Tuesday, 23 February 2016

धर्म तोड़ता और योग जोड़ता है...


जैसे बाहरी विज्ञान की दुनिया में आइंस्टीन का नाम सर्वोपरि है, वैसे ही भीतरी विज्ञान की दुनिया के आइंस्टीन हैं पतंजलि। जैसे पर्वतों में हिमालय श्रेष्ठ है, वैसे ही समस्त दर्शनों, विधियों, नीतियों, नियमों, धर्मों और व्यवस्थाओं में योग श्रेष्ठ है।- ओशो

यह मौका है भारत के हिन्दू और मुसलमानों सहित अन्य धर्मों के लोगों के पास कि वे 'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' पर एक साथ योगासन करके विश्व को यह संदेश दें कि भारत एक है। उसकी राष्ट्रीय एकता अखंड है। राष्ट्रीय मामलों पर हम एक हैं।
 

सचमुच योग को धर्म के आईने से देखने की जरूरत नहीं, जबकि धर्म को योग के आईने से देखने की जरूरत है। दुनिया के 44 मुस्लिम देशों ने और 100 से ज्यादा ईसाई राष्ट्रों ने योग को अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित करने के लिए समर्थन किया है। ऐसे में भारत के मुसलमानों और ईसाइयों द्वारा इसका विरोध किए जाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। विरोध तो बस राजनीतिक है। कुछ मुट्ठीभर लोगों को छोड़ दें तो संपूर्ण भारत योग पर एकमत है।
 
योग का धर्म से संबंध है या नहीं ?
 अधिकतर यह तर्क देते हैं कि योग का धर्म से कोई संबंध नहीं है। वे तर्क देते हैं कि यह सभी जानते हैं कि बिजली के बल्ब का आविष्कार थॉमस एडिसन ने किया था। इसका यह मतलब नहीं कि बल्ब ईसाई धर्म का हिस्सा है। किसी ईसाई द्वारा गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रतिपादित करने से वह सिद्धांत ईसाई सिद्धांत नहीं हो जाता।
लेकिन, मैं यहां पर कहना चाहूं‍गा कि यह तर्क गलत है। वेदों में योग का उल्लेख मिलता है। मूलत: योग वेद का उपांग है। गीता के संपूर्ण 18 अध्याय योग ही हैं। गीता का 6ठा अध्याय तो सिर्फ योग पर ही आधारित है। योग एक विस्तृत विषय है, यह सिर्फ आसन नहीं है। यहां यह जरूर कहना होगा कि योग को किसी एक धर्म से नहीं, सभी धर्मों से जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि सभी धर्म किसी न किसी रूप में योग की ही शिक्षा देते हैं। योग को धर्म से अलग देखने की जरूरत नहीं। योग अपने आप में एक संपूर्ण धर्म और दर्शन है। हालांकि यह सही है कि योग को अब हिन्दू धर्म से मुक्त करने की जरूरत है और यह लगभग मुक्ति के मार्ग पर ही है और यह काम कर सकते हैं गैर-हिन्दू।
आसन किसी की बपौती नहीं
 जहां तक आसनों का सवाल है, तो दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति ने आसन किए हैं। जो पैदा होने वाला बच्चा है, वह भी आसन करेगा ही। आपने बच्चों को देखा होगा वे योग के आसन करके ही स्वस्थ रहते हैं। वे भुजंगासन करते हैं, वे पवनमुक्तासन करते हैं, वे सेतुबंधासन करते हैं और वे ‍शीर्षासन भी करते हैं। आप किसी पशु को देखें तो वह भी आपको योग के आसन करता हुआ दिखाई देगा। भारत के चिकित्सक ऋषियों ने यह सब गहराई से देखा और उन सभी हरकतों को एक विशेष नाम दिया। वे सभी नाम आज आसनों के नाम हैं। आधुनिक युग में अमेरिका और योरप के लोगों ने उन नामों का अंग्रेजीकरण कर दिया है।
 
योग क्या है ?
'योग धर्म, आस्था और अंधविश्वास से परे है। योग एक सीधा विज्ञान है। प्रायोगिक विज्ञान है। योग है जीवन जीने की कला। योग एक पूर्ण चिकित्सा पद्धति है। एक पूर्ण मार्ग है- राजपथ। दरअसल, धर्म लोगों को खूंटे से बांधता है और योग सभी तरह के खूंटों से मुक्ति का मार्ग बताता है। धर्म लोगों को आपस में बांटता है, लेकिन योग जोड़ता है।' -ओशो
धर्म, विज्ञान, मनोविज्ञान और योग
धर्म के सत्य, मनोविज्ञान और विज्ञान का सुव्यवस्थित रूप है योग। योग की धारणा ईश्‍वर के प्रति आप में भय उत्पन्न नहीं करती और जब आप दुःखी होते हैं तो उसके कारण को समझकर उसके निदान की चर्चा करती है। योग पूरी तरह आपके जीवन को स्वस्थ और शांतिपूर्ण बनाए रखने का एक सरल मार्ग है। यदि आप स्वस्थ और शांतिपूर्ण रहेंगे, तो जिंदगी को अच्छे से इंजॉय करेंगे।
योग का ईश्‍वर
 योग ईश्वरवाद और अनीश्वरवाद की तार्किक बहस में नहीं पड़ता। वह इसे विकल्प ज्ञान मानता है, आप इसे मिथ्या ज्ञान समझ सकते हैं। योग को ईश्वर के होने या नहीं होने से कोई मतलब नहीं, किंतु यदि किसी काल्पनिक या यथार्थ ईश्वर की प्रार्थना करने से मन और शरीर में शांति मिलती है तो इसमें क्या बुराई है? इसीलिए योग में 'ईश्वर प्राणिधान' नामक एक नियम है।
 
योग एक ऐसा मार्ग है, जो विज्ञान और धर्म के बीच से निकलता है। वह दोनों में ही संतुलन बनाकर चलता है। योग के लिए महत्वपूर्ण है मनुष्य और मोक्ष। मनुष्य को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखना विज्ञान और मनोविज्ञान का कार्य है और मनुष्य के लिए मोक्ष का मार्ग बताना धर्म का कार्य है। किंतु योग ये दोनों ही कार्य अच्छे से करना जानता है इसलिए योग एक विज्ञान भी है और धर्म भी।

स्वामी विवेकानंद का आह्वान, भारत के नाम

ऐ भारत ! क्या दूसरों की ही हां में हां मिला कर, दूसरों की ही नकल कर, परमुखापेक्षी होकर इस दासों की सी दुर्बलता, इस घृणित जघन्य निष्ठुरता से ही तुम बड़े-बड़े अधिकार प्राप्त करोगे? क्या इसी लज्जास्पद कापुरुषता से तुम वीरभोग्या स्वाधीनता प्राप्त करोगे ?






