Friday, 23 January 2015

‘बदला लो’ के नारों से पुलिस में मचा हड़कंप

गोकशी के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले दिलशाद की 'हत्या'

दिलशाद की मौत की जानकारी लगते ही लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। लोगों ने ‘बदला लो’ का नारा लगाया और आरोपियों के घरों की ओर दौड़ पड़े। उनके हाथों में अवैध हथियार और हाकी डंडे थे। इसकी सूचना पुलिस को लगी तो हड़कंप मच गया। लोगों ने आरोपियों के घरों में तोड़फोड़ और आगजनी की कोशिश की। हालांकि पुलिस ने मौके पर पहुंचकर हालात पर काबू पाए।

दिलशाद की गोली मारने वाले दानिश, हाजी छोटू, दिलशाद, नदीम, इस्लामुद्दीन और महराज के मकान ऊंचा सद्दीकनगर में हैं। दिलशाद के मरने की बात लिसाड़ीगेट इलाके में आग की तरफ फैल गई। धीरे धीरे मोहल्ले में भीड़ लगने लगी। इसके बाद काफी संख्या में लोग आरोपियों के घर की ओर दौड़ पड़े। इससे पहले उग्र भीड़ आरोपियों के घरों में तोड़फोड़ और आगजनी करती पुलिस पहुंच गई और लोगों को समझाकर शांत कराया। हालात देखते हुए पुलिस अफसरों ने दिलशाद के और आरोपियों के घर पर पुलिस और पीएसी बल तैनात कर दी। पुलिस को अंदेशा है कि इस हत्या को लेकर माहौल खराब हो सकता है।

आरोपियों के परिजनों ने खाली किए घर 

बवाल की आशंका को देखते हुए आरोपियों के परिजनों ने रातोंरात अपने घर खाली कर दिए। पुलिस ने उनको रिश्तेदारों के यहां रहने की सलाह दी है। हालांकि दो आरोपियों के परिजनों ने घर में ही रहने की पुलिस से बात की है।

गोकशी के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले दिलशाद की 'हत्या' दिलशाद के पास थी मिनी कमेलों की सूची


दिलशाद के पास थी मिनी कमेलों की सूची

लिसाड़ीगेट में चल रहे 28 मिनी कमेलों की सूची दिलशाद भारती ने मुख्यमंत्री, जिलाधिकारी, एसएसपी और थाना पुलिस को सौंपी थी। लगातार कमेलों पर छापामारी से परेशान होकर गोकशी करने वालों ने दिलशाद की हत्या करने की प्लानिंग कर ली थी। गोकशी करने वालों ने चंदा करके भाडे़ के शूटरों से गोली मरवाई थी।

दिलशाद ने गोहत्या करने वालों की सूची बनकर अभियान छेड़ रखा था। दिलशाद के साथ आठ और लोग भी शामिल थे। इसमें पांच मुस्लिम और तीन हिंदू संगठन के कार्यकर्ता थे। 18, 19, 20 व 21 नवंबर और 30 दिसंबर 2013 को दिलशाद की दी गई सूचना पर पुलिस ने छापामारी कर आठ मिनी कमेले पकड़े थे। इनसे गोमांस भी बरामद हुआ था। रियाजुद्दीन और उसके बेटे दानिश ने लिसाड़ीगेट के गली में मांस बेचने की दुकान तक खोल रखी थी।

12 अप्रैल 2014 को दिलशाद ने ऊंचा सद्दीकनगर में रियाजुद्दीन के मिनी कमेले पर छापा डलवाया। यहां से तीन जिंदा गाय और भारी मात्रा में गोमांस मिला था। इसके बाद ही गोकशी करने वालों ने दिलशाद और उसके अभियान में शामिल लोगों की हत्या की साजिश रच ली। दिलशाद और उसके साथियों के घरों में धमकी भरी चिट्ठी भी फेंकी गई।

