योंकि बात यहीं ख़त्म नहीं हुई.
जर्मनी के विदेश मामलों के मंत्री आर्थर सिमरमन की ओर से एक टेलीग्राम मेक्सिको भेजा गया था जो प्रेस में लीक हो गया था और लोगों के आक्रोश की वजह बन गया था.
जर्मनी दूतावास के ज़रिए मेक्सिको को सिमरमन ने एक प्रस्ताव दिया था जिसमें साफ संदेश लिखा था ''चलो एकसाथ मिलकर युद्ध करते हैं, चलो एकसाथ मिलकर शांति बनाते हैं.''
दरअसल इसके ज़रिए जर्मनी ने मेक्सिको को अमरीका के ख़िलाफ़ युद्ध में शामिल होने के लिए आर्थिक मदद की पेशकश की थी और टेक्सस, एरीज़ोना और न्यू मेक्सिको की सरहदों को दोबारा वापस पाने के लिए कहा था, जिन्हें 19वीं सदी में ताक़तवर उत्तर के पड़ोसियों ने जीत लिया था.
क्योंकि ब्रितानी सरकार ने अमरीका को चेतावनी देने वाला टेलीग्राम बीच में ही रोक दिया था तो कुछ लोगों को लगा कि ये संदेश मित्र राष्ट्रों ने विल्सन के तटस्थ रहने के क़दम को ख़त्म करने के लिए दिया गया है.
हालांकि 29 मार्च को सिमरमन ने एक भाषण के दौरान कहा था कि वो इस मामले में अपनी भागीदारी स्वीकारते हैं और अमरीका के ''शत्रुता भरे व्यवहार'' को देखते हुए ये न्यायोचित भी है.

प्रथम विश्व युद्ध के सैनिक


एक ''अनिवार्य'' क़दम
2 अप्रैल को विल्सन ने संसद से कहा कि वो एक बेहद गंभीर और दुखद क़दम उठा रहे हैं, उन्होंने संसद से कहा वो जर्मनी की इस कार्रवाई को अमरीकी सरकार और जनता के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा को तौर पर लें.
सशस्त्र तटस्थता बेअसर साबित हो चुकी थी, क्योंकि इसके चलते जर्मन पनडुब्बी हमलों से जहाज़ों की रक्षा के लिए तैनाती असंभव थी.
विल्सन ने कहा ''हम जर्मनी के लोगों के ख़िलाफ़ नहीं हैं. उनके लिए हमारे मन में सिर्फ़ सहानुभूति और मित्रता का भाव है. लोकतंत्र के वजूद के लिए दुनिया को सुरक्षित होना होगा.''
तब 16 अप्रैल 1917 को राष्ट्रपति ने आधिकारिक बयान पर हस्ताक्षर किए थे. इसी के साथ अमरीका पहले विश्व युद्ध में शामिल हो गया था.
पेट्रिक ग्रेगरी ''एन अमेरिकन ऑन द वेस्टर्न फ्रंट: द फर्स्ट वर्ल्ड वॉर लेटर्स ऑफ आर्थर क्लिफर्ड 1917-18'' किताब के सह लेखक हैं, जो 2016 में द हिस्ट्री प्रेस ने प्रकाशित की थी.

Friday, 7 April 2017

क्या बाल सुधार गृह को ‘बाल बिगाड़ गृह’ कहना ज्यादा सही है ?

बच्चों की सुरक्षा और बेहतरी के लिए बनाए गए ‘बाल सुधार गृहों’ में बच्चों को घोर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है. छोटी उम्र में मिली इस प्रताड़ना के दंश से ज्यादातर बच्चे जीवन भर नहीं निकल पाते. जानकार बताते हैं कि कई मामलों में यही बच्चे बड़े होकर खूंखार अपराधियों में तब्दील हो जाते हैं