ऐ भारत ! तुम मत भूलना कि तुम्हारे उपास्थ सर्वत्यागी उमानाथ शंकर हैं, मत भूलना कि तुम्हारा विवाह, धन और तुम्हारी स्त्रियों का आदर्श सीता,सावित्री,दमयन्ती है। मत भूलना कि तुम्हारा जीवन इन्द्रिय सुख के लिए, अपने व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं है।

मत भूलना कि तुम जन्म से ही माता के लिए बलिदान स्वरूप रखे गए हो, मत भूलना की तुम्हारा समाज उस विराट महामाया की छाया मात्र है, तुम मत भूलना कि नीच,अज्ञानी,दरिद्र,मेहतर तुम्हारा रक्त और तुम्हारे भाई हैं। ऐ वीर, साहस का साथ लो ! गर्व से बोलो कि मैं भारतवासी हूं और प्रत्येक भारतवासी, मेरा भाई है। बोलो कि अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी, चांडाल भारतवासी, सब मेरे भाई हैं।

तुम भी कटिमात्र वस्त्रावृत्त होकर गर्व से पुकार कर कहो कि भारतवासी मेरा भाई है, भारतवासी मेरे प्राण हैं, भारत के देव-देवियाँ मेरे ईश्वर हैं। भारत का समाज मेरी शिशुसज्जा,मेरे यौवन का उपवन और मेरे वृद्धावस्था की वाराणसी है।

भाई, बोलो कि भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग है, भारत के कल्याण में मेरा कल्याण है, और दिन-रात कहते रहो कि हे गौरीनाथ,हे जगदम्बे, मुझे मनुष्यत्व दो ! मां मेरी दुर्बलता और कापुरुषता दूर कर दो, मुझे मनुष्य बनाओ!

परम पूज्य योगी आदित्यनाथ जी महाराज का सामाजिक क्षेत्र योगदान





अपने धार्मिक उत्तरदायित्व का निर्वहन करने के साथ-साथ योगी जी निरंतर समाज से जुड़ी समस्याओं के निवारण के लिए प्रयास करते रहते हैं। व्यक्तिगत समस्याओं से लेकर विकास योजनाओं तक की समस्याओं का हल वे बहुत ही धैर्यपूर्वक निकालते हैं। प्रस्तुत है समाज के विकास से जुड़ी समस्याओं के निदान के लिए किये गये उनके प्रयास और उपलब्धियाँ।