इसके बाद दिलशाद ने 26 मई 2014 को दस मिनी कमेले पकड़वाए। इसके बाद ही दिलशाद को गोली मार दी गई। इसके बाद भी 10 अगस्त को ऊंचा सद्दीकनगर में आठ कमेले पकड़े गए। एक जनवरी को भी तीन मिनी कमेलों का भंडाफोड़ हुआ। तीन दिन पहले भी रहीसुद्दीन का मिनी कमेला पकड़ा था।

कमेले से पुलिस की भी कमाई

लोगों ने आरोप लगाया है कि लिसाड़ीगेट में लगातार गोहत्या होती हैं। शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं होती। पुलिस की साठगांठ के चलते यह धंधा बेरोकटोक चल रहा है। पुलिस को भी हिस्सा जाता है। आरोप लगाया कि दिलशाद के अभियान से भी कुछ पुलिस वालों को परेशानी थी। सच संस्था अध्यक्ष संदीप पहल ने बताया कि गोहत्या की शिकायत पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से की जाती है। इसके बाद भी कार्रवाई नहीं होती।

'मेरा भाई शहीद हुआ है'


'मेरा भाई शहीद हुआ है'
हम मुसलमान हैं, लेकिन गोरक्षा करना हमारा धर्म है। मेरे भाई ने गोरक्षा करते-करते अपनी जान दे दी। गोवंश को बचाना उसने अपना मकसद बना लिया था। इसीलिए उसने शादी भी नहीं की थी। गोकशी का धंधा मंदा पड़ने लगा तो पुलिस ने ही आरोपियों से मिलकर दिलशाद को गोली मरवाई। दिलशाद ने जान का खतरा बताकर पुलिस से सुरक्षा भी मांगी थी। ये आरोप दिलशाद भारती के भाइयों ने पुलिस पर लगाए हैं। 

दिलशाद की मौत की सूचना पर तीनों भाई आरिफ, आसिफ और इमरान रोते बिलखते अस्पताल पहुंचे। भाई का मुर्दा चेहरा देखकर तीनों का गुस्सा फूट पड़ा और जमकर पुलिस पर भड़ास निकाली। अस्पताल में मौजूद पुलिस अपना सिर नीचे झुकाकर पोस्टमार्टम के कागज बनाने में जुटी रही। पुलिस ने शव भेजकर दिलशाद के भाइयों को समझाया कि आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई करेंगे। इमरान ने कहा कि मेरा भाई गोरक्षा में शहीद हुआ है, उसको पुलिस ने मरवाया है। गोहत्या करने वालों का विरोध करने पर पुलिस का धंधा बंद होने लगा था। उसको रास्ते से हटवाने के लिए पुलिस ने आरोपियों से मिलकर दिलशाद को गोली मरवाई। दिलशाद ने लिसाड़ीगेट पुलिस को पहले ही जानलेवा हमले का अंदेशा जताकर सुरक्षा मांगी थी।

तीन आरोपी जमानत पर बाहर हैं

दिलशाद के भाई इमरान ने बताया कि नामजद आरोपी दानिश, नदीम और दिलशाद कुछ दिन पहले जमानत पर छूटकर बाहर आ गए हैं। मुकदमा वापस न लेने पर आरोपी लगातार जान से मारने की धमकियां दे रहे हैं। तीनों भाइयों को जान का खतरा बना हुआ है। पुलिस से सुरक्षा मांगते हैं तो उनको झूठा बताया जाता है। जमानत पर छूटे तीनों आरोपियों को जेल भेजने की मांग उठाई है। पुलिस ने आरोपियों को जेल भेजने का आश्वासन दिया है।

सब कुछ लुट गया हमारा

पीड़ित परिवार का कहना है कि हमारा तो सब कुछ लुट गया। दिल्ली के बड़े अस्पताल में दिलशाद का इलाज कराया, जिसमें उनके एक करोड़ 15 लाख रुपये खर्च हुए। मकान तक गिरवी रखना पड़ा, बावजूद दिलशाद की जान नहीं बची। 13 जनवरी को दिल्ली के डॉक्टरों ने जवाब दे दिया तो उसको घर पर ले आए थे। 15 जनवरी को तबीयत खराब होने पर फिर परिजनों ने उसको बागपत रोड स्थित अस्पताल में भर्ती कराया था।