observation homesweb


रमेश, विनय और सुशील (बदले हुए नाम) देश की राजधानी दिल्ली के दक्षिणपुरी इलाके की एक झुग्गी बस्ती में रहते हैं. दो अगस्त, 2012 की रात ये तीनों दोस्त अपने घर लौट रहे थे कि रास्ते में एक टेंट मालिक से उनका झगड़ा हो गया. एक मोटरसाइकिल के जमीन पर गिरने की वजह से शुरू हुए इस छोटे-से झगड़े के बाद तीनों को हत्या के प्रयास के आरोप में हिरासत में ले लिया गया. तब विनय और रमेश की उम्र मात्र 15 वर्ष थी जबकि सुशील 16 साल का था. नाबालिग होने की वजह से उन्हें सुनवाई के दौरान दिल्ली के बाल सुधार गृहों में भेज दिया गया. लेकिन जाने-अनजाने आपराधिक दुश्चक्र में फंस जाने वाले बच्चों के सुधार और पुनर्वास के उद्देश्य से स्थापित किए गए इन सुधार गृहों में इन तीनों को शारीरिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा. बच्चों का आरोप है कि सेवा कुटीर स्थित किंग्सवे कैंप सुधार गृह में उनके इलाज के लिए आने वाले चिकित्सा कर्मचारी उनके कपड़े उतरवाकर उनकी पिटाई किया करते थे. अदालती कार्यवाही के दौरान दर्ज करवाए गए अपने बयानों में बच्चों ने साफ कहा है कि इलाज के दौरान सहबंदियों और मेडिकल स्टाफ के अन्य सदस्यों के सामने  उनके कपड़े उतरवाए जाते थे और उन्हें घुटनों के बल झुकाकर डंडों से बुरी तरह पीटा जाता था.
लेकिन दिल्ली के बाल सुधार गृहों में बच्चों के उत्पीड़न का यह पहला मामला नहीं है. पीड़ित बच्चों से बातचीत करने और हालिया अदालती निर्णयों की पड़ताल करने पर यह साफ हो जाता है कि बच्चों की सुरक्षा और बेहतरी के लिए बनाए गए इन ‘बाल सुधार गृहों’ में बच्चों को घोर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है. छोटी उम्र में मिली इस प्रताड़ना के दंश से ज्यादातर बच्चे जीवन भर नहीं निकल पाते. जानकार बताते हैं कि कई मामलों में यही बच्चे बड़े होकर खूंखार अपराधियों में तब्दील हो जाते हैं.
रमेश, विनय और सुशील के अलावा दो अन्य बच्चों ने भी अलग-अलग मामलों में किंग्सवे कैंप के मेडिकल स्टाफ द्वारा प्रताड़ित किए जाने की शिकायत दर्ज करवाई थी. इन पांचों बच्चों के बयानों को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजेबी) के सामने लाकर संबंधित मेडिकल ऑफिसर डॉ बीएन शर्मा और पुरुष नर्स प्रदीप के खिलाफ केस दायर करने वाले किशोर मामलों के अधिवक्ता भूपेश समद कहते हैं, ‘बाल सुधार गृहों में माहौल बहुत खराब है. यहां रहने वाले बच्चों को अक्सर शारीरिक और मानसिक हिंसा का सामना करना पड़ता है. हम भी कुछ ही मामलों में मदद के लिए पहुंच पाते हैं क्योंकि ज्यादातर मामलों में हमें पता ही बहुत देर से चलता है. जब बच्चे हमें बताते हैं तभी हम कुछ कर सकते हैं. लेकिन कुछ ही बच्चे यह हिम्मत जुटा पाते हैं. कई बच्चे प्रशासन के डर की वजह से चुप रह जाते हैं.’ समद बताते हैं कि इस मामले में बोर्ड ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए बच्चों के बयानों का संज्ञान लिया और संबंधित मेडिकल स्टाफ को निलंबित करके उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया.
छोटी उम्र में मिली इस प्रताड़ना के दंश से ज्यादातर बच्चे जीवन भर नहीं निकल पाते. कई मामलों में यही बच्चे बड़े होकर खूंखार अपराधी बन जाते हैं