वर्ष 2009 से 2013



1. रामगढ़ताल परियोजना के लिये रु 124 करोड़ स्वीकृत, कार्य आरम्भ।
2. इन्सेफ्लाइटिस के निःशुल्क उपचार एवं उन्मूलन के लिये राष्ट्रीय कार्यक्रम घोषित।
3. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की तर्ज पर होगा बी.आर.डी.मेडिकल कालेज, गोरखपुर का विकास।
4. गोरखपुर बाईपास का शुभारम्भ कुल लागत रु 624 करोड़।
5. महेसरा सेतु स्वीकृत रु 9.25 करोड़ कार्य प्रारम्भ।
6. सिसई घाट का शुभारम्भ रु 10.68 करोड़।
7. रामपुर सेतु का शुभारम्भ।
8. गोरखपुर में फर्टिलाइजर कारखाना स्थापना का मार्ग प्रशस्त।
9. दूरदर्शन केन्द्र में स्टूडियों भवन का निर्माण तथा अपलिकिंग सुविधा की स्वीकृति।
10. आकाशवाणी केन्द्र में 10 किलोवाट का एफ.एम. चैनल स्वीकृत।
11. डोमिनगढ़ में सेतु निर्माण स्वीकृत रु 915.74 लाख।
12. गोरखपुर-लखनऊ रेलमार्ग का दोहरीकरण कार्य अन्तिम चरण में।
13. गोरखपुर-लखनऊ रेलमार्ग का विद्युतीकरण कार्य अन्तिम चरण में।
14. डोमिनगढ़ तथा गाहासाड़ में रेलवे पुल के साथ फुटपाथ वे का निर्माण।
15. सहजनवा में ओवरब्रिज स्वीकृत।
16. प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, केन्द्रीय सड़क निधि, राज्य सड़क निधि से गोरखपुर संसदीय क्षेत्र की 300 किमी.         मार्गो का निर्माण।
17. गोरखपुर महानगर को पेयजल के लिये रु 100 करोड़ स्वीकृत ।
18. बाढ़ से बचाव के लिये केन्द्र की ओर से माधवपुर-हार्वट, महेवा-मनौली, मानीराम-कुदरिया, बढ़या-कोठा,         मोहम्मदपुर-कौलिया, बेलसर-रिगौली, सिसई-कालेसर तटबन्ध की सुदृढ़ीकरण कार्ययोजना स्वीकृत।
19. गोरखपुर फूड पार्क की स्वीकृति।
20. सहजनवा-दोहरीघाट, सहजनवा-बॉसी तक नई रेल लाइन सर्वे की स्वीकृति।
21. चार फाटक ओवरब्रिज का शुभारम्भ । 
22. केन्द्रीय विश्वविद्यालय के लिये पुरजोर प्रयास।
23. हाईकोर्ट की बैंच गोरखपुर में स्थापित करने को लेकर जोरदार प्रयास।
24. भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान के लिये पहल।
25. गोरखपुर-दुर्ग, गोरखपुर-मुम्बई के बीच नई ट्रेन सेवा।
26. मंछरिया घाट का सेतु निर्माण।
27. खड़खड़िया घाट का सेतु निर्माण।
28. गोरखपुर-गोण्डा लूप लाइन आमान परिवर्तन का कार्य।
29. तरंग क्रासिंग तथा सूर्यकुण्ड में नए ओवरब्रिज का निर्माण।
30. गोरखपुर-दिल्ली वायुसेवा पुनः प्रारम्भ।
31. बी.आर.डी.मेडिकल कालेज में ट्रामा सेन्टर की स्वीकृति।
32. इण्डियन ऑयल के बोंटलिंग प्लांट गोरखपुर के लिये स्वीकृत।
33. गोरखपुर-वाराणसी मार्ग का चौड़ीकरण एवं सुदृढ़ीकरण करने का प्रयास।
34. गोरखपुर-सोनौली मार्ग के चौड़ीकरण एवं सुदृढ़ीकरण का प्रस्ताव स्वीकृत।
35. गोरखपुर-खजनी-सिकरीगंज मार्ग का चौड़ीकरण एवं सुदृढ़ीकरण का प्रस्ताव, कार्य प्रगति पर।
36. बी.आर.डी.मेडिकल कालेज में नए इन्सेफ्लाइटिस वार्ड की स्वीकृति। 
37. बी.आर.डी. मेडिकल कॉलेज में रिहेब्लिटेशन सेन्टर का निर्माण।
38. जंगल घूसड़ महाविद्यालय में योगिराज गम्भीरनाथ निःशुल्क सिलाई कढ़ाई सेन्टर का शुभारम्भ।
39. चारगांवा विकास खण्ड के तिनकोनिया न -3 में वनटॉंगिया बच्चों की शिक्षा के लिये हिन्दू विद्यापीठ का शुभारम्भ।
40. चन्द्रलोक कुष्ठ आश्रम के बच्चों की शिक्षा के लिये विद्यालय का शुभारम्भ।
41. इन्दिरा आवास योजना के अन्तर्गत 2 हजार आवास प्रतिवर्ष अतिरिक्त की स्वीकृति।
42. गोरखपुर महानगर को विकास की बुनियादी सुविधा के लिये जे.एन.यू.आर.एम. में चयन।
43. गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में सांसद विकास निधि से 225 गाँवों का विद्युतीकरण।
44. गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में सांसद विकास निधि से 100 गाँवों में धर्मशाला/पुस्तकालय का निर्माण।
45. गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में सांसद विकास निधि से कुल 100 किमी. मार्गो का नवनिर्माण।
46. ग्रामीण विद्युतीकरण योजनान्तर्गत कुल 500 गाँवों में विद्युतीकरण स्वीकृत।
47. ग्रामीण पेयजल योजनान्तर्गत धनराशि रु 300 करोड़ स्वीकृत।
48. सांसद विकास निधि से आर्थिक रूप से कमजोर विद्यालयों को एक कक्षीय भवन।
49. गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में कुल 10 कस्तुरबा विद्यालय तथा 25 जूनियर हाईस्कूल/प्राथमिक विद्यालय स्वीकृत।
50. गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में कुल 10 नए सामुदायिक/प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र का निर्माण।
51. पॉच वर्षो में 50 स्वास्थ्य मेला एवं 50 कृत्रिम अंग उपकरण वितरण कैम्प।