गोकशी के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले दिलशाद की 'हत्या'


पिछले साल तस्करों ने मारी थी गोली

गोकशी के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले दिलशाद भारती की गो तस्करों द्वारा मारी गई गोली से बृहस्पतिवार शाम मौत हो गई। उनके इस विरोध के चलते छह गो तस्करों ने पिछले साल 27 जून को सिर पर गोली मार दी थी। तभी से वो अस्पताल में भर्ती थे। दिलशाद की मौत की सूचना पर परिजनों ही नहीं पूरे मोहल्ले में हड़कंप मच गया। वहीं परिजनों ने पुलिस पर लापरवाही का आरोप लगाकर हंगामा भी किया। हालात को देखते हुए पोस्टमार्टम हाउस से लेकर लिसाड़ीगेट तक पुलिस तैनात रही।

लिसाड़ीगेट क्षेत्र के नीचा सद्दीकनगर निवासी दिलशाद भारती (35) पुत्र शकील अहमद को गोली मारने के मामले में दानिश, हाजी छोटू, दिलशाद, नदीम, इस्लामुद्दीन और महराज को नामजद किया गया था। परिजनों का कहना था कि दिलशाद लिसाड़ीगेट क्षेत्र में होने वाली गोकशी का विरोध करता था। इसके चलते उसे गोली मारी गई थी। परिजन सात महीने से दिलशाद का मेरठ से लेकर दिल्ली तक इलाज करा रहे थे।

वर्तमान में वह मेरठ में बागपत रोड स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती था। यहां शाम 6:40 बजे उसकी मौत हो गई। डॉक्टरों ने इस बारे में परिजनों को बताया तो कोहराम मच गया। मौत की जानकारी होने पर पुलिस महकमे में भी खलबली मच गई। आनन फानन में सीओ कोतवाली रूपेश सिंह टीपीनगर एसओ और लिसाड़ीगेट एसओ के साथ अस्पताल पहुंच गए। परिजनों ने पुलिस पर लापरवाही का आरोप लगाकर अस्पताल में हंगामा शुरू किया तो पुलिस ने परिजनों को आश्वासन दिया कि आरोपियों पर सख्त कार्रवाई होगी।

चप्पे चप्पे पर पुलिस तैनात 

दिलशाद की मौत के बाद लिसाड़ीगेट में चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात कर दी गई। पुलिस को अंदेशा है कि दिलशाद के परिजन शव को सड़क पर रखकर जाम लगा सकते हैं। परिजनों में पुलिस के प्रति जबरदस्त आक्रोश है। देर रात तक पुलिस दिलशाद के पोस्टमार्टम कराने में जुटी हुई थी।


तुम मुझे खून दो,में तुम्हे आज़ादी दूंगा। नेताजी

नेताजी सुभाष चंद्र बोस



नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। बोस के पिता का नाम 'जानकीनाथ बोस' और माँ का नाम 'प्रभावती' था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वक़ील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था।

नेताजी ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल में हुई। तत्पश्चात् उनकी शिक्षा कलकत्ता के प्रेज़िडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई, और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। अँग्रेज़ी शासन काल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था किंतु उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया।

1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार पाकर  बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए। सिविल सर्विस छोड़ने के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए।  सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों से सहमत नहीं थे। वास्तव में महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे, वहीं सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे। महात्मा गाँधी और सुभाष चंद्र बोस के विचार भिन्न-भिन्न थे लेकिन वे यह अच्छी तरह जानते थे कि महात्मा गाँधी और उनका मक़सद एक है, यानी देश की आज़ादी। सबसे पहले गाँधीजी को राष्ट्रपिता कह कर नेताजी ने ही संबोधित किया था।