रमेश, विनय और सुशील दक्षिणपुरी की एक ही झुग्गी बस्ती में रहते हैं और फिलहाल जमानत पर हैं. दक्षिणपुरी के इस भीड़-भाड़ वाले इलाके में थोड़ी मेहनत के बाद हमें इन बच्चों के घर मिल जाते हैं. किंग्सवे कैंप के बाल सुधार गृह में बिताए गए अपने समय के बारे में पूछते ही बच्चे घबरा जाते हैं. वे चारों तरफ खड़े अपने घरवालों की ओर देखने लगते हैं. कुछ देर की सामान्य बातचीत के बाद वे थोड़े सहज होते हैं और फिर बताते हैं कि सुधार गृह में उन्हें पीटा जाता था. विनय कहता है, ‘मैं इलाज के लिए सेवा कुटीर में मौजूद डाक्टर के पास गया तो वहां प्रदीप नाम का एक आदमी था. उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं नशा करता हूं. मैंने मना कर दिया तो उसने मेरे खूब थप्पड़ मारे और फिर से वही पूछा. मैंने फिर वही कहा तो उसने मेरे पैरों में डंडों से मारा. फिर उसने मुझे वापस भेज दिया. फिर छह अगस्त को डाक्टर ने मुझे बुलाया और परदे के पीछे जाने के लिए कहा. वहां प्रदीप पहले से खड़ा था. डाक्टर ने मुझे कपड़े उतारने के लिए कहा और पूछा कि मैं क्या नशा करता हूं. मैंने कुछ नहीं कहा तो उसने मुझे कहा कि घुटनों के बल झुक जा. फिर उसने मेरी पीठ पर पूरी ताकत से मारना शुरू किया और मैं रोने लगा.’ रमेश और सुशील ने भी इसी तरह सुधार गृह में हुई अपनी पिटाई की बात स्वीकार की. अदालती कार्यवाही के दौरान जेजेबी के सामने रिकॉर्ड करवाए गए अपने बयान में रमेश ने कहा है, ‘छह सितंबर, 2012 की दोपहर डॉक्टर प्रदीप ने मुझे इलाज के लिए बुलाया. तब वहां एक और डाक्टर मौजूद था और साथ में मेरे साथ के दूसरे बच्चे भी खड़े थे. डाक्टर प्रदीप ने मुझसे कपड़े उतार कर अपने हाथों से अपने पैरों के अंगूठे छूने के लिए कहा और मैंने वैसा ही किया. फिर उन्होंने मुझे पूछा कि मैं कौन-सा नशा करता हूं. मैंने मना कर दिया. फिर दूसरे डाक्टर ने मुझे थप्पड़ मारे और बाहर निकल जाने को कहा.’
juvenile-justice
सूत्र बताते हैं कि डॉक्टरों द्वारा बच्चों से उनकी नशे की आदतों के बारे में लगातार पूछताछ करने के पीछे एक उदेश्य उनकी जिम्मेदारी के झंझट से छुटकारा पाना भी होता है. प्रयास सुधार गृह के एक कर्मचारी बताते हैं, ‘दरअसल सुधार गृह में बच्चों की बढ़ती हुई संख्या की वजह से लोग उन्हें यहां से नशा मुक्ति केंद्र भेजना चाहते हैं. इसलिए भी बच्चों पर नशा करने की आदत को स्वीकार करने के लिए लगातार दबाव बनाया जाता है.’
‘तहलका’ के पास मामले से संबंधित सभी कानूनी दस्तावेजों की प्रतियां मौजूद हैं. इस मामले को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली बाल अधिकार कार्यकर्ता मीना कबीर बताती हैं कि जिन मामलों में विभागीय कर्मचारी शामिल होते हैं उन्हें सामने लाने में थोड़ी मुश्किल तो होती है लेकिन ऐसा करना बहुत जरूरी है. ‘तहलका’ से बातचीत में वे कहती हैं, ‘यह हमारा कर्तव्य है कि अगर कोई बच्चा कोई शिकायत कर रहा है तो हम उसे बोर्ड के सामने रखें. जब तक बच्चा बाल सुधार गृह में है तब तक उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी बोर्ड की है. यह शिकायतें सही हैं या गलत इसका फैसला तफ्तीश के बाद होगा, लेकिन पहले इनका दर्ज होना जरूरी है.’
सुशील की कहानी भी कमोबेश रमेश और विनय जैसी ही है. पांच अगस्त, 2012 को सुशील के हाथ-पैरों में दर्द हो रहा था. वह इलाज के लिए गया तो चिकित्सीय सहयोगी प्रदीप ने उससे पूछा कि वह कौन-सा नशा करता है. उसके इनकार करने पर प्रदीप ने उसे घुटनों पर झुकाकर उसकी पिटाई की. बोर्ड के सामने दिए गए अपने बयान में सुशील आगे जोड़ता है, ‘फिर लंच के बाद प्रदीप ने मुझे फिर बुलाया. वहां पर एक और बूढ़ा डाक्टर था जिसके बाल सफेद थे. उसने मुझसे कपड़े उतारने के लिए कहा और फिर पूछा कि मैं कौन-सा नशा करता हूं. मेरे मना करने पर उसने मुझे झुकाकर मारना शुरू कर दिया. प्रदीप ने भी मुझे डंडों से पीटा. मैं और कुछ नहीं कहना चाहता.’