वर्ष 2004-2009


1. दूरदर्शन केन्द्र गोरखपुर के नये भवन तथा स्टूडियो भवन का निर्माण।
2. हेड पोस्ट ऑफिस गोरखपुर के नये भवन का निर्माण।
3. धर्मशाला ओवर ब्रिज़ का निर्माण।
4. राप्ती नदी के नए सेतु का निर्माण।
5. चारफाटक, हुमायूंपुर क्रासिंग (तरंग), सूर्यकुण्ड क्रासिंग पर तीन नए उपरिगामी सेतु स्वीकृत एवं दो पर कार्य प्रारम्भ।
6. रामगढ़ ताल की परियोजना को लेक कन्जर्वेशन स्कीम के अन्तर्गत लाना।
7. शहरी विकास मंत्रालय, भारत सरकार से गोरखपुर महानगर को पेयजल की सौ करोड़ रुपये की परियोजना की स्वीकृति।
8. बी. आर. डी. मेडिकल कालेज में ‘वाइरल रिसर्च सेन्टर’ की स्थापना।
9. जापानी इन्सेफेलाइटिस के उन्मूलन हेतु पहली बार भारत सरकार द्वारा ‘टीकाकरण’ की व्यवस्था करवाना।
10. गोरखपुर को वायु सेवा से जोड़ना।
11. गोरखपुर से दिल्ली गोरखधम सुपरफास्ट ट्रेन तथा गोरखपुर से लखनऊ इण्टरसिटी प्रारम्भ करवाना। 
12. गोरखपुर सिटी स्टेशन का निर्माण।
13. गोरखपुर-लखनऊ रेलवे ट्रैक के दोहरीकरण परियोजना की स्वीकृति करवाना।
14. गोरखपुर-लखनऊ रेलवे ट्रैक का विद्युतीकरण कार्य स्वीकृत करवाना।
15. ताला विद्युत परियोजना के तहत गीडा में 400 केवीए का नया स्टेशन स्थापित करवाना। 
16. गीडा में ‘फूड प्रोसेसिंग पार्क’ की स्वीकृति।
17. गीडा में ‘टेक्सटाइल पार्क’ की स्वीकृति।
18. महेसरा सेतु का निर्माण।
19. गोरखपुर-नौतनवां-गोण्डा लूप लाइन का आमान परिवर्तन स्वीकृत करवाना।
20. गोरखपुर-सोनौली राज्य मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग बनवाना।
21. आकाशवाणी में एफ.एम. चैनल की स्वीकृति।
22. गोरखपुर महानगर की बाढ़ से सुरक्षा के लिए ‘माधोपुर तटबन्ध्’ की बोल्डर पिचिंग, हावर्ट तटबन्ध् पर सुरक्षा दीवार          तथा महेवा-अजवनिया-मलौनी तटबन्ध् पर सुरक्षा दीवार की स्वीकृति।
23. गीडा से जगदीशपुर-सोनबरसा तक गोरखपुर बाईपास का कार्य प्रारम्भ करवाना।
24. दहलाघाट(जंगल कौड़िया) के पुल का निर्माण।
25. मानीराम-कुदरिया तटबन्ध् का सुदृढ़ीकरण कार्य।
26. चार वर्षों में 15 स्थानों पर निःशुल्क विकलांग उपकरण वितरण शिविर।
27. चार वर्षों में 22 स्वास्थ्य मेले। लगभग दो लाख गरीब जनता लाभान्वित।
28. प्रधानमंत्री ग्राम्य सड़क योजना के अन्तर्गत गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में विभिन्न मार्गों पर कुल 300 किमी. सड़क के          निर्माण की स्वीकृति।
29. गोरखपुर में एक नए केन्द्रीय विद्यालय की स्थापना।
30. राप्ती नदी पर चार लेन के नए सेतु के निर्माण की स्वीकृति।
31. सही, सस्ती एवं विश्वसनीय चिकित्सीय सुविध के लिए ‘गुरु गोरक्षनाथ चिकित्सालय’ की स्थापना।
32. ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा के विस्तार के लिए ‘महाराणा प्रताप महाविद्यालय, जंगल धूसड़’ की स्थापना।
33. गोरखपुर जिला चिकित्सालय एवं महिला चिकित्सालय का उत्तर प्रदेश हेल्थ डेवलपमेंट स्कीम के तहत जीर्णोद्धार एवं       अत्याधुनिक सुविध से युक्त करवाना।
34. ग्रामीण क्षेत्रों में सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों के भवन निर्माण की स्वीकृति।
35. महिला शिक्षा के उत्थान हेतु ‘महाराणा प्रताप महिला महाविद्यालय, रामदत्तपुर’ एवं बच्चों को संस्कारयुक्त            आधुनिक शिक्षा के लिए ‘महाराणा प्रताप सीनियर सेकेण्ड्री स्कूल’ की स्थापना।
36. ग्रामीण क्षेत्रों में न्याय पंचायत स्तर पर जूनियर हाई स्कूल तथा ग्राम पंचायत स्तर पर प्राथमिक विद्यालय की             स्वीकृति।
37. गोरखपुर संसदीय क्षेत्र के अधिकतर उच्च माध्यमिक विद्यालयों, इण्टरमीडिएट एवं उच्च शिक्षा संस्थानों को सांसद          निधिसे भवन निर्माण हेतु सहायता।
38. ग्रामीण क्षेत्रों के अध्कितर ग्राम पंचायतों में वाचनालय, पुस्तकालय, धर्मशाला का निर्माण सांसद निधिसे तथा राष्ट्रीय       श्रम विकास योजनान्तर्गत सामुदायिक केन्द्रों का निर्माण।
39. भोजपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के मुद्दे को पुरजोर तरीके से संसद में रखना।
40. राजकीय अन्ध् विद्यालय लालडिग्गी के भवन का निर्माण।
41. मूक बधिर विद्यालय, हुमायूंपुर में निर्माण कार्य।
42. ऐतिहासिक धार्मिक स्थल मान सरोवर, पुराना गोरखपुर के जीर्णोद्धार की व्यवस्था।
43. शहीद विजय शंकर शुक्ल, शहीद शिव सिंह की मूर्ति स्थापना।
44. अमर बलिदानी बाबू बन्धू सिंह की मूर्ति स्थापना का मार्ग प्रशस्त करना।
45. शहीद मेजर उदय सिंह के स्मारक के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करना।
46. चन्द्रलोक कुष्ठ आश्रम का जीर्णोद्धार तथा कुष्ठ रोगियों के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाने की आधुनिक व्यवस्था करना।
47. शक्ति पीठ बाँस स्थान का जीर्णोद्धार।
48. निर्बल आवास योजना में जनपद गोरखपुर के लिए 2 हजार आवास प्रतिवर्ष अतिरिक्त आवंटित करवाना।
49. विद्युतीकरण योजना में सांसद निधि से कुल 200 ग्राम सभाओं में तथा ग्रामीण विद्युतीकरण योजनान्तर्गत कुल          300 गाँवों में विद्युतीकरण।
50. पिछले पाँच वर्षों में कुल 15 टेलीफोन एक्सचेंज, 10 पोस्ट आफिस तथा 6 पशु चिकित्सालय स्थापित किए गए। 

परम पूज्य योगी आदित्यनाथ जी महाराज का राजनीतिक क्षेत्र योगदान

 


 1998 : 12वीं लोक सभा के लिए पहली बार गोरखपुर संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित।
1999 : 13वीं लोक सभा के लिए दूसरी बार गोरखपुर संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित।
2004 : 14वीं लोक सभा हेतु पुनः तीसरी बार निर्वाचित।
2009 : 15वीं लोक सभा हेतु पुनः चौथी बार निर्वाचित।
2014 : 16वीं लोक सभा हेतु पुनः पाँचवी बार निर्वाचित।



संसदीय जिम्मेदारियाँ

1998-99

सदस्य - खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और वितरण मंत्रालय

सदस्य - चीनी और खाद्य तेल वितरण, उप समिति

सदस्य - गृह मंत्रालय की सलाहकार समिति 




1999-2004

सदस्य - खाद्य, नागरिक पूर्ति और सार्वजनिक वितरण सम्बन्धी समिति।
सदस्य - परामर्शदात्री समिति, गृह मंत्रालय, भारत सरकार।