1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया। यह नीति गाँधीवादी आर्थिक विचारों के अनुकूल नहीं थी।  1939 में बोस पुन एक गाँधीवादी प्रतिद्वंदी को हराकर विजयी हुए।  गांधी ने इसे अपनी हार के रुप में लिया।  उनके अध्यक्ष चुने जाने पर गांधी जी ने कहा कि बोस की जीत मेरी हार है और ऐसा लगने लगा कि वह कांग्रेस वर्किंग कमिटी से त्यागपत्र दे देंगे।  गाँधी जी के विरोध के चलते इस ‘विद्रोही अध्यक्ष’ ने त्यागपत्र देने की आवश्यकता महसूस की।  गांधी के लगातार विरोध को देखते हुए उन्होंने स्वयं कांग्रेस छोड़ दी।

इस बीच दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। बोस का मानना था कि अंग्रेजों के दुश्मनों से मिलकर आज़ादी हासिल की जा सकती है। उनके विचारों के देखते हुए उन्हें ब्रिटिश सरकार ने कोलकाता में नज़रबंद कर लिया लेकिन वह अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से वहां से भाग निकले। वह अफगानिस्तान और सोवियत संघ होते हुए जर्मनी जा पहुंचे।
सक्रिय राजनीति में आने से पहले नेताजी ने पूरी दुनिया का भ्रमण किया। वह 1933 से 36 तक यूरोप में रहे। यूरोप में यह दौर था हिटलर के नाजीवाद और मुसोलिनी के फासीवाद का। नाजीवाद और फासीवाद का निशाना इंग्लैंड था, जिसने पहले विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी पर एकतरफा समझौते थोपे थे। वे उसका बदला इंग्लैंड से लेना चाहते थे। भारत पर भी अँग्रेज़ों का कब्जा था और इंग्लैंड के खिलाफ लड़ाई में नेताजी को हिटलर और मुसोलिनी में भविष्य का मित्र दिखाई पड़ रहा था। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। उनका मानना था कि स्वतंत्रता हासिल करने के लिए राजनीतिक गतिविधियों के साथ-साथ कूटनीतिक और सैन्य सहयोग की भी जरूरत पड़ती है।

सुभाष चंद्र बोस ने 1937 में अपनी सेक्रेटरी और ऑस्ट्रियन युवती एमिली से शादी की। उन दोनों की एक अनीता नाम की एक बेटी भी हुई जो वर्तमान में जर्मनी में सपरिवार रहती हैं।

नेताजी हिटलर से मिले। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत और देश की आजादी के लिए कई काम किए। उन्होंने 1943 में जर्मनी छोड़ दिया। वहां से वह जापान पहुंचे। जापान से वह सिंगापुर पहुंचे। जहां उन्होंने कैप्टन मोहन सिंह द्वारा स्थापित आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान अपने हाथों में ले ली। उस वक्त रास बिहारी बोस आज़ाद हिंद फ़ौज के नेता थे। उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज का पुनर्गठन किया। महिलाओं के लिए रानी झांसी रेजिमेंट का भी गठन किया जिसकी लक्ष्मी सहगल कैप्टन बनी।

'नेताजी' के नाम से प्रसिद्ध सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को 'आज़ाद हिन्द सरकार' की स्थापना की तथा 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था। नेताजी अपनी आजाद हिंद फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुँचे। यहीं पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध नारा, "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" दिया।

18 अगस्त 1945 को तोक्यो जाते समय ताइवान के पास नेताजी की मौत हवाई दुर्घटना में हो गई, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया। नेताजी की मौत के कारणों पर आज भी विवाद बना हुआ है।