‘सामान्य तौर पर बच्चों के सुधार और पुनर्वास के लिए बने सुधार गृह कुप्रबंधन और सरकारी उपेक्षा के चलते बच्चों के लिए बहुत ही क्रूर अनुभव साबित होते हैं’ उधर, चिकित्सीय सहयोगी प्रदीप ने बोर्ड के सामने यह तो स्वीकार किया कि वह बच्चों के परीक्षण के समय चिकित्सीय कक्ष में मौजूद रहता था लेकिन उसका कहना है कि बच्चों से कभी अन्य लोगों के सामने कपड़े उतारने के लिए नहीं कहा गया. गौरतलब है कि बोर्ड के कड़े निर्देशों के बाद मुखर्जी नगर थाने में आरोपित डॉक्टर और चिकित्सीय सहायक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 323 और किशोर बाल अधिनियम की धारा 23 के तहत मामला दर्ज कर कर लिया गया है.  तहलका से बातचीत में आरोपित डॉक्टर बीएन शर्मा सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं, ‘बच्चों को यह शिकायत करने के लिए उकसाया जाता है. यह मेरा काम है कि मैं उनकी पूरी तरह से जांच करूं और मैं वही करता था. मैं पिछले 10 साल से यहां इलाज करता हूं और मैंने किसी बच्चे को नहीं मारा. मेरे रिटायरमेंट में अब सिर्फ एक साल बचा है, मैं यह सब क्यों करूंगा?’
लेकिन 30 अक्टूबर, 2012 को किंग्सवे कैंपस स्थित जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड-1 की प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट सुनयना शर्मा ने तीन अलग-अलग मामलों में दर्ज किए गए पांच बच्चों के बयानों के आधार पर अपने निर्देश जारी करते हुए कहा, ‘…अन्य लोगों के सामने बच्चों से कपड़े उतारने के लिए कहना और उन्हें झुकाकर मारना किशोर बाल अधिनियम ने तहत बच्चे की निजता और गरिमा का हनन है. कानून के मुताबिक बच्चों को एक सकारात्मक जांच का पूरा अधिकार है. बोर्ड के पास तीन अलग मामलों में पांच अलग-अलग बच्चों की एक जैसी शिकायतों पर विश्वास नहीं करने का कोई कारण नहीं है’ लेकिन दिल्ली के बाल सुधार गृहों में लंबे समय तक जेल अधीक्षक रहे एक वरिष्ठ अधिकारी नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर तहलका को बताते हैं कि बाल सुधार गृहों में बच्चों के साथ होने वाली बदसलूकी के कई दूसरे कारण भी हैं. वे कहते हैं, ‘यहां आने वाले लगभग 95 प्रतिशत बच्चे तो थोड़ी कोशिशों के बाद मुख्यधारा की तरफ मुड़ जाते हैं लेकिन जो पांच प्रतिशत बचते हैं वे बहुत परेशान कर देते हैं. ड्रग्स और धारदार हथियारों का प्रवेश अंदर रोकने के लिए हमें कई बार सख्ती करनी पड़ती है. बच्चे नशा मुक्ति केंद्र जाने के डर से कई बार डाक्टर को अपने नशे की आदतों के बारे में ठीक से नहीं बताते. हो सकता है इसलिए डाक्टर ने थोड़ी सख्ती की हो, यह सब तो यहां चलता रहता है. और जहां तक सुधार गृह में बच्चों के साथ होने वाली बदसलूकी का सवाल है, तो वह तो होता ही है. हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों के आरोपी भी पॉकेट मारने वाले किसी छोटे-से बच्चे के साथ एक ही हॉल में रहते हंै. ऐसे माहौल में छोटे बच्चों के हिंसा का शिकार होने और आगे जाकर बड़े अपराधी में तब्दील होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.’
दिल्ली के बाल सुधार गृहों में बच्चों पर अपनी उम्र से बड़े बच्चों के साथ-साथ प्रशासन के हाथों होने वाली हिंसा के ये मामले नए नहीं हैं. पिछले पांच साल के दौरान बड़े बच्चों द्वारा छोटे बच्चों और सुधार गृह के कर्मचारियों द्वारा बच्चों के शोषण से जुड़े कई बडे़ मामले सामने आए. बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था बचपन बचाओ आंदोलन द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी बताती है कि 2006 से 2010 के बीच कुल 1,800 बच्चे दिल्ली के अलग-अलग सुधार गृहों और आश्रय गृहों से भाग गए. किशोरों के न्यायिक मामलों से लंबे समय से जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ता अनंत अस्थाना इस संदर्भ में 28 अगस्त, 2010 को किंग्सवे कैंप स्थित जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड-1 में प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट अनुराधा शुक्ला भारद्वाज द्वारा दिए गए एक ऐतिहासिक निर्णय का हवाला देते हुए कहते हैं, ‘बाल सुधार गृहों में दी जाने वाली सुविधाओं की वास्तविकता हमारे कानून में सजे सुंदर और मनोरम चित्र से बहुत अलग है. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो सामान्य तौर पर बच्चों के सुधार और पुनर्वास के लिए बने सुधार गृह कुप्रबंधन और सरकारी उपेक्षा के चलते बच्चों के लिए बहुत ही क्रूर अनुभव साबित होते हैं.’