सदस्य – पशु कल्याण बोर्ड, नई दिल्ली।

सदस्य – गो सेवा आयोग उ.प्र.।


2004-2009

सदस्य - परामर्शदात्री समिति गृह मंत्रालय।

सदस्य - स्थायी समिति विदेश मंत्रालय।

सदस्य - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय कोर्ट।

सदस्य - अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय कोर्ट।
सदस्य - आश्वासन समिति, भारत सरकार।


2009-2014

सदस्य स्थाई समिति - पर्यटन एवं संस्कृति मन्त्रालय, भारत सरकार।

सदस्य - सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मन्त्रालय, भारत सरकार।

सदस्य परामर्शदात्री समिति - गृह मन्त्रालय, भारत सरकार।


                विदेश यात्राएं

              अमेरिका,मलेशिया,थाईलैण्ड,सिंगापुर,कम्बोडिया,नेपाल। 



हिंदुत्व और विकास,योगी जी के साथ



हिंदुओं को एकजुट करें।


‘सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला’

मशहूर और लोकप्रिय शायर निदा फाजली का गत 8 फरवरी को निधन हो गया। निदा ने काव्यात्मकता से समझौता किए बगैर लोकप्रिय कविताएं लिखीं। वे सरल भाषा में गंभीर और मार्मिक अभिव्यक्ति के लिए जाने जाएंगे। प्रस्तुत है श्रद्धांजलि स्वरूप पवन कुमार का आलेख और निदा की कुछ गजलें।

निदा फाजली का दुनिया से अचानक यूं विदा हो जाना किसी एक अदद आदमी या किसी एक शायर का चले जाना भर नहीं है, उनका जाना हिन्दुस्तानी गंगा-जमुनी तहजीब के एक मजबूत पाये का अचानक गायब हो जाने जैसा है। निदा फाजली सिर्फ शायर नहीं थे, वे उन इंसानी जज्बातों की आवाज थे, जिनमें मुहब्बतें, बेचैनियां, बेदारियां, ख्वाहिशें, मां, बच्चे, बाप, कबूतर, राजा, महाराजा, दरवेश, फकीर, तीज-त्यौहार, शहर-गांव, कुदरत जैसे तमाम अनासिर शामिल थे। वैसे भी उर्दू में ‘निदा’ का शाब्दिक अर्थ होता है ‘आवाज’। वाकई वे ऐसी मोतबर आवाज थे, जिसमें लोक जीवन गूंजता था।

निदा फाजली की शायरी का चेहरा अपने हमअसरों से शायद इसलिए अलहदा महसूस होता है कि वे जमानी लिहाज से जदीद नस्ल के फनकार हैं। निदा फाजली अदब व मुआशिरा के जिन्दा रिश्तों के शायर हैं। उनकी शायरी में घर भी है, घर के रिश्ते भी। उनकी शायरी जात में कायनात बयान करती सी लगती है।

जब वे कहते हैं, ‘जितनी बुरी कही जाती है, उतनी बुरी नहीं है दुनिया, बच्चों के स्कूल में शायद तुम से मिली नहीं है दुनिया’ तो अहसास होता है कि सादा जुबानी में कितने सलीके से अहसासों को गढ़ा गया है। सादा जुबानी और गहरे म‘आनी, शायद यही निदा की पहचान थी। वे उर्दू की उस तरक्की पसंद रिवायत का हिस्सा थे, जिसने आजादी के बाद हिन्दुस्तान को नयी शिनाख्त देने की कोशिश की। शायरी के लिहाज से बात करें तो उनकी शायरी में कबीर का फकीराना अंदाज, सूरदास का विरह, मीर का इश्किया अंदाज और गालिब की गहराई एक साथ हमरक्स करती नजर आती है। बकौल निदा फाजली, उन्होंने सूरदास को सुनकर ही लिखने की प्रेरणा ली थी। दिलचस्प बात यह है कि निदा ने उसे ताउम्र निभाया भी। ‘...हर आदमी होते हैं दस-बीस आदमी, जिसको भी देखना कई बार देखना...’ के बारे में वे खुद कहा करते थे, ‘उर्दू में दस-बीस की उपमा देने की रिवायत नहीं रही है। फिर भी मुझे सूर का ‘ऊधो मन न भये दस-बीस’ इतना अच्छा लगा कि इसे शामिल कर लिया।’

वे आम आदमी के शायर थे। बेशक उनकी गजलों-नज्मों से क्रांति और बगावत के सुर बुलन्द न होते हों, लेकिन उनकी शायरी में आम आदमी की आवाज बाजगश्त थी। हिन्दुस्तान पाकिस्तान के रिश्ते हो, साम्प्रदायिक समस्या हो, दुनिया पर आतंकी हमले हों, दादरी हो, असहिष्णुता हो या मदर टेरेसा हो या कि सद्दाम हुसैन, मलाला का आन्दोलन हो, हरेक विषय पर निदा ने बेबाकी से अपनी राय रखी। इस कारण कई बार वे आलोचनाओं और विरोध के शिकार हुए, लेकिन साफगोई उनकी शायरी की पहचान बनी रही। आम आदमी का दर्द उनकी शायरी में हमेशा गूंजता रहा। इबादत के लिए किसी रोते हुए बच्चे को हंसाने की उनकी तहजीब कइयों को रास नहीं आई, लेकिन वे डरे नहीं। उनकी शायरी फिरकापरस्त ताकतों को आंखें दिखाती थी।
हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के रिश्तों पर उनकी यह नज्म हमेशा उम्मीदों की किरण दिखाती है-‘कराची एक मां है/बम्बई बिछड़ा हुआ बेटा है/ये रिश्ता प्यार का पाकीजा रिश्ता है जिसे/अब तक/कोई तोड़ पाया है/न कोई तोड़ सकता है’। इसी तरह गंगा-जमुनी तहजीब को लेकर जब वे कहते हैं, ‘आओ/कहीं से थोड़ी सी मिट्टी भर लायें/ मिट्टी को बादल में गूंधें/नये-नये आकार बनायें/दाढ़ी में चोटी लहराये/चोटी में दाढ़ी छुप जाये/किस में कितना कौन छुपा है/कौन बताये’ तो अहसास होता है कि एक संजीदा शायर किस तरीके से समाज को दिशा दे सकता है।