अमेरिका के दवाब में पाकिस्तान का आतंकी हाफिज पर बड़ा ‘एक्शन’


hafiz

मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद की मुश्किलें बढ़ गई हैं। पाकिस्तान सरकार ने हाफिज के संगठन जमात-उद-दावा को प्रतिबंधित संगठनों की सूची में डाल दिया है। इतना ही नहीं नवाज सरकार ने कुख्यात हक्कानी नेटवर्क को प्रतिबंधित संगठनों की सूची में शामिल कर दिया है। बताया जा रहा है कि अमेरिका के दबाव में कादम उठाया है।
एक सरकारी अधिकारी ने बताया कि जमात-उद-दावा और कई गुटों पर प्रतिबंध का फैसला सरकार ने कई दिन पहले किया था तथा इसके कार्यान्वयन का तौर तरीका तय करने का जिम्मा गृह मंत्रालय को सौंपा गया था। इसके बाद मंत्रालय ने जमात-उद-दावा तथा फलाह-ए़-इन्सानियत फाउंडेशन (एफआईएफ) को चरमपंथ एवं उग्रवाद में उनकी संलिप्तता के लिए प्रतिबंधित संगठन की सूची में डाल दिया। दोनों गुटों का नेतृत्व हाफिज सईद करता है।
डॉन अखबार के मुताबिक, अमेरिका हक्कानी नेटवर्क तथा जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध की मांग कर रहा था, लेकिन पाकिस्तान सरकार आनाकानी कर रही थी। यह निर्णय अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा से पहले किया गया है। ओबामा भारत जा रहे हैं और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि होंगे।
प्रतिबंधित संगठनों की सूची में शामिल अन्य गुटों में हरकत-उल-जिहाद इस्लामी, हरकत-उल-मुजाहिद्दीन, उम्मा तामीर-ए-नौ, हाजी खरूल्ला हाजी सत्तार मनी एक्सचेंज, राहत लिमिटेड, रोशन मनी एक्सचेंज, अल अख्तर ट्रस्ट और अल राशिद ट्रस्ट हैं। प्रतिबंध के बाद इन गुटों की संपत्ति सील कर दी जाएगी।
इससे पहले एक अधिकारी ने कहा था कि सरकार जमात-उद-दावा को प्रतिबंधित गुट घोषित करने से पहले, उसका नाम निगरानी सूची में डालेगी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने मुंबई हमले के बाद जमात-उद-दावा को लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा कहा था। तब से संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका ने जमात-उद-दावा के कई नेताओं पर प्रतिबंध लगा रखा है।
हक्कानी नेटवर्क की स्थापना जलालुद्दीन हक्कानी ने की थी। इस संगठन पर वर्ष 2008 में अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास पर बम हमला, वर्ष 2011 में काबुल स्थित अमेरिकी दूतावास पर हमला तथा अफगानिस्तान में कई बड़े ट्रक बम हमले के प्रयास करने का आरोप है। वर्ष 2008 में अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास पर किए गए बम हमले में 58 लोग मारे गए थे।
अमेरिकी और अफगान अधिकारी बार बार कहते रहे हैं कि पाकिस्तानी जासूसी एजेंसी आईएसआई अफगानिस्तान में अपना प्रभाव फैलाने के लिए हक्कानी नेटवर्क को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देती है। इस्लामाबाद इस आरोप का खंडन करता है। अमेरिका ने सितंबर 2012 में इस गुट को एक आतंकी संगठन घोषित किया था।

पता लगा कहां है बगदादी, ऑपरेशन को तैयार अमेरिका


Baghdadi

कल तक जो अल बगदादी बेगुनाहों का कत्ल-ए-आम कर रहा था आज उसी बगदादी की जान एक राजदार में कैद है। अल बगदादी का वही राजदार आज अमेरिकी खुफिया एजेंस सीआईए के सामने सारे राज उगल रहा है। यही वजह है कि अब बगदादी को मौत का खौफ सता रहा है।