अगस्त, 2010 में दीपेश (बदला हुआ नाम) नामक एक किशोर के साथ तत्कालीन जेल अधीक्षक द्वारा किए गए शारीरिक उत्पीड़न के मामले में जांच और कानूनी कार्यवाही के आदेश देते हुए जेजेबी ने कहा था, ‘…बच्चे को सुधार गृह प्रशासन द्वारा हिंसा का शिकार होना पड़ा और उसे बोर्ड के सामने चुप रहने के लिए डराया भी गया. उस छोटे बच्चे के लिए अपने साथ हुई इस हिंसा से उबर पाना बहुत मुश्किल होगा. बोर्ड को इस बात पर शर्मिंदगी महसूस होती है कि वह बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सका. हम इस बात के लिए खुद को दोषी भी मानते हैं कि हमने बच्चे के उस विश्वास को ठेस पहुंचाई जो उसने सुधार गृह में आते वक्त हम पर दिखाया था. यह याद रखना बहुत जरूरी है कि बच्चों को सुधार गृहों में सजा देने के लिए नहीं, बल्कि उनके हित में, उनके सुधार के लिए लाया जाता है.’
लेकिन हिंसा का यह सिलसिला सिर्फ सुधार गृहों के प्रशासन तक सीमित नहीं है. बाल सुधार गृहों में रहने वाले बड़ी उम्र के बच्चे भी छोटे बच्चों के साथ हिंसा पर उतारू हो जाते हैं. दिल्ली गेट स्थित प्रयास नामक बाल सुधार गृह में लंबे समय से कार्यरत एक कर्मचारी नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर ‘तहलका’ को बताते हैं, ‘यह पूरी तरह से बाल बिगाड़ गृह है. बच्चे छोटे होते हैं तो उन्हें मालूम नहीं होता कि वे कोई अपराध कर रहे हैं. ऐसे ही अगर कोई छोटा बच्चा पॉकेट मारने या किसी छोटे-मोटे लड़ाई-झगड़े में फंसकर यहां आ जाता है तो यह पक्की बात है कि वह यहां से एक बड़ा अपराधी बनने की पूरी ट्रेनिंग लेकर ही निकलेगा. यहां का सिस्टम ही ऐसा है. रेप और हत्या के आरोपी छोटे बच्चों के साथ रहते हैं. सब मारपीट करते हैं और अगर ब्लेड मिल जाए तो एक-दूसरे को चोट करने लगते हैं. यहां का पूरा माहौल ऐसा है कि अच्छे बच्चे भी हिंसक हो जाते हैं.’ बाल सुधार गृहों के वीभत्स माहौल के बारे में बताते हुए अस्थाना कहते हैं, ‘विधि विरुद्ध  किशोरों  के लिए बने संरक्षण  गृह तो सबसे ज्यादा  उपेक्षा  के शिकार हैं. दिल्ली में बच्चों  के लिए  बना  ‘स्पेशल  होम’ वाकई  स्पेशल है. जिस इमारत में यह होम चलता है, वह इंसानों के रहने के लिए बना ही नहीं था. असल में यह इमारत एक वक्त में गोला-बारूद और सैन्य हथियार रखने के लिए इस्तेमाल की जाती थी. बचाव पक्ष के वकील के तौर पर मैंने हमेशा कोशिश की है कि बच्चे इस अनुभव से दूर ही रहें.’
दिल्ली सरकार के महिला और बाल विकास विभाग के सहायक निदेशक पी खाखा मानते हैं कि सुधार गृहों में बच्चों को हिंसा से बचाने के लिए उनकी उम्र और अपराध के हिसाब से उनके लिए इंतजाम करने होंगे. वे कहते हैं, ‘बाल सुधार गृहों में जारी हिंसा को रोकने के लिए गंभीर अपराधियों के लिए तुरंत अलग सेल बनाए जाने चाहिए. हॉस्टलों की तरह छोटे-छोटे कमरे होने चाहिए जिनमें चार या ज्यादा से ज्यादा छह बच्चे रह सकें. बच्चों के इन कमरों के बीच काउंसल या मेडिकल जैसे छोटे-छोटे सेक्शन बनाए जाने चाहिए. इससे कर्मचारियों को बच्चों से सीधे और लगातार बातचीत करने का मौका मिलगा. बच्चे अगर छोटे-छोटे समूहों में रहेंगे तो उन्हें समझाने में भी सहूलियत होगी.’
प्रियंका दुबे  