भाषाई विविधता को जिस सहज भाव से निदा ने अपनी शायरी में पल्लवित किया है, वह इस दौर में अन्यत्र कहीं दिखाई नहीं पड़ता। शायद इसीलिए वे हिन्दी-उर्दू काव्य पे्रमियों के बीच समान रूप से लोकप्रिय थे। ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता’, ‘मैं रोया परदेश में भीगा मां का प्यार, दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार’ या ‘दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है’,  ‘दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहां होता है, सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला’, ‘होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है, इश्क कीजे फिर समझिए जिन्दगी क्या चीज है’ जैसे गीत उनकी पहचान थे।

इन गीतों में यह विभेद करना नामुमकिन है कि कहां से उर्दू शुरू होती है, कहां हिन्दी खत्म होती है। वे खुद भी मानते थे कि शायरी की भाषा आम आदमी की होनी चाहिए। वे कई मौकों पर कहते भी थे कि भाषा ऐसी होनी चाहिए, जिसे सुनकर श्रोताओं में बगदाद के मुंतजर अल जैदी सी विरोध की शक्ति पैदा हो, जिसने जूते में गुस्सा भर दिया हो। निदा का वास्तविक नाम मुक्तदा हसन था। माता-पिता से शायरी विरासत में मिली। ग्वालियर में वे पले-बढ़े। हालांकि उनके मां-बाप तो पाकिस्तान चले गए, लेकिन वे यहीं रह गए। वर्ष 1964 में वे मुंबई आ गए। उन्होंने कुछ समय ‘ब्लिट्ज’ और ‘धर्मयुग’ जैसी प्रमुख पत्रिकाओं के लिए भी काम किया।

1969 में उनकी कविताओं का पहला संग्रह प्रकाशित हुआ। कमाल अमरोही की फिल्म ‘रजिया सुल्तान’ में उन्होंने ‘आई जंजीर की झंकार, खुदा खैर करे’ और ‘तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा गम मेरी हयात है’ जैसे गीत लिख कर अपनी पहचान पुख्ता की। फिल्मी गीतों को लिखने का यह सिलसिला आगे भी जारी रहा। ‘तू इस तरह से मेरी जिन्दगी में शामिल है’, ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’, ‘होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है’  जैसे नायाब गीत उन्होंने लिखे। यूं तो निदा नज्मों के बड़े शायर थे, लेकिन उन्होंने गजलें और दोहे भी लिखे।

दोहों में तो उनके विचार और अभिव्यक्ति गजब ढाते हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सिर्फ पद्य ही नहीं, उनका लिखा गद्य भी साहित्य की महत्वपूर्ण पूंजी है। उनकी आत्मकथा ‘दीवारों के बीच’ और ‘दीवारों के बाहर’ नस्त्री अदब की अहम तखलीकात मानी जाती हैं। इसी तरह ‘मुलाकातें’, ‘चेहरे और तमाशा मेरे आगे’ भी उनकी नस्त्री तखलीकात हैं। बीबीसी पर लिखे उनके लेख अदब के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण संदर्भ हैं। इन लेखों में उन्होंने असातिजा पर बेहतरीन प्रकाश डाला है। ये उनके गद्य लेखन का बेहतरीन उदाहरण है। इस किताब का एक-एक लफ्ज महत्वपूर्ण है। भाषा और जुमलों के मार्फत जीवन को प्रस्तुत करने में उनकी आत्मकथा साहित्य की पूंजी है। उन्होंने ‘जिन्दगी की तरफ’, ‘लफ्जों का पुल’, ‘मोर नाच’, ‘आंख और ख्वाब के दरमियां’, ‘खोया हुआ सा कुछ’ और ‘शहर मेरे साथ चल’ लोकप्रिय पुस्तकें लिखीं।

निदा फाजली की कुछ रचनाएं

1- कच्चे बखिए की तरह रिश्ते उधड़ जाते हैं
हर नए मोड़ पर कुछ लोग बिछड़ जाते हैं
यूं हुआ दूरियां कम करने लगे थे दोनों
रोज चलने से तो रस्ते भी उखड़ जाते हैं
छांव में रख के ही पूजा करो ये मोम के बुत
धूप में अच्छे भले नक्श बिगड़ जाते हैं
भीड़ से कट के न बैठा करो तन्हाई में
बेख्याली में कई शहर उजड़ जाते हैं


2- बच्चा बोला देख कर, मस्जिद आलीशान
अल्ला तेरे एक को, इतना बड़ा मकान।
अन्दर मूरत पर चढ़े घी, पूरी, मिष्ठान
मंदिर के बाहर खड़ा, ईश्वर मांगे दान।
सब की पूजा एक सी, अलग-अलग हर रीत
मस्जिद जाये मौलवी, कोयल गाये गीत।
सात समंदर पार से, कोई करे व्यापार
पहले भेजे सरहदें, फिर भेजें हथियार।
ऊपर से गुड़िया हंसे, अंदर पोलमपोल
गुड़िया से है प्यार तो, टांको को मत खोल।
मुझ जैसा इक आदमी, मेरा ही हमनाम
उल्टा-सीधा वो चले, मुझे करे बदनाम।


3- हर घड़ी खुद से उलझना है मुकद्दर मेरा
मैं ही कश्ती हूं मुझी में है समंदर मेरा
किससे पूछूं कि कहां गुम हूं बरसों से
हर जगह ढूंढ़ता फिरता है मुझे घर मेरा
एक से हो गए मौसमों के चेहरे सारे
मेरी आंखों से कहीं खो गया मंजर मेरा
मुद्दतें बीत गईं ख्वाब सुहाना देखे
जागता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा
आईना देखके निकला था मैं घर से बाहर
आज तक हाथ में महफूज है पत्थर मेरा