पिछले 8 महीने से अल बगदादी को 40 मुल्कों की फौज तलाश रही थी। बगदादी का सुराग पाने के लिए उसके सिर पर अमेरिका ने 60 करोड़ का इनाम रखा लेकिन बीते 8 महीने में बगदादी की फकत दो तस्वीरों के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगा। पहली बार उसी बगदादी के सीक्रेट ठिकाने की लोकेशन ट्रेस हो चुकी है। अल बगदादी के राजदार ने ही उसके तमाम ठिकानों का अनसुन सच अमेरिका को बता दिया है यानी अब बगदादी का द एंड पक्का है।
60 करोड़ इनामी मोस्टवॉन्टेड आंतकी का सबसे बड़ा राजदार है इमरान ख्वाजा। आतंकी इमरान ही आईएसआईएस के रिक्रूटमेंट सेल का हेड हुआ करता था। बगदादी का यही राजदार पुलिस के हत्थे चढ़ चुका है। पूछताछ के दौरान इमरान ने ही अपने आका अल बगदादी के तमाम राज उगल दिए है। पहली बार बगदादी के गुप्तलोक की लोकेशन ट्रेस हो चुकी है। जल्द ही अमेरिकी बगदादी का काम तमाम करने के लिए लादेन की तर्ज पर बड़े ऑपरेशन को अंजाम दे सकता है।

बगदादी के गुप्तलोक का पता अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को लग चुका है। राजदार के मुताबिक इस वक्त अल बगदादी मोसुल शहर में बने अपने एक गुप्त तहखाने में अंडरग्राउंड है। अमेरिकी सेना के हाथों मारे जाने के डर से बगदादी ने इंटरनेट और मोबाइल का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर रखा है।

“अगर सच्चा प्यार किया है तो हिंदू धर्म अपनाएं खान” - हिंदू महासभा

 ‘लव जेहाद’ जैसे मुद्दों को लेकर चल रही बहस के बीच हिंदू महासभा ने बॉलिबुड के खानों पर हमला करते हुए उन्हें चुनौती दी है।
महासभा ने आमिर खान और सैफ अली खान को चुनौती दी है कि अगर ये खान अपनी पत्नियों से सच्चा प्यार करते हैं तो हिंदू धर्म अपना लें। तब पता चलेगा कि खान अपनी बीवियों से सच्चा प्यार करते हैं, नहीं तो ये भी लव जेहाद का हिस्सा का माना जाएगा।
खबर के अनुसार हिंदू महासभा ने कहा कि वह इन खानों के लिए ‘घरवापसी’ का कार्यक्रम आयोजित करने के लिए तैयार है।  हिंदू महासभा के राष्ट्रीय महासचिव और ‘हिंदू सभा वार्ता’ के संपादक मुन्ना कुमार शर्मा ने कहा कि ‘लव जेहाद’ हिंदू विरोधी साजिश है। इसमें अनपढ़ मुस्लिम से लेकर पढ़े-लिखे मुस्लिम तक शामिल हैं।
मुन्ना कुमार ने आगे कहा कि शर्मिला टैगोर, करीना कपूर, रीना दत्त, किरण राव को प्रेमजाल में फंसाकर इस्लाम अपनाने को मजबूर किया गया।  जब हिंदू लड़की मुस्लिम युवक से शादी करती है तो उसे इस्लाम धर्म का पालन करना पड़ता है और उसके बच्चे मुस्लिम ही होते हैं।
गौरतलब है कि हिंदू महासभा के मुखपत्र में करीना कपूर की उसी तस्वीर का इस्तेमाल किया गया है जिसमें करीना का आधा चेहरा बुरके से ढका है और आधा चेहरा दिख रहा है। इस तस्वीर के ऊपर लवजिहाद लिखा है।

Thursday, 22 January 2015

10 साल में 24 फीसदी बढ़ी मुस्लिमों की आबादी



पिछले एक दशक पर गौर करें तो एक बार फिर से देश में मुस्लिमों की आबादी में इजाफा हुआ है। जनगणना-2011 के आंकड़ों के आधार पर ये दावा टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में किया गया है।

दरअसल धार्मिक समूहों की जनसंख्या पर आधारित जनगणना के नए आंकड़े जल्द ही जारी होने वाले हैं। उससे पहले टाइम्स ऑफ इंडिया में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक साल 2001 से साल 2011 के बीच देश में मुस्लिमों की जनसंख्या में करीब 24 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिली है।