बढ़ रहा है भारतीय बैंकों का डूबा कर्ज

भारतीय बैंकों का डूबा कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है. रिजर्व बैंक ने चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसे हालात देश को कड़ी चुनौती देंगे. फेडरल स्टेबिलिटी रिपोर्ट में आरबीआई ने कहा कि सितंबर 2015 तक भारतीय बैंकों की 5.1 फीसदी संपत्ति डूबी हुई थी. मार्च 2016 तक यह बढ़कर 7.1 फीसदी हो गई. अक्टूबर में रिटायर होने वाले रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने फंसे या डूबे कर्ज से मुक्ति पाने पर खास ध्यान दिया है. राजन डूबे कर्ज खातों को या तो बंद करना चाहते थे या फिर पैसा डकारने वालों को डिफॉल्टर की सूची में डालना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने 2017 की समयसीमा रखी थी. अपनी रिपोर्ट में आरबीआई ने कहा है, ‘भारत का वित्तीय तंत्र टिकाऊ बना हुआ है, हालांकि बैंकिंग सेक्टर अहम चुनौतियां झेल रहा है.’ रिजर्व बैंक ने 2015 में बैंकों से अपनी संपत्ति की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने को कहा था. उसमें चौंकाने वाली बातें सामने आईं. वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुताबिक सरकार डूबे कर्ज से बाहर निकलने के लिए बैंकों को 25 अरब रुपये पूंजी के तौर पर देगी. 

जाति, रंग, धर्म और गरीबी संबंधी फब्तियां भी रैगिंग

कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जूनियर छात्र की जाति, रंग और धर्म पर फब्तियां कसना भी अब रैगिंग की श्रेणी में आएगा. इतना ही नहीं, आर्थिक आधार पर मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना भी रैगिंग 

Image result for reging

कहलाएगी. यह प्रावधान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षा संस्थानों में रैगिंग अपराध निषेध विनियम 2016 में किया है. यूजीसी ने प्रदेश सहित देश भर के शिक्षण संस्थानों को नए नियमों का पालन कड़ाई से करने के निर्देश भी दिए हैं. शिक्षण संस्थानों में रैगिंग के बढ़ते मामलों को देखते हुए यह संशोधन किया गया है. 
Related image

अभी तक छात्रों को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करने, अपशब्द कहने, किसी छात्र पर दबाव बनाकर किसी अन्य छात्र को कुछ कहलवाने आदि को रैगिंग की श्रेणी में रखा गया था, लेकिन यूजीसी के पास पहुंचने वाली शिकायतों में रंगभेद और जातिगत टिप्पणियों की शिकायतें आ रही थीं. 

Image result for reging


लिहाजा, यूजीसी ने एंटी-रैगिंग कमेटी की सिफारिशों के मद्देनजर किसी छात्र को राष्ट्रीयता, क्षेत्रीयता, जन्म स्थान और निवास के आधार पर परेशान करने को रैगिंग में शामिल करके संशोधित नियम लागू कर दिया है.
तहलका ब्यूरो