4- तन्हा तन्हा हम रो लेंगे महफिल महफिल गायेंगे
जब तक आंसू पास रहेंगे तब तक गीत सुनायेंगे
तुम जो सोचो वो तुम जानो हम तो अपनी कहते हैं
देर न करना घर जाने में वरना घर खो जायेंगे
बच्चों के छोटे हाथों को चांद सितारे छूने दो
चार किताबें पढ़ कर वो भी हम जैसे हो जायेंगे
किन राहों से दूर है मंजिल कौन सा रस्ता आसां है
हम जब थक कर रुक जायेंगे औरों को समझायेंगे
अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर-दिल हो मुमकिन है
हम तो उस दिन रो देंगे जिस दिन धोखा खायेंगे

मानव जीवन की पराकाष्ठा धर्म : श्री आनंदमूर्ति

मानव जीवन की पराकाष्ठा धर्म
मनुष्य की पैदाइश कई लाख साल पहले हुई है। तब से ही मनुष्य के मन में सुख पाने की अभिलाषा रही है। आज भी है और सदैव रहेगी। इस सुख प्राप्ति की चाह से प्रेरित होकर मनुष्य धर्म-जीवन में आए। यह चाह है मात्र मनुष्य में, अन्य जीव-जंतुओं में नहीं। जो जीव-जंतु मनुष्य के निकट रहते हैं तथा जिनका मनुष्य के साथ कुछ हद तक समझौता हो गया है, उनमें भी कुछ हद तक ही इस तरह की चाह देखी जा सकती है। यह चाह मनुष्य में है, इसीलिए उसका नाम मनुष्य है। मनुष्य माने जिनमें मन की प्रधानता है। इस सुख को पाने की विशेष चेष्टा से ही धर्म की उत्पत्ति है।
मनुष्यों ने देखा कि वह जो कुछ पाते हैं, वह तो बहुत थोड़ा है। उन्हें इससे अधिक चाहिए। फिर जब वह भी मिला तो फिर देखते हैं कि वह भी थोड़ा प्रतीत होता है। वे फिर प्रयास करते हैं कि और चाहिए। उन्होंने सोचा कि थोड़ी सी कुछ चीज मिल जाएगी तो सुख की प्राप्ति होगी। उसके बाद उन्हें फिर चाह नहीं रहेगी। किन्तु देखते हैं कि इसमें भी उनकी चाह नहीं मिटी। और चाहिए। और चाहिए, अल्प से संतोष नहीं हुआ। मनुष्य ने अंतत: देखा कि उसे अनंत चाहिए और जिसका अंत है, जिसकी सीमाएं हैं, उससे वह सुख नहीं मिला। फिर मनुष्य खोज में लग गया। तब उसे पता लगा कि सिर्फ एक ही सत्ता है, जो अनंत है। और वह हैं परमपुरुष। मनुष्य को परमपुरुष के अलावा और कोई वस्तु तृप्ति नहीं दे सकती। इसी सुख प्राप्ति की चाह से धर्म-जीवन का प्रारम्भ हुआ।
यह जो परमपुरुष को पाने का प्रयास है और यह जो धर्मसाधना है, वह सबको करनी चाहिए। इसे करना ही मनुष्य की पहचान है। इसलिए मनुष्य को यदि सही इंसान बनना है, मनुष्य बनना है तो धर्म-जीवन में उन्हें आना होगा। मानव मन की यही विशेषता है कि अल्प से उसे संतोष नहीं मिलता है, वे अनंत को ही चाहते हैं। सुख जहां अनंत तक पहुंच गया है, उस सुख को आनंद कहते हैं। अर्थात मनुष्य वास्तव में सुख नहीं चाहता है, वह चाहता है आनंद। सुख प्राप्ति की चाह से प्रेरित होकर वह अनंत की राह अपनाते हैं।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो सुख और आनंद में अंतर प्रतीत होगा। जब अनुभूति की तरंगें मन के भीतर रह गईं, तब उसे कहेंगे सुख और जब तरंगें मन के भीतर ही नहीं, बल्कि बाहर भी आ गई हैं अर्थात् जब मनुष्य महसूस करते हैं कि सुख की तरंगें उनके अंदर भी हैं और दस दिशाओं में भी हैं, तो उसे कहेंगे आनंद। तुम लोग लौकिक जीवन में देखोगे कि लौकिक सुख में भी कभी-कभी सुख की तरंगें इतनी अधिक हो जाती हैं कि यह अनुभव होता है कि बाहर चारों ओर सुख की तरंगें उठ रही हैं। उस दशा में स्वयं को संभालना कठिन हो जाता है। अधिक सुख होने से आदमी चिल्ला पड़ता है, कूदने लगता है। कभी-कभी वह हंसता है, कभी-कभी वह रोने भी लगता है।

उसी प्रकार का सुख जब बराबर रहे तो उसे कहते हैं आनंद। अर्थात उनके मन का जो सुख है, वह मन के अंदर सीमित नहीं रह पाता। सुख सीमित रहता है, किन्तु कभी-कभी अधिक हो जाने से वह बाहर निकल पड़ता है। परमपुरुष हैं आनंद के आधार। इसलिए परमपुरुष की प्राप्ति से मनुष्य को आनंद मिलता है। तुम लोग धर्म-जीवन में हो, यही है मानव जीवन की पराकाष्ठा और मानव जीवन की पहचान। तुम लोग धर्म-जीवन में रहोगे और दूसरे धर्म-जीवन में नहीं रहेंगे, यह वांछनीय नहीं है। तुम्हारे इस प्रयास से कि सभी उस आनंद के रास्ते पर रहें, दुनिया में शांति की प्रतिष्ठा होती है। शांति की प्रतिष्ठा होने से मनुष्य भौतिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन दोनों में आगे बढ़ते रहेंगे। लौकिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन दोनों में संतुलन रहने से ही सही प्रगति होगी। सिवाय इसके, किसी अन्य प्रकार से सही प्रगति नहीं हो सकती।
प्रस्तुति: दिव्यचेतनानन्द अवधूत