हालांकि उनकी जनसंख्या में इजाफा तो हुआ है लेकिन पिछले दशक के मुकाबले उनकी जनसंख्या वृद्धि में गिरावट हुई है। आंकड़ों के मुताबिक पिछले 10 साल में देश में मुस्लिमों की कुल जनसंख्या 13.4 फीसदी से बढ़कर 14.2 फीसदी पर पहुंच गई है।

हालांकि ये आंकड़े पिछले दशक के आंकड़ों से काफी कम है। 1991 से साल 2001 के बीच सामने आए ऐसे ही आंकड़ों में मुस्लिमों जनसंख्या में वृद्धि करीब 29 फीसदी थी। जो इस बार 18 फीसदी पर पहुंच गई है। गिरावट के बाद भी अगर उनकी जनसंख्या वृद्धि की दर देखी जाए तो अब भी राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है।

वहीं अगर राज्यों के मुकाबले में इन आंकड़ों को देखें तो मुस्लिमों की जनसंख्या में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी असम में हुई। यहां साल 2001 में मुस्लिमों की जनसंख्या 30.9 फीसदी थी जो इस दशक में बढ़कर 34.2 फीसदी पहुंच गई है। इस समस्या की सबसे बड़ी वजह बांग्लादेश से घुसपैठ कर आने वाले अवैध अप्रवासी हैं।

इस समस्या से असम ही नहीं पश्चिम बंगाल भी जूझ रहा है। यहां भी अवैध अप्रवासियों के चलते मुस्लिमों की संख्या में इजाफा हुआ है। पश्चिम बंगाल में साल 2001 के 25.2 फीसदी के आंकड़ों के मुकाबले साल 2011 में ये इजाफा 27 फीसदी पहुंच गई है। यानी पिछले दस साल में यहां करीब 1.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। जो राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है।

अन्य राज्यों में भी इनकी वृद्धि दर में इजाफा देखा गया है। साल 2011 के आंकड़ों के मुताबिक केरल में ये आंकड़ा 24.7 फीसदी से बढ़कर 26.6 फीसदी तक पहुंच गया है।

उत्तराखंड की बात करें तो यहां भी मुस्लिमों की आबादी में तेज बढ़ोतरी दर्ज हुई है। यहां 11.9 फीसदी से मुकाबले इस बार 13.9 फीसदी पहुंच गई है।

गोवा में ये आंकड़ा 6.8 फीसदी से बढ़कर 8.4 फीसदी पर पहुंच गई है। जम्मू-कश्मीर में ये बढ़ोतरी 67 फीसदी से बढ़कर 68.3 फीसदी पर पहुंच गई है।

हरियाणा में 5.8 फीसदी के मुकाबले आंकड़ा 7 फीसदी पर पहुंचा है। वहीं देश की राजधानी दिल्ली की बात की जाए तो यहां भी आंकड़ों में उछाल आया है। दिल्ली में 11.7 फीसदी से बढ़कर आंकड़ा 12.9 फीसदी पर पहुंच गया है।


इन आंकड़ों में जहां देश के विभिन्न राज्यों में इजाफा देखने को मिला है वहीं मणिपुर एकमात्र ऐसा राज्य है जहां मुस्लिमों की आबादी में गिरावट देखी गई है। ये गिरावट 0.4 फीसदी के आस-पास है।

बताया जा रहा है कि जनसंख्या वृद्धि का ये आंकड़ा पिछले साल मार्च में ही जनगणना कार्यालय ने तैयार किए थे। हालांकि चुनावी मौसम को देखते हुए इसे जारी करने से यूपीए सरकार ने रोक लगा दी थी।

हालांकि जब ये मामला गृहमंत्री राजनाथ सिंह के संज्ञान में आया तो उन्होंने इन आंकड़ों तो तुरंत जारी करने के लिए रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया और जनगणना कमिश्नर सी चंद्रमौली को कहा। राजनाथ सिंह ने बुधवार को ही इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि ये आंकड़े जल्द ही सबके सामने आएंगे।