अध्यात्म है पवित्र उत्सव

उत्सवधर्मिता केवल उत्सव मनाना नहीं है। वही उत्सव पूर्ण कहा जा सकता है, जिसमें पवित्रता की भावना हो। उत्सव केवल व्यक्तिगत आनंद का नाम नहीं, उसकी सफलता इसमें है कि समाज को भी उससे कुछ सार्थक मिले। उत्सव व्यक्ति व समाज के अवसाद को दूर करता है
उत्सव दो प्रकार के होते हैं।  एक, धन्यवाद का ज्ञापन करना अर्थात दिव्यता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना।  दूसरा, बीते हुए को छोड़कर आगे इस भाव से बढ़ना कि जीवन सनातन है।
वास्तव में सही उत्सवधर्मिता में केवल उत्सव नहीं होता है। उत्सव के साथ पवित्रता जुड़ने पर ही उत्सव पूर्ण होता है।  पूरा मन, शरीर और आत्मा आनंद से भर जाती है। यदि उत्सव से आपका उत्थान होता है, वह आपको एकजुट करता है और यदि उत्सव अपने गुजरे हुए दुखदायी समय से मुक्त कर दे और भविष्य के लिए आशा बंधा दे, तभी आप ग्लानि से मुक्त होते हैं। इस तरह का उत्सव वास्तव में सेवा होता है। महज खुशी और आत्मकेंद्रित होने के लिए उत्सव नहीं होते हैं, वरन् समाज को कुछ अभीष्ट व श्रेष्ठ मिल सके, तभी उत्सव की सार्थकता है।  
जब उत्सव पवित्रता और प्रार्थना के ही रंग से घुला होता है, तब गहराई और महानता को प्राप्त करता है। यह मन के लिए केवल मनोरंजन या शरीर के लिए रोमांच नहीं है, बल्कि उत्सव आत्मा का पोषण है। उत्सव की शुरुआत मादक पदार्थों की बजाय करुणा के भाव के साथ की जाए तो यही उत्सव की सार्थकता होगी।
उत्सव आपका दृष्टिकोण है और जीवन को उत्सव बनाने के लिए आपको बहुत ज्यादा पैसा खर्च करने की आवश्यकता भी नहीं है। उत्सव हमेशा उत्साह और आनंद से आता है। जब आप अवसाद में होते हो, तब आपको उत्सव की बहुत आवश्यकता होती है।  गुजरे पलों को भूल कर नवीनता की ओर आगे उत्साह से बढ़ना होता है। आपके पास जो भी है, उसे बांटना सीखें।
जीवन हमेशा अपनी श्रेष्ठता की ओर ही बढ़ता है। रास्ते में आपको कुछ जगह खराब मिलती है, लेकिन वह भी सब आपको और अधिक अच्छी राह की ओर ही बढ़ाता है। कठिनाइयां आपको गहराई प्रदान करती हैं और आनंद आपका अंदर से प्रसार करता है। जो चतुर हैं, वे गुजरे समय को अपना भाग्य मानते हैं और वर्तमान में प्रसन्न रहते हुए भविष्य को अपने अनुसार चलाते हैं, जबकि मूर्ख लोग गुजरे पल की शिकायत करते हैं, सोचते हैं कि भविष्य भाग्य है और वर्तमान में दुखी रहते हैं। अब पसंद आपकी है कि आप किसे चुनते हैं।
गुजरा समय हमें कई पाठ पढ़ाता है कि हमे क्या करना है और क्या नहीं करना है।  प्रत्येक दर्द भरे समय से हम गुजरते हैं और अपने अंदर गहराई को पाते हैं। प्रत्येक खुशी और सुख हमें भविष्य के प्रति आशा बंधाते हैं।
भविष्य का हमें एक मुस्कुराहट के साथ स्वागत करना चाहिए। यह मुस्कुराहट तब आएगी, जब हम आश्वस्त होंगे कि हमें सब प्रेम करते हैं। यदि आप यह नहीं जानते कि आप दिव्यता के प्रेम से आबद्ध हैं तो जीवन को उत्सव नहीं बना सकते और हमेशा असुरक्षित महसूस करते रहेंगे। यही असुरक्षा हमारे अंदर लालच बढ़ाती है। यही लालच हमें स्वार्थी बनाता है और यही स्वार्थी प्रवृत्ति गुस्सा लाती है, जो हमारी लालसा का कारण भी बनता है। यही प्रक्रम एक चक्र की भांति चलता रहता है।
आप स्वयं को देखें कि बीते समय में कितना समय आपने इसी तरह बिताया है। जब आप यह करें तो उसे अस्वीकार न करें। केवल अपने पर ध्यान लाएं। यही वास्तव में कोमल संतुलन है। यही संतुलन योग है। यही संतुलन अध्यात्म है। कुछ  लोग सोचते हैं कि अध्यात्म मूक होता है, कुछ सोचते हैं कि अध्यात्म केवल उत्सव होता है। अध्यात्म वास्तव में हमारे बाहरी मौन और आंतरिक उत्सव को संतुलित करता है। मौन से आने वाला उत्सव सही मायनों में उत्सव होता है।
उत्सव हमेशा किसी संस्कृति, जाति, धर्म और विश्वास में भेदभाव किए बगैर होता है। एकता की मूल धारणा तभी जन्म लेती है, जब सक्षम व अहम लोग विश्व सांस्कृतिक उत्सव में एक साथ आएं व अपनी संप्रभुता, सद्भाव के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करें। ऐसे उत्सव से इस दुनिया को हम संदेश दे सकते हैं कि समाज में अभी भी बहुत कुछ अच्छा बाकी है। यही आशा हमें आगे बढ़ाती